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नेशनल मेडिकल कमीशन बिल-2019 : इससे बेहतर होगी चिकित्सा व्यवस्था!

Updated at : 01 Aug 2019 6:21 AM (IST)
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नेशनल मेडिकल कमीशन बिल-2019 : इससे बेहतर होगी चिकित्सा व्यवस्था!

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल को लोकसभा से मंजूरी मिलने के बाद भी इसके विविध प्रावधानों को लेकर विमर्श जारी है. विधेयक का मकसद भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 को निरस्त करना तथा ऐसी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली तैयार करना है, जो उच्च गुणवत्ता वाले चिकित्सा पेशवरों को तैयार करे. विधेयक की मुख्य बातों और प्रस्तावों, विपक्ष […]

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नेशनल मेडिकल कमीशन बिल को लोकसभा से मंजूरी मिलने के बाद भी इसके विविध प्रावधानों को लेकर विमर्श जारी है. विधेयक का मकसद भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 को निरस्त करना तथा ऐसी चिकित्सा शिक्षा प्रणाली तैयार करना है, जो उच्च गुणवत्ता वाले चिकित्सा पेशवरों को तैयार करे. विधेयक की मुख्य बातों और प्रस्तावों, विपक्ष तथा मेडिकल पेशेवरों की चिंताओं को रेखांकित कर रहा है आज का इन-डेप्थ.

विधेयक की मुख्य बातें

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) का गठन

इस विधेयक में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के गठन की बात कही गयी है. विधेयक के पारित होने के तीन वर्षों के भीतर राज्य सरकारें, राज्य स्तर पर राज्य चिकित्सा परिषद् का गठन करेंगी. एनएमसी में 25 सदस्य होंगे, जिन्हें केंद्र सरकार नियुक्त करेगी. अध्यक्ष और अंशकालिक सदस्यों की नियुक्ति के लिए सर्च कमिटी केंद्र सरकार को नाम सुझायेगी. इस सर्च कमिटी में कैबिनेट सचिव समेत सात सदस्य और केंद्र सरकार द्वारा नामित पांच विशेषज्ञ (जिनमें तीन के पास चिकित्सा क्षेत्र का अनुभव होगा) होंगे.

एनएमसी सदस्यों का चुनाव

एनएमसी के सदस्यों में अध्यक्ष (मेडिकल प्रैक्टिसनर), अंडर-ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट चिकित्सा बोर्ड के प्रेसिडेंट, स्वास्थ्य सेवा के महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवा के महानिदेशालय (डायरेक्ट्रेट जनरल), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिसनर द्वारा दो वर्षों के लिए चुने गये पांच सदस्य (अंशकालिक) शामिल होंगे. ये पांचों सदस्य पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिसनर्स के बीच से उनके द्वारा ही चुने जायेंगे.

एनएमसी के कार्य

चिकित्सा संस्थानों और चिकित्सा पेशवरों के लिए नीतियां तैयार करना, मानव संसाधनों और बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन करना, नियमों का राज्य चिकित्सा परिषदों द्वारा अनुपालन सुनिश्चित करना, निजी चिकित्सा संस्थानों और डीम्ड विश्वविद्यालयों में 50 प्रतिशत तक फीस निर्धारित के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना, जो इस विधेयक के तहत विनियमित हैं.

चिकित्सा सलाहकार परिषद

केंद्र सरकार एक चिकित्सा सलाकार परिषद का गठन करेगी. यह परिषद एक प्राथमिक मंच होगा, जिससे राज्य व केंद्र शासित प्रदेश अपने विचार और चिंताओं को एनएमसी के अागे रख सकेंगे. परिषद, चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम मानकों को निर्धारित करने और उसे बनाये रखने के उपायों पर एनएमसी को सलाह देगी.

स्वायत्त बोर्ड का गठन

एनएमसी की देखरेख में स्वायत्त बोर्ड का गठन हाेगा. प्रत्येक स्वायत्त बोर्ड में एक प्रेसिडेंट और चार सदस्य होंगे, जिन्हें केंद्र सरकार नियुक्त करेगी. इन स्वायत्त बोर्ड के तहत अंडर-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड व पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड, मेडिकल एसेसमेंट व रेटिंग बोर्ड और एथिक्स व मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड शामिल होंगे.

अंडर-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड व पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (यूजीएमइबी व पीजीएमइबी) : यह बोर्ड अंडर-ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर मानक, पाठ्यक्रम व दिशा-निर्देश तैयार करेगा.

