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दलिताें और पिछड़ों में नेतृत्व पैदा करने की जरूरत

Updated at : 26 May 2019 2:58 AM (IST)
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दलिताें और पिछड़ों में नेतृत्व पैदा करने की जरूरत

प्रो विवेक कुमार (समाजशास्त्री, जेएनयू) विचारधाराएं तब तक बलवती नहीं होतीं, जब तक कि वे जमीन पर न उतरें. सामाजिक न्याय की आवाज को बुलंद करनेवाले नेताओं ने जमीन पर उतरने की कोशिश नहीं की और सिर्फ चुनावी मंचों से ही बातें करते रहे. अखिलेश और मायावती का गठबंधन राजनीति को लेकर ज्यादा था, सामाजिक […]

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प्रो विवेक कुमार (समाजशास्त्री, जेएनयू)

विचारधाराएं तब तक बलवती नहीं होतीं, जब तक कि वे जमीन पर न उतरें. सामाजिक न्याय की आवाज को बुलंद करनेवाले नेताओं ने जमीन पर उतरने की कोशिश नहीं की और सिर्फ चुनावी मंचों से ही बातें करते रहे. अखिलेश और मायावती का गठबंधन राजनीति को लेकर ज्यादा था, सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने को लेकर कम.
ये दोनों पार्टियां जमीन पर कम ही उतरीं. भाजपा में शामिल दलित नेताओं के मुंह को साल 2014 के बाद बंद कर दिया था. बीते पांच साल वे कुछ बोल ही नहीं पाये और दलितों और पिछड़ों के खिलाफ अन्याय होता रहा.
अति पिछड़ी जातियाें का धीरे-धीरे अपने नेताओं से मोहभंग होने लगा और साल 2019 आते-आते वे भाजपा का समर्थन करने लगीं. भाजपा ने इस बात का फायदा उठाया और इन नेताओं में से कुछ की अनदेखी शुरू कर दी. तब ये नेता बौखला गये और भाजपा के खिलाफ बोलने लगे. तब तक देर हो चुकी थी, क्योंकि लोग समझ गये थे कि ये सिर्फ सत्ता की मलाई खानेवाले नेता हैं.
भाजपा यही तो चाहती है कि दलितों और पिछड़ों की बात करनेवाले नेताओं से दलितों-पिछड़ों का मोहभंग हो जाये. यहां एक अौर महत्वपूर्ण बात यह है कि अति पिछड़ों में धर्म और आस्था को भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति ने खूब प्रभावित किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें लगने लगा कि मोदी ही अकेला ऐसा नेता है, जो विकास के साथ-साथ उनकी आस्था भी मजबूत करेगा. धर्म तो भाजपा का बहुत बेहतरीन हथियार है, जिससे लड़ पाना फिलहाल सामाजिक न्यायवादियों के बस की बात नहीं है.
अखिलेश-मायावती को चाहिए था कि दलितों और पिछड़ों के अंदर से नेता चुनकर उन्हें एमलसी बनाकर हर जगह उनका नेतृत्व पैदा करते, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. जब तक दलितों और पिछड़ों के समाज के अंदर नेतृत्व पैदा नहीं होगा, तब तक वे जागरूक नहीं होंगे.
सामाजिक न्याय की अवधारणा तभी फलित होगी, जब सामाजिक न्याय का उद्घोष करनेवाली पार्टियां अपने संगठनात्मक संरचना में बदलाव लायेंगी.
अति पिछड़े और महादलितों के अंदर नेतृत्व पैदा करना होगा, जो मायावती और अखिलेश बिल्कुल भी नहीं कर पाये. एक खालीपन सा आया, तो अति पिछड़े और महादलितों के सामने भी मोदी ही विकल्प के रूप में आये. सामाजिक न्याय तभी संभव होगा, जब दलितों और अति पिछड़ों को आत्मप्रतिनिधित्व दिया जाये और उन्हें अपने में मिलाया जाये.
भाजपा उन्हें आत्मप्रतिनिधित्व नहीं देती, लेकिन उन्हें ऐसा भरोसा दिला देती है कि वह उन्हें साथ लेकर चल रही है. मुस्लिम समाज में जो ज्यादा पिछड़े लोग हैं, उनको भी अपने साथ नहीं लिया गया. मुराद अंसारी बसपा के बड़े नेता हुआ करते थे, जो उस जमाने में बसपा में मुस्लिम नेतृत्व को मजबूत करते थे और बसपा को मुसलमानों का वोट मिलता था. लेकिन बसपा की ऐसी नीति अब कहीं दिखायी नहीं पड़ती है.
सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए कई मोर्चों पर काम करने की जरूरत है. कांशीवादी और लोहियावादी नेताओं को चाहिए कि वे नैरेटिव तैयार करें कि भाजपा सवर्णों की पार्टी है और वह सिर्फ उनका वोट ले सकती है, लेकिन नुमाइंदगी कभी नहीं दे सकती.
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