विश्व आदिवासी दिवस 2019 : आदिवासियों की घटतीं मातृ भाषाएं
Updated at : 09 Aug 2019 7:03 AM (IST)
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बलभद्र बिरुवा असिस्टेंट प्रोफेसर, सत्यावती कॉलेज, डीयू आदिवासियों को अपनी भाषा का संरक्षण और विकास के लिए स्वयं आगे आना होगा. आदिवासी जब तक अपने परिवार, गांव, अपने लोगों के बीच अपनी भाषा में बात नहीं करेंगे, तब तक भाषा का संरक्षण एवं विकास असंभव है. मलयाली, मराठी, बंगाली भाषाओं के तर्ज पर आदिवासी भाषाओं […]
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बलभद्र बिरुवा
असिस्टेंट प्रोफेसर, सत्यावती कॉलेज, डीयू
आदिवासियों को अपनी भाषा का संरक्षण और विकास के लिए स्वयं आगे आना होगा. आदिवासी जब तक अपने परिवार, गांव, अपने लोगों के बीच अपनी भाषा में बात नहीं करेंगे, तब तक भाषा का संरक्षण एवं विकास असंभव है. मलयाली, मराठी, बंगाली भाषाओं के तर्ज पर आदिवासी भाषाओं की पढ़ाई एक माध्यम के रूप में स्कूलों में शुरू होनी चाहिए. आदिवासी समाज की लगभग 90 प्रतिशत आबादी गांवो में रहती है, जहां बच्चे हिंदी नहीं जानते. वे मातृ भाषा में पढ़ाई तेजी से सीख पाते हैं. ग्रामीण परिवेश के आदिवासी बच्चों के लिए शुरुआती दौर में हिंदी सीखना और फिर उच्च पढ़ाई के लिए अंग्रेजी में सीखना चुनौतीपूर्ण है. इसलिए धीरे-धीरे उन्हें अधिक रोजगार उन्मुख भाषा द्वारा पढ़ाया जा सकता है.
आदिवासी भाषा में पाठ्य पुस्तकों की रचना, अध्यापकों की भर्ती से आदिवासी भाषा में रोजगार भी पैदा होंगे. तमाम अनुकूल महौल रहने के बावजूद आदिवासी भाषा के माध्यम में पढ़ाई नहीं करवाना, देश-राज्य की शिक्षा नीति के प्रति संदेह उत्पन्न करता है.
अब तक आदिवासियों को ऐसी शिक्षा दी जाती रही है, जिस कारण वे वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी कम संख्या में बन पाये हैं. आदिवासियों की भाषा के प्रति दोषपूर्ण-पक्षपातपूर्ण रवैये के फलस्वरूप एक समय के बाद आदिवासियों को भी अपनी मातृ भाषा बेकार लगने लगती है, और वह अपनी ही मातृ भाषा से विमुख होने लगता है. आदिवासी भाषा संस्कृति-परंपरा के संरक्षण में सहायक है. आदिवासी समुदाय में भाषाई घाटा बढ़ रहा है, जिसका अर्थ है कि अगर वहां भाषाई घाटा 30 प्रतिशत है, तो उस आदिवासी समुदाय की 30 प्रतिशत जनसंख्या अपनी मातृ भाषा नहीं बोलती है.
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