#Ranchi gangrape : महिला पुरुष मित्र के साथ हो, तो वह सहज उपलब्ध नहीं होती

By Prabhat Khabar Digital Desk
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#Ranchi gangrape : महिला पुरुष मित्र के साथ हो, तो वह सहज उपलब्ध नहीं होती

-अंजलि मिश्रा-

रोजाना खबरें पढ़िए और शर्मसार हो जाइए क्योंकि अब कोई चारा नहीं बचा है सिवाय शर्मिंदगी के. झारखंड की राजधानी रांची से एक बार फिर गैंगरेप की खबर आयी है. लॉ की एक छात्रा जिसकी उम्र 25 वर्ष है उसके साथ मंगलवार शाम करीब साढ़े पांच बजे 11 युवकों ने गैंगरेप किया. 26 नवंबर की शाम लड़की अपने एक दोस्त के साथ थी. कांके रिंग रोड के किनारे खड़े होकर दोनों बातें कर रहे थे. उसी वक्त दो बाइक सवार वहां आकर रुके. उन्होंने लड़की के दोस्त को बंदूक दिखाई और जबरन लड़की को अपने साथ लेकर चले गये. जहां उन्होंने अपने कुछ और दोस्तों को भी बुला लिया और लड़की के साथ गैंग रेप किया.

ये कोई पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आये हैं, जिनमें अगर लड़की अपने किसी पुरूष मित्र के साथ है तो उसके साथ रेप हुआ है या किसी तरह की छेड़खानी हुई है. ना सिर्फ झारखंड में बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों से इस तरह की खबरें सामने आयी हैं. राजधानी दिल्ली में निर्भया रेप केस में भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी जब एक चलती बस में 23 साल की लड़की के साथ गैंगरेप होता हुआ, वो भी उसके मित्र की आंखों के सामने.

तो ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि अगर कोई लड़की अपने किसी मित्र के साथ कहीं घूमने जाती है, तो क्या वो समाज की कुंठित मानसिकता वाले लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध है?

साल 2017 में मुंबई में हुए बलात्कार के एक मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भी ये कहा 'किसी महिला का पुरुष मित्र हो सकता है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इससे किसी दूसरे व्यक्ति को उसका बलात्कार करने का अधिकार मिल जाये'.

बदलते दौर में जब हम महिला सशक्तीकरण की बात बुलंद आवाज में उठा रहे हैं, ऐसे समय में महिलाओं के प्रति समाज की सोच काफी संकीर्ण होती चली जा रही है. अगर महिला नें छोटे कपड़े पहने हैं तो वो सही चरित्र की नहीं है, अगर महिला पुरूषों के साथ घूम रही है तो वो भी वो आसानी से उपलब्ध है. ये कुछ इस तरह की बातें हैं जो अक्सर सुनने को मिलती हैं. इस तरह की मानसिकता ना सिर्फ समाज को जंगली बना रही है बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी की मानसिकता को भी कुंठित कर रही है.

आखिर क्यों हो रहे हैं बलात्कार

सवाल ये भी है कि आखिर बलात्कार की घटनाएं क्यों बढ़ रही है. देखने में आया है कि कई बार पुरुषों का बढ़ता तनाव भी बलात्कार की वजह बन रहा है. महिलाओं के प्रति बढ़ता अपमानजनक माहौल भी पुरुष के दुस्साहस को बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करता है. स्त्री देह को लेकर बने सस्ते चुटकुलों से लेकर चौराहों पर होने वाली छिछोरी गपशप तक और इंटरनेट पर परोसे जाने वाले घटिया फोटो से लेकर हल्के बेहूदा कमेंट तक में अधिकतर पुरुषों की गिरी हुई सोच से हमारा सामना होता है.

कानून को दिखानी होगी सख्ती

कमजोर कानून और इंसाफ मिलने में देर भी बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है. देखा जाये तो प्रशासन और पुलिस कमजोर नही हैं, कमजोर है उनकी सोच और समस्या से लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति. पैसे वाले जब आरोपों के घेरे में आते हैं तो प्रशासनिक शिथिलताएं उन्हें कटघरे के बजाय बचाव के गलियारे में ले जाती हैं.

पुलिस की लाठी बेबस पर जितने जुल्म ढाती है सक्षम के सामने वही लाठी सहारा बन जाती है. अब तक कई मामलों में कमजोर कानून से गलियां ढूंढ़कर अपराधी के बच निकलने के कई किस्से सामने आ चुके हैं. कई बार सबूत के आभाव में न्याय नहीं मिलता और अपराधी छूट जाता है.

कुछ सवाल

हमने अक्सर समाज में देखा है कि बलात्कार नहीं, बलात्कार की जघन्यता है हमें द्रवित करती है? अमूमन रोज और चंद मिनटों में होने वाले बलात्कार से हम क्यों आहत नहीं होते? हमारा विवेक जागे, इसके लिए हमें किसी निर्भया या आसिफा की ही ज़रूरत क्यों पड़ती है? क्या हमारा समाज वाकई बलात्कार के विरोध में है? क्या वह हर बलात्कार का उसी तीव्रता से प्रतिरोध करता है जिस तीव्रता से कुछ मामलों का करता है?

हमारी सामाजिक मानसिकता स्वार्थी हो रही है. जिसका परिणाम है कि किसी भी मामले में हम खुद को शामिल नहीं करते और अपराधी में व्यापक सामाजिक स्तर पर डर नहीं बन पाता. पहली बार निर्भया के मामले में सामाजिक रोष प्रकट हुआ. लेकिन फिर भी ना सोच बदली है ना समाज. अभी भी हालात 70 प्रतिशत तक शर्मनाक ही हैं.

(लेखिका युवा पत्रकार हैं और सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखती हैं)

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