मेडिकल एसेसमेंट व रेटिंग बोर्ड (एमएआरबी) : न्यूनतम मानकों काे बनाये रखने में विफल चिकित्सा संस्थानों पर आर्थिक दंड लगाने की शक्ति इस बोर्ड के पास होगी. नये मेडिकल कॉलेज की स्थापना, किसी भी पोस्ट-ग्रेजुएट पाठ्यक्रम को शुरू करने, या सीटों की संख्या बढ़ाने की अनुमति भी एमआरबी ही देगा.

एथिक्स व मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड (इएमआरबी) : यह बोर्ड सभी लाइसेंस प्राप्त मेडिकल प्रैक्टिसनर के लिए एक नेशनल रजिस्टर बनायेगा और उनके पेशेवर आचरण की निगरानी करेगा. रजिस्टर में शामिल होनेवाले मेडिकल प्रैक्टिसनर को ही मेडिसिन प्रैक्टिस की अनुमति होगी. सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाताओं के लिए अलग नेशनल रजिस्टर बनेगा.

सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाता

एनएमसी, कुछ मध्य स्तर के चिकित्सकों को मेडिसिन प्रैक्टिस के लिए सीमित लाइसेंस दे सकती है. ये चिकित्सक प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य देखभाल में निर्दिष्ट दवा लिख सकते हैं. इन चिकित्सकों को केवल पंजीकृत चिकित्सकों की देखरेख में ही दवा लिखने की अनुमति होगी.

प्रवेश परीक्षा

सभी चिकित्सा संस्थानों में अंडर-ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट सुपर-स्पेशलिटी मेडिकल एजुकेशन में प्रवेश के लिए समान राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (कॉमन नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट) आयोजित की जायेगी. एनएमसी चिकित्सा संस्थानों में प्रवेश के लिए कॉमन काउंसेलिंग के तरीके को निर्दिष्ट करेगी.

नेशनल एक्जिट टेस्ट

इस विधेयक में चिकित्सा संस्थानों से ग्रेजुएट कर रहे विद्यार्थियों के लिए उनके अंतिम वर्ष में नेशनल एग्जिट टेस्ट का प्रस्ताव है, ताकि विद्यार्थी प्रैक्टिस करने का लाइसेंस प्राप्त कर सकें. यह परीक्षा चिकित्सा संस्थानों में पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश के आधार के तौर पर भी कार्य करेगा.

खत्म होगा ‘इंस्पेक्टर राज’ : केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री

लोकसभा से मेडिकल कमीशन बिल-2019 पास होने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि कानून का रूप लेने के बाद इससे मेडिकल शिक्षा में व्यापक सुधार होगा, साथ ही इंस्पेक्टर राज खत्म होगा. यह विधेयक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट, 1956 का स्थान लेगा और वर्तमान एमसीआई को खत्म कर देगा.

मुख्य निकाय के तौर पर नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) गठन किया जायेगा, जो विभिन्न निकायों का नियमन करेगा. स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा कि जब इतिहास लिखा जायेगा, तो इसे सबसे बड़े सुधार के तौर पर दर्ज किया जायेगा. इस प्रस्ताव को सदन में 260-48 मतों के अंतर से पास किया गया था. बाद में कांग्रेस, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस के वॉकआउट करने के बाद विधेयक को ध्वनिमत से पारित किया गया.

विधेयक संघवाद की भावनाओं के खिलाफ!

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने विधेयक को संघवाद की भावनाओं के खिलाफ बताया है. कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा प्रस्तावित निकाय में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं है. विपक्ष ने आरोप लगाया कि आयोग में चुने गये सदस्यों के स्थान पर नामित सदस्यों का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा एक्जिट एग्जाम पर भी आपत्ति की गयी है. विपक्ष ने कहा कि इलाज की यह विधि बीमारी को और विकराल बनानेवाली है.

आइएमए ने कहा-विधेयक गरीब व छात्र विरोधी

इंडियन मेडिकल काउंसिल (आईएमए) का आरोप है कि एमसीआई को किसी अन्य निकाय से प्रतिस्थापित करने का मतलब है कि अन्य प्रारूप में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है. विरोध में आईएमए के आह्वान पर देशभर से आये 5000 से अधिक डॉक्टरों, मेडिकल छात्रों और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने विरोध-प्रदर्शन किया. डॉक्टरों और छात्रों ने विधेयक की प्रतियों को जलाया. आईएमए का कहना है कि मेडिकल शिक्षा तंत्र में अब तक का यह सबसे बदतर प्रावधान है. साथ ही इससे मेडिकल शिक्षा आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों के लिए महंगी और पहुंच से बाहर हो जायेगी.

