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लगातार बढ़ रहे हैं हृदय रोग के मामले

Updated at : 29 Sep 2019 2:41 AM (IST)
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लगातार बढ़ रहे हैं हृदय रोग के मामले

हर साल दुनियाभर में 1.7 करोड़ लोगों की मौतें हृदय से जुड़ी बीमारियों के कारण होती हैं, लेकिन अनुमान है कि 2030 तक आंकड़ा 2.3 करोड़ पर पहुंच जायेगा. अन्य गैर-संचारी रोगों की तरह इस बीमारी की वजह से गरीबी, विशेषकर सूक्ष्म और मध्यम आय वर्ग के देशों में तेजी से बढ़ती है. स्वास्थ्य पर […]

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हर साल दुनियाभर में 1.7 करोड़ लोगों की मौतें हृदय से जुड़ी बीमारियों के कारण होती हैं, लेकिन अनुमान है कि 2030 तक आंकड़ा 2.3 करोड़ पर पहुंच जायेगा. अन्य गैर-संचारी रोगों की तरह इस बीमारी की वजह से गरीबी, विशेषकर सूक्ष्म और मध्यम आय वर्ग के देशों में तेजी से बढ़ती है. स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च गरीबी के दलदल में धकेल देता है. हृदय को स्वस्थ रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव लाना बहुत जरूरी है. रोजाना 30 मिनट का शारीरिक व्यायाम और संतुलित व स्वस्थ भोजन जरूरी है.
ग्रामीण भारत में हृदय रोग से ज्यादा मौतें
देश के ग्रामीण क्षेत्र में हृदय से संबंधित होनेवाली मौतें अपेक्षाकृत अधिक हैं. लांसेट के एक अध्ययन में इन मौतों का कारण गरीबी, अज्ञानता, गुणवत्तापूर्ण स्वस्थ्य सुविधाएं का अभाव बताया गया है. भारत में दिल की बीमारी से होनेवाली मृत्यु दर के अनुमानों पर आधारित यह पहला
अध्ययन है.
21 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी 2015 में दिल की बीमारियों से, यह बीमारियों से होनेवाली मौतों का एक तिहाई से भी ज्यादा है.
13 लाख लाेगाें की मृत्यु हुई थी कॉर्डियोवैस्कुलर डिजीज से, नौ लाख (0.9 मिलियन) की कोरोनरी हार्ट डिजीज से और चार लाख (0.4 मिलियन) लोगों की स्ट्रोक से, 30 से 69 आयुवर्ग में. 1970 के दशक के बाद जन्मे लोगों के बीच इन रोगों का खतरा ज्यादा है.
कोरोनरी हार्ट डिजीज बड़ी वजह
बीसवीं सदी के अंत और 21वीं सदी के शुरुआत में कोरोनरी हार्ट डिजीज व स्ट्रोक्स शहरी आबादी के बीच ज्यादा आम थे. वर्ष 2000 से 2015 के बीच कोरोनरी हार्ट डिजीज के कारण ग्रामीण पुरुषों के आयु मानकीकृत मुत्यु दर (प्रति एक लाख व्यक्ति वर्ष) में 40 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा हुआ था, जबकि शहरी पुरुषों में गिरावट दर्ज हुई थी. वहीं ग्रामीण महिलाओं की आयु मानकीकृत मुत्यु दर में 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी.
इस अध्ययन में ग्रामीण व शहरी भारत के 30 से 69 आयु समूह पर ध्यान केंद्रित किया गया है, क्योंकि इस आयु समूह में मृत्यु की संभावना को रोका जा सकता है. स्ट्रोक्स की अगर बात करें तो इस कारण ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में होनेवाली मृत्यु दर में कमी आयी थी, लेकिन शहरी क्षेत्रों में यह गिरावट ज्यादा थी.
क्या कहती है डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट
वर्ष 2016 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि शहरी क्षेत्रों के 58 प्रतिशत चिकित्सकों के पास मेडिकल डिग्री थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्र के महज 19 प्रतिशत चिकित्सकों के पास मेडिकल डिग्री थी.
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य अभियान (एनआरएचएम) के आंकड़ों दर्शाते हैं कि मार्च 2017 तक ग्रामीण भारत के आठ प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बिना चिकित्सक के कार्य कर रहे थे, जबकि उनमें से 61 प्रतिशत में केवल एक ही चिकित्सक था.
चिकित्सीय सलाह का अभाव भी मौत का कारण
वर्ष 2001 से 2013 के बीच पूर्व से मौजूद हृदय रोगों के निदान के साथ कोरोनरी हार्ट डिजीज से मरनेवालों की संख्या में वृद्धि दर्ज हुई थी, लांसेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कम से कम आधे लोग नियमित दवा नहीं ले रहे थे. छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में भी स्ट्रोक से होनेवाली मौतों में इजाफा हुआ था. यहां भी अधिकांश मरीज किसी तरह की दवा नहीं ले रहे थे.
इस बात की बहुत ज्यादा संभावना है कि गरीबी, अज्ञानता और सही चिकित्सीय सलाह के अभाव के कारण ही देश में हृदय रोगों से होनेवाली मौत बढ़ती जा रही हैं. हृदय रोग से होनेवाली मौत का दूसरा बड़ा कारण धूम्रपान है. हालांकि, 2005-06 और 2015-16 में धूम्रपान करनेवालों की संख्या में कमी दर्ज हुई थी. लेकिन ग्रामीण भारत धूम्रपान के मामले में आज भी शहरी भारत से आगे है.
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