खोरठा को समृद्ध किया है एके झा ने
Updated at : 04 Oct 2019 8:03 AM (IST)
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निरंजन कुमार महतो एके झा खोरठा जगत में झारपात के नाम से जाने जाते हैं.खोरठा भाषा-साहित्य में उनका बहुमूल्य योगदान है. उन्होंने सर्वप्रथम खोज निकाला कि खोरठा भाषा की उत्पति खरोष्ठी लिपि से हुई हैं, जिसका संबंध विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पा काल से है. इनके कठिन परिश्रम का फल […]
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निरंजन कुमार महतो
एके झा खोरठा जगत में झारपात के नाम से जाने जाते हैं.खोरठा भाषा-साहित्य में उनका बहुमूल्य योगदान है. उन्होंने सर्वप्रथम खोज निकाला कि खोरठा भाषा की उत्पति खरोष्ठी लिपि से हुई हैं, जिसका संबंध विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पा काल से है. इनके कठिन परिश्रम का फल है कि खोरठा भाषा ने एक छोटे-से कोंपल से बढ़कर वटवृक्ष का स्वरूप ले लिया है. उन्होंने खोरठा भाषा से जुड़ी दर्जनों पुस्तकों की रचना और संपादन किया है. वह खोरठा भाषा के प्रचार-प्रसार में हमेशा लगे रहते थे.
उन्होंने खोरठा भाषा के पहले व्याकरण पुस्तक की रचना की. इसका नाम ‘खोरठा सहित सदानिक व्याकरण’ है. इस व्याकरण में हिंदी व्याकरण का सहारा लिया गया है क्योंकि खोरठा भाषा परिवार की दृष्टिकोण से आर्य भाषा परिवार से संबंधित है.
साथ ही खोरठा भाषा की लेखनी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है. इस प्रकार व्याकरणिक दृष्टिकोण से खोरठा भाषा में एकरूपता लाने का प्रयास किया. उन्होंने भाषा विज्ञान से संबंधित प्रथम पुस्तक की रचना की, जिसका नाम ‘खोरठा भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन’ है. इस पुस्तक में भाषा विज्ञान से जुड़ी संपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है.
‘खोरठा काठे गइदेक खंडी’ में कई महत्वपूर्ण कहानियां को संकलित की गयी हैं जो खोरठा क्षेत्र में प्रचलित है. खोरठा पद्य साहित्य को समृद्ध करने के लिए ‘खोरठा काठे पइदेक खंडी’ लिखी. इस पुस्तक में खोरठा कविताओं के साथ में हिंदी अर्थ भी बताया गया है.
एक खोरठा उपन्यास भी लिखा, जिसका नाम है- ‘सइर सगरठ’. इस पुस्तक में खोरठा के ठेठ शब्दों का प्रयोग हुआ है. उन्होंने खोरठा भाषा में ‘मेका मेकी ना मेट माट’ नामक नाटक पुस्तक की रचना किया. इसमें ग्रामीण परिवेश से जुड़े संपूर्ण पहलुओं को शामिल किया है.
उन्होंने खोरठा भाषा की प्रतिनिधि पत्रिका ‘तितकी’ का सफलतापूर्वक संपादन किया. इस पत्रिका के कई अंकों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है. इन पुस्तकों को वर्तमान समय में विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है.
धरा-गगन सिद्धांत के प्रतिपादक : एके झा की दिलचस्पी मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने में भी थी. 48 वर्षों के प्रकृति अध्ययन के बाद अपने अथक परिश्रम के बल पर धरा-गगन सिद्धांत प्रतिपादित किया था. झा जी अपने धरा-गगन सिद्धांत के माध्यम से मौसम संबंधी हलचलों का पूर्वानुमान आसानी से लगा लेते थे.
मौसम के पूर्वानुमान संबंधित जानकारियां समय-समय पर रांची से प्रकाशित होने वाली सभी प्रतिनिधि अखबारों के माध्यम से प्रकाशित होती थीं. झा जी पूरे राज्य में मौसम वैज्ञानिक के रूप में जाने जाते थे. ये जानकारियां राज्य में कृषि कार्य से जुड़े किसान भाई-बहनों के लिए लाभकारी और हितकारी साबित होती थीं. इस वैज्ञानिक काम के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया था.
(असिस्टेंट प्रोफेसर, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची)
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