छह दिनों बाद महात्मा गांधी के जन्म के 150 वर्ष पूरे हो जायेंगे : प्रथम श्रेणी से बेदखली
Updated at : 27 Sep 2019 8:51 AM (IST)
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एक सबसे ज्यादा प्रसिद्ध या कुख्यात घटना तब हुई थी, जब गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे. सात जून, 1893 को वह डरबन से नेटाल जाने वाली ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सवार हुए. जब ट्रेन रात नौ बजे के आसपास नेटाल की राजधानी पीटरमैरिट्जबर्ग पहुंची, तो एक यात्री ने उस डिब्बे में प्रवेश […]
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एक सबसे ज्यादा प्रसिद्ध या कुख्यात घटना तब हुई थी, जब गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे. सात जून, 1893 को वह डरबन से नेटाल जाने वाली ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सवार हुए. जब ट्रेन रात नौ बजे के आसपास नेटाल की राजधानी पीटरमैरिट्जबर्ग पहुंची, तो एक यात्री ने उस डिब्बे में प्रवेश किया और गांधी को ऊपर से नीचे तक देखा. साफ तौर पर लग रहा था कि वह प्रथम श्रेणी के डिब्बे में एक हिंदुस्तानी की मौजूदगी से विचलित था.
वह आदमी वापस गया और दो रेल अधिकारियों के साथ लौटा. उनमें से एक ने गांधी से नीचे उतरने और अपने साथ वैन कंपार्टमेंट में आने को कहा. गांधी ने नीचे उतरने से मना करते हुए उससे कहा कि मेरे पास डरबन से लिया गया प्रथम श्रेणी का टिकट है. अधिकारी ने कहा कि उससे कोई फर्क नहीं पड़ता और उनसे फिर वैन में आने का आग्रह किया. गांधी ने अपनी जगह पर जिदपूर्वक बने रहते हुए कहा कि मुझे उस डिब्बे में डरबन से यात्रा करने की इजाजत दी गयी थी और मेरा यहां से हटने का कोई इरादा नहीं है.
यह सुन कर अधिकारी ने धमकी दी कि वह पुलिस को बुला कर उन्हें वहां से हटवा देगा. गांधी ने कहा, आप जो करना चाहें, करें, मैं डिब्बे से नहीं उतरूंगा. वह अधिकारी गया और एक पुलिसवाले को लेकर आया, जिसने गांधी को पकड़ कर बाहर धकेल दिया. उनका सामान भी बाहर फेंक दिया गया. गांधी ने वैन में बैठने से मना कर दिया और ट्रेन रवाना हो गयी. वह प्रतीक्षालय में बैठ गये और अगली सुबह उन्होंने रेलवे के जनरल मैनेजर को एक लंबा तार भेज कर अपने साथ किये गये दुर्व्यवहार की शिकायत की.
आज पीटरमैरिट्जबर्ग के स्टेशन पर लगी एक पट्टी में लिखा है, ‘इस पट्टी के आसपास सात जून, 1893 की रात एमके गांधी को प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर धकेल दिया गया था. इस घटना ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी थी. उन्होंने नस्लपरक उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई लड़ने का संकल्प ले लिया था. उस दिन से ही उनके अहिंसक आंदोलन की शुरुआत हुई.’
(साभार: गांधी एक सचित्र जीवनी.
लेखक: प्रमोद कपूर)
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