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प्रकृति की महाशक्ति पर आधारित है झारखंडी संस्कृति का करम महोत्सव

Updated at : 06 Sep 2019 9:27 AM (IST)
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प्रकृति की महाशक्ति पर आधारित है झारखंडी संस्कृति का करम महोत्सव

तरनि बानुहड़ भाषा संस्कृति मानव समाज में चरित्र गठन का मूल आधार है. विविधता भरा हमारा देश अनेक भाषा-संस्कृतियों का पोषक क्षेत्र है, लेकिन झारखंड की भाषा-संस्कृति की एक अलग ही विशिष्टता है, जो देश की एक प्राचीनतम आदिम संस्कृति है. इसी प्राचीनतम विशिष्टता का सूचक है झारखंड का करम महोत्सव. यह सांस्कृतिक त्योहार प्रकृति […]

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तरनि बानुहड़
भाषा संस्कृति मानव समाज में चरित्र गठन का मूल आधार है. विविधता भरा हमारा देश अनेक भाषा-संस्कृतियों का पोषक क्षेत्र है, लेकिन झारखंड की भाषा-संस्कृति की एक अलग ही विशिष्टता है, जो देश की एक प्राचीनतम आदिम संस्कृति है. इसी प्राचीनतम विशिष्टता का सूचक है झारखंड का करम महोत्सव. यह सांस्कृतिक त्योहार प्रकृति की महाशक्ति पर आधारित है.
अति प्राचीन होते हुए भी हर साल इसमें नयापन झलकता है एवं यह एहसास दिलाता है कि यह कभी भी पुराना यानी उबाऊ नहीं हो सकता. प्राचीन काल में हमारे पुरखों ने बहुत ही गहण चिंतन-मनन करके प्रकृति महाशक्ति के गुणों को परख कर इस महान पर्व के विधि–नियम स्थापित किये, जिनका विधिवत अनुपालन करने पर मानव समाज में सद्चरित्र-सद्भाव गठन पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता रहेगा एवं समाज सुख-शांतिपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकेगा. गीत, धुन एवं नाच के नियमों से भरपूर यह पर्व सामूहिक रूप से संगीत लयबद्ध करम–आराधना का एकमात्र वैश्विक मिसाल है.
प्रकृति महाशक्ति के गुणों से ही संसार में जीवों का सृजन, पालन एवं विलय होता आया है, यह तथ्य वैज्ञानिक रूप से युक्ति संगत एवं वास्तविक है.
समाज गठन का आधार नारी एवं पुरुष का सृजन भी प्राकृतिक नियमानुसार ही होता है. नारियों में कुछ विशेष सृजनशील क्षमता होती है. इन्हीं नारियों का प्रथम रूप है कुमारी अवस्था का रूप एवं इन कुंआरी बालाओं को ही इस परब में विधि–नियम पालनपूर्वक व्रती होने की योग्यता प्राप्त है. इसके निष्ठापूर्वक अनुपालन से व्रतियों के तन-मन में समतावादी विचार, विशेष सृजनशील शक्ति से प्रभावित होता है.
पर्व के नामकरण की विशेषता : झारखंड की जनजातीय भाषा कुड़मालि में वर्क यानी ‘कर्म’ को ‘करम’कहा गया है एवं इसी करम से ही इस पर्व का नामकरण हुआ है.
प्राचीन काल में करम यानी काम को तीन श्रेणी (उच्चतम, मध्यम एवं निम्न) में बांटा गया है. पूर्वज महापुरुषों का एक सुस्थापित उपदेश वाणी है- ”उच्चतम खेति, मध्यम बान, नीच चाकरि भीख निदान.” यहां कर्मों में कृषि को उच्चतम, वाणिज्य को मध्यम तथा नौकरी को निम्न माना गया है एवं भीख मांगना सबसे अधम कृत्य है, जो कर्म के दायरे में ही नहीं आता.
कृषि यानी श्रेष्ठ कर्म का ही एक प्रारंभिक चरण होता है- बीज को मिट्टी में ढक कर बिचड़ा या पौधा तैयार करना एवं संसार के सर्वप्रथम एवं श्रेष्ठ कर्म कृषि की आराधना हेतु इसी चरण के रूप को आराध्य स्वरूप ‘जाउआ डाली’ में देखने को मिलता है. इस तरह यह पर्व करम चेतना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जागृत रखने का माध्यम है.
ग्यारह अनुशासनात्मक नियम के विधान : करम परब में कुमारी बालाओं को ‘जाउआ’ बुनने से लेकर ‘डाइरपूजा’ तक कई प्रकार के नियम- पालन करने पड़ते हैं.
जैसे– जाउआ में रोज सुबह-शाम हल्दी पानी सिंचन एवं रोज शाम को पवित्र–अखाड़े में जाउआ रख कर गीत गाते हुए उसकी भक्ति परिक्रमा–नृत्यपूर्वक वंदना करना उन सात या नौ दिन (जैसी परिस्थिति हो) तक साग नहीं खाना, खट्टा दही नहीं खाना, अपने हाथ से दातून नहीं तोड़ना, खाने में स्वयं ऊपर से नमक नहीं लेना, ‘हाबु’ (एक विशेष प्रकार की डुबकी) देकर नहीं नहाना, गुड़ नहीं खाना आदि ग्यारह ऐसे अनुशासनात्मक नियम-पालन के विधान हैं.
इनके उल्लंघन या अवमानना पर जाउआ में उसका तदनुरूप असर देखने को मिलता है. इस प्रकार में नियम व्रती के मन में संयम-साधना शक्ति का संचार करते हैं. हमारे पूर्वजों ने मानव समाज में कुमारी बालाओं को ही पुष्प–सदृश माना है, इसलिए अक्सर हम इनकी तुलना फूलों से करते हैं एवं फूलों के नाम पर ही इनके नाम रखते आये हैं. अत: यह बात सिद्ध है कि मानव समाज के फूल कुंवारी बालाएं ही हैं.
(लेखक झारखंडी संस्कृति के गवेषक एवं कुड़मालि भाखि चारि आखड़ा के संस्थापक अध्यक्ष हैं.)
इस लोकपर्व का वैज्ञानिक पहलू भी है
जैसे हर साल माघ मास में ही हमारे इस प्रायद्वीपीय क्षेत्र के आम के पेड़ों में मंजरि एवं फल-सृजन होता है, इस क्रिया से पता चलता है कि पृथ्वी अपनी विशिष्ट सीमा-रेखा में घूमती हुई हर साल माघ महीने में महाकाश के ठीक उसी स्थान पर पहुंचती है और ठीक उस स्थान की गुण–शक्ति के प्रभाव से ही इन मंजरि एवं फलों का सृजन होता है. इस तरह महाकाश के सभी क्षेत्र एक–एक विशिष्ट प्रकार के गुण-शक्तियों से लैस है.
इसी तरह भादों में एकादशी तिथि के समय काल में पृथ्वी एक ऐसा निर्दिष्ट विशेष स्थान पर पहुंचती है, जहां महाकाश सृजन–शील गुण क्षमता से भरपूर है. विदित हो कि यही क्षण देश के प्रमुख खाद्यान्न शस्य धान सहित अन्य तिलहन, दलहन आदि शस्यों के गर्भधारण एवं पल्लवित होने का समयकाल होता है. यही गुण–शक्तियां करम परब के विधि-नियमों द्वारा करमइति व्रती बालाओं को प्राप्त होती हैं.
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