क्यों बदला जा रहा है मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर स्थायी संसदीय समिति ने एमसीआई की कार्यप्रणाली पर अपनी 92वीं रिपोर्ट (2016) में कई सवाल खड़े किये थे. समिति का कहना था कि निर्धारित मानकों पर जब एमसीआई को परखा गया, तो सक्षम डॉक्टर तैयार करने, गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने में खामियां पकड़ी गयीं. कहा गया कि मौजूदा मेडिकल शिक्षा मॉडल सक्षम हेल्थ प्रोफेशनल्स तैयार करने में असफल है.

मेडिकल कॉलेजों से निकलनेवाले प्रोफेशनल्स प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, यहां तक जिला केंद्रों पर आवश्यक सेवा शर्तों को पूरा कर पाने में सक्षम नहीं हैं. समिति के अनुसार, यह आश्चर्यजनक है कि एमसीआई में व्याप्त भ्रष्टाचार और आरोपित काउंसिल के सदस्य पर कार्रवाई के लिए मंत्रालय के पास शक्ति नहीं है. वर्तमान चुनौतियों से निपटने और पारदर्शी व्यवस्था के लिए नये प्रावधान की जरूरत पर बल दिया गया.

क्या बदलाव है 2019 विधेयक में

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर स्थायी संसदीय समिति (109वीं रिपोर्ट 2018) की अनुशंसा पर दो बड़ा बदलाव किया गया है. पहला, अलग एक्जिट एग्जाम की व्यवस्था हटा दी गयी है. दूसरा, उस प्रावधान को हटा दिया गया है, जिसमें होम्योपैथी व भारतीय चिकित्सा पद्धति में ब्रिज कोर्स के बाद एलोपैथी दवाओं को देने की व्यवस्था थी.

क्या है ‘ब्रिज कोर्स’

विधेयक में यह सबसे विवादास्पद प्रावधान है, जिस पर सत्ताधारी दल के सांसदों ने भी आपत्ति जतायी है. ब्रिज कोर्स पर समिति (2018) ने कहा था कि ‘ब्रिज कोर्स को अनिवार्य प्रावधान नहीं बनाया जा सकता, हालांकि समिति ने हेल्थकेयर सेक्टर में मानव संसाधान की सक्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया था, जिससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के उद्देश्यों को हासिल किया जा सके.

समिति का मानना है कि प्रत्येक राज्य के समक्ष स्वास्थ्य जुड़े अपने मसले हैं. इस पर समिति अनुशंसा करती है कि प्रत्येक राज्य सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों के क्षमता निर्माण में अपने मानकों को तय कर सकती है. इसमें आयुष चिकित्सक, बीएससी (नर्सिंग), बीडीएस, बीफार्मा आदि शामिल है.

तीन वर्ष में बने 59 नये मेडिकल कॉलेज

बीते तीन वर्षों में केंद्र ने 59 नये मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी है. इसमें 33 कॉलेज निजी क्षेत्र से और 22 मेडिकल कॉलेज सीधे सरकार के अधीन हैं. गुजरात और असम में चार मेडिकल कॉलेजों की शुरुआत सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी के आधार पर की गयी है. नये मेडिकल कॉलेजों में सर्वाधिक आठ केरल में, जबकि कर्नाटक व उत्तर प्रदेश में सात-सात कॉलेज हैं. देश में कुल मेडिकल कॉलेजों की संख्या 529 हो गयी है, जिसमें 266 सरकारी हैं.

एमबीबीएस की 9000 नयी सीटें

आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू करने के क्रम में सरकार ने 9000 नयी एमबीबीएस सीटों को मंजूरी दी है. इस प्रकार एमबीबीएस की कुल सीटों की संख्या 79,000 हो गयी है. सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ देश में डॉक्टरों की कमी पूरा करने की दिशा में इसे अच्छा प्रयास मानते हैं, लेकिन शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता और निजी कॉलेजों की निगरानी नहीं होने पर चिंता व्यक्त करते हैं.

पंजीकृत हैं 11,57,771 एलोपैथिक डॉक्टर

वर्तमान में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और स्टेट मेडिकल काउंसिल से पंजीकृत डॉक्टरों की संख्या 11,57,771 है. लगभग 9.26 लाख डॉक्टर सक्रिय सर्विस में हैं.

डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है देश

भारत में लगभग 60 लाख डॉक्टर और 20 लाख नर्सों की कमी है.

भारत में प्रति 10,189 लोगों पर महज एक सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है.

भारत में स्वास्थ्य पर 65 प्रतिशत खर्च खुद की जेब से किया जाता है और इससे हर वर्ष 5.7 करोड़ लोग गरीब हो जाते हैं.

प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के कारण मरीजों तक जीवन-रक्षक दवाइयां पहुंच ही नहीं पाती हैं.

एंटीबायोटिक से इलाज के दौरान होनेवाली सालाना 57 लाख मौतों में अधिकांश निम्न और मध्य आय वाले देशों में होती है.

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