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रियायत खत्म होते ही तेल आयात की बढ़ेंगी मुश्किलें! जानें अमेरिका-ईरान के बीच क्या है विवाद, और भारत के पास विकल्‍प

Updated at : 28 Apr 2019 6:07 AM (IST)
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रियायत खत्म होते ही तेल आयात की बढ़ेंगी मुश्किलें! जानें अमेरिका-ईरान के बीच क्या है विवाद, और भारत के पास विकल्‍प

ईरान से तेल की खरीद बंद करने के लिए भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है. पिछले साल नवंबर में ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लागू करते समय अमेरिका ने भारत समेत कुछ देशों को छह माह की छूट दी थी, जिसकी अवधि मई में पूरी हो रही है. यदि भारत इस पाबंदी के अनुसार […]

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ईरान से तेल की खरीद बंद करने के लिए भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है. पिछले साल नवंबर में ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लागू करते समय अमेरिका ने भारत समेत कुछ देशों को छह माह की छूट दी थी, जिसकी अवधि मई में पूरी हो रही है.
यदि भारत इस पाबंदी के अनुसार ईरान से तेल नहीं लेता है, तो उसे दूसरे देशों से आयात बढ़ाना होगा. हालांकि, अमेरिका ने भरोसा दिलाया है कि चाबहार बंदरगाह परियोजना पर प्रतिबंध का असर नहीं होगा, पर निश्चित रूप से ईरान के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध पहले की तरह नहीं रह जायेंगे. एक प्रश्न यह भी है कि अमेरिकी प्रतिबंध पर सहयोग करने से भारत के वाणिज्यिक और सामरिक हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा. इस पूरे प्रकरण के विभिन्न पहलुओं पर आधारित इन-दिनों की प्रस्तुति…
ईरान से तेल खरीद की छूट समाप्त
अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पियो ने बीते 22 अप्रैल को घोषणा की है कि भारत समेत जिन आठ देशों (चीन, जापान, तुर्की, इटली, ग्रीस, दक्षिण कोरिया और ताईवान) को ईरान से तेल खरीद के लिए 180 दिन की रियायत मिली थी, अमेरिका उसे और आगे नहीं बढ़ायेगा.
इटली, ग्रीस और ताईवान पहले ही ईरान से तेल आयात पर रोक लगा चुके हैं. जबकि चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को दी गयी छूट 2 मई, 2019 को समाप्त हो रही है. अगर ये पांचों देश आगे ईरान से तेल खरीदते हैं, तो इन पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू होगा. अमेरिका का उद्देश्य ईरान की सरकार के आय के मुख्य स्रोत को समाप्त करना है. दूसरी ओर, ईरान अमेरिकी प्रतिबंध को अवैध मानता है.
अमेरिका-ईरान के बीच क्या है विवाद
पिछले वर्ष ट्रंप ने ईरान और छह पश्चिमी देशों के बीच वर्ष 2015 में हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अमेरिका के अलग होने की घोषणा की थी.
समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान कोे आर्थिक प्रतिबंधों से छूट प्रदान की थी. बदले में ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और कार्यक्रम की जांच अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों से कराने के लिए तैयार हुआ था. ट्रंप का कहना था कि ओबामा के शासनकाल में हुआ यह समझौता अमेरिका के लिए घाटे का सौदा है. अब समझौते को रद्द कर ट्रंप ने एक बार फिर से ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया है.
असल में इसका उद्देश्य ईरान को नये समझौते के लिए विवश करना है. अमेरिका चाहता है कि परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ ईरान बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम की भी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा निगरानी की अनुमति दे.
ईरान पर प्रतिबंध का असर
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की मुद्रा रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गयी है. सालाना महंगाई दर चार गुना तक बढ़ चुकी है और विदेशी निवेशक बाहर जा रहे हैं.
विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है भारतभारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है. देश में कच्चे तेल की 80 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की लगभग 40 प्रतिशत जरूरतें आयात के जरिये पूरी होती हैं.
ईरान से तेल खरीदनेवाले देशों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है. वर्ष 2018-19 में भारत ने ईरान से 2.35 करोड़ टन तेल खरीदा था. पिछले वर्ष भारत ने कुल 22.04 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया था, जिसका 10 प्रतिशत हिस्सा ईरान से आया था.
इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है. अप्रैल 2017 और जनवरी 2018 (2017-18 वित्त वर्ष के पहले 10 महीने में) की अवधि में ईरान ने भारत को 1.84 करोड़ टन कच्चे तेल की आपूर्ति की थी.
सेंटर फॉर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018-19 के पहले 11 महीनों में भारत ने कुल 128.7 बिलियन डॉलर मूल्य का पेट्रोलियम, ऑयल व लुब्रिकेंट (पीओएल) आयात किया था. इस आयात का नौ प्रतिशत हिस्सा ईरान से आया था.
ईरान से कच्चे तेल पर रोक से 2500 करोड़ का नुकसान!
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अगर ईरान से आयात किये जानेवाले कच्चे तेल पर रोक लगती है, तो इससे भारतीय रिफाइनरियों को वार्षिक परिचालन लाभ (ऑपरेटिंग प्रॉफिट) में 2500 करोड़ रुपये की चपत लग सकती है. ईरान से तेल आयात करने पर भारतीय रिफाइनरियों को 60 दिनों के क्रेडिट अवधि का लाभ मिलता है, जबकि अन्य आपूर्तिकर्ताओं से मात्र 30 दिनों का लाभ मिलता है. इससे अंदेशा है कि ईरान से तेल का आयात बाधित होने पर घरेलू परिशोधन उद्योग को काफी नुकसान होगा.
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें होंगी प्रभावित
ईरान से कच्चे तेल के आयात को लेकर जिन आठ देशों को छह महीने की छूट दी गयी थी, उसमें भारत भी शामिल था. अब यह अवधि अगामी 2 मई को समाप्त हो रही है. अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर कह दिया है कि किसी देश को अब आगे प्रतिबंध में कोई छूट या सहूलियत नहीं मिलेगी. ऐसे में अगर ईरानी तेल बाजार से बाहर होता है, तो निश्चित ही भारत समेत पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ेगा. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों पर नियंत्रण मुश्किल होगा.
भारत के पास विकल्प
मई, 2019 के बाद भारतीय तेल रिफाइनरियों को पर्याप्त मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति होती रहे, इसके लिए भारत सरकार अलग-अलग स्तरों पर प्रयासरत है.
तेल मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी कर कहा है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कच्चे तेल के प्रमुख उत्पादक देशों से अतिरिक्त आपूर्ति के लिए काम किया जा रहा है. हालांकि, भारत अतिरिक्त समयसीमा की उम्मीद लिये अमेरिका के साथ वार्ता जारी रखने की कोशिश में है. वर्तमान में भारत अपनी तेल की कुल जरूरत का 10 प्रतिशत हिस्सा ईरान से पूरा करता है. मौजूदा वित्त वर्ष में भारत ईरान से 2.4 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात कर चुका है. ईरान भारत के लिए तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश है.
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