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मनुष्य और प्रकृति के अनूठे संबंध का परिचायक है छठ

Updated at : 11 Nov 2018 6:38 AM (IST)
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मनुष्य और प्रकृति के अनूठे संबंध का परिचायक है छठ

हम ऐसे देश के निवासी है, जहां दुनियाभर के त्योहार मनाये जाते हैं. साल की शुरुआत में मकर संक्रांति से लेकर साल के अंतिम महीने के क्रिसमस तक. ये सभी त्योहार हमारे आम जीवन की नीरसता को दूर करके इसके विविध पक्षों को एक खुशबू सतरंगी एहसास से भर देते हैं. इन सभी त्योहारों में […]

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हम ऐसे देश के निवासी है, जहां दुनियाभर के त्योहार मनाये जाते हैं. साल की शुरुआत में मकर संक्रांति से लेकर साल के अंतिम महीने के क्रिसमस तक. ये सभी त्योहार हमारे आम जीवन की नीरसता को दूर करके इसके विविध पक्षों को एक खुशबू सतरंगी एहसास से भर देते हैं. इन सभी त्योहारों में से बात जब छठ की हो, तो इसका जिक्र करते चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है. धड़कनें उत्साहित हो जाती है. केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि कई दृष्टिकोणों से भी छठ पर्व का विशेष महत्व है.
सूर्योपासना है कई रोगों का इलाज
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो छठ पूजा का विधि-विधान व्रती के शरीर व मन को सौर्य ऊर्जा के अवशोषण के लिए तैयार करता है. प्राचीन ऋषि-मुनि आदि इस प्रक्रिया के जरिये ही बगैर भोजन, पानी ग्रहण किये लंबे समय तक कठोर तप करने की ऊर्जा प्राप्त करते थे. कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर होता है.
इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है. छठ में उसके संभावित कुप्रभाव से बचाव का सामर्थ्य है. उगते और डूबते हुए सूर्य की रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता. सर्दी आने से पूर्व हमारे शरीर में कई बदलाव होते हैं. इस दौरान सुबह, दोपहर और शाम- तीनों समय सूर्य प्रकाश का विशेष तौर से शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
महिलाओं के अस्तित्व का सम्मान : हमारे देश में ऐसा कोई अन्य पर्व नहीं है, जिसे सधवा(शादीशुदा महिलाओं), विधवा, कुंवारी, गर्भवती आदि सभी स्त्रियां एक साथ कर सकती हों, जबकि छठ पर्व हरेक स्त्री को एक ही तराजू पर रखता है. सभी महिलाएं एक समान साज-सज्जा और विधि-विधान के साथ इस पर्व को करती नजर आती हैं. छठ हमें यह भी बताता है कि सिंदूर पर किसी एक का अधिकार नही है. छठ व्रत के दौरान सभी तरह की महिलाएं टीका के रूप में नाक से सिंदूर लगाती हैं. इस दौरान महिलाओं से छेड़-छाड़ और अपराध की घटनाएं भी कम हो जाती हैं. लोग यथासंभव व्रती महिलाओं की मदद करते नजर आते हैं.
छठ का धार्मिक-पौराणिक महत्व
अगर हम छठ के धार्मिक इतिहास पर नजर डालें, तो हमें इसकी समृद्धता का पता चलता है. छठ पर्व हिंदू कैलेंडर के कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. हालांकि चार दिनों के इस त्योहार की शुरुआत चतुर्थी तिथि से ही हो जाती है, पर मुख्य पूजा षष्ठी को की जाती है. इसी वजह से इस त्योहार का नाम छठ पड़ा है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम सूर्यवंशी थे. सूर्य देव उनके कुल देवता थे. रावण वध के पश्चात जब वह सीता को लेकर अयोध्या लौट रहे थे, तो सरयू नदी के तट पर अपने कुल देवता सूर्य देव की पूजा की थी. वह तिथि कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी ही थी. अपने राजा को देख कर वहां की प्रजा ने इस दिन पूजा करना प्रारंभ कर दिया, जो कि आज तक छठ के रूप में जारी है.
एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत काल में जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती और माद्री के साथ वन में दिन गुजार रहे थे, उन दिनों पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महारानी कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी. फलस्वरूप ही कुंती के गर्भ से कर्ण पैदा हुए. इसी वजह से आज भी लोग संतान प्राप्ति की इच्छा से छठ पर्व करते हैं. तीसरी किवदंती यह है कि जब पांडव पुत्र राज पाट हार कर वन में भटक रहे थे, तो द्रौपदी और कुंती ने एक साथ मिल कर सुख और समृद्धिशाली परिवार की कामना करते हुए छठ पर्व को किया था. कुंती पुत्र कर्ण भी सूर्य के अनन्य उपासक थे.
वह रोजाना नदी में एक पैर पर खड़े होकर सूर्योपासना किया करते थे. कर्ण के बारे में कहा जाता है कि वह षष्ठी और सप्तमी को विशेष पूजन करते थे. यही पूजा भविष्य में ‘छठ’ नाम से प्रचलित हुई. भारत में सूर्योपसना ऋगवेद काल से होती आ रही है. सूर्य और उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रहा पुराण, वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से मिलती है. मध्यकाल तक आते-आते छठ सूर्योपसना के एक व्यवस्थित पर्व के रूप में समाज में प्रतिस्थापित हो चुका था.
धार्मिक-सांप्रदायिक भावनाओं से है ऊपर
छठ पर्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कभी भी किसी धर्म, जाति, राज्य या देश की सीमाओं का मोहताज नहीं रहा है. शुरुआत में यह पर्व बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ भागों तक ही सीमित था, लेकिन आज भारत के अन्य राज्यों में रहनेवाले और अलग-अलग भाषा बोलनेवाले लोगों से लेकर विदेशों में रहनेवाले लोग भी इसे बेहद श्रद्धा और उत्साह से छठ करते है.
छठ के दौरान एक ही नदी, एक ही घाट पर एक ही समय में एक साथ हजारों-लाखों लोग सिर्फ छठ मइया के प्रति अपनी आस्था को मन में संजाये जाति-वर्ग, संप्रदाय के अलगाव से ऊपर उठ कर ‘छठव्रती’ के रूप में एक होते एक खूबसूरत फ्रेम में नजर आते हैं. जिस डोम समाज को लोग अछूत मानते हैं, छठ में लगनेवाला सूप उन्हीं लोगों द्वारा बनाया जाता है. कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के चूल्हे, बर्तन, दीये आदि की इस पर्व में विशेष अहमियत होती है. इनके अलावा नाइन, माली, आदि की भी अहम भूमिका होती है.
छठ केवल महिलाओं एवं पुरुषों द्वारा ही नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय द्वारा भी उतनी ही श्रद्धा से किया जाता है. ब्राह्मणवाद को कमज़ोर साबित करता हुआ छठ इस तथ्य को मजबूती प्रदान करता है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन को बीच किसी भी पंडित, पुरोहित का होना जरूरी नही है. इसी कारण सभी धर्म, जाति और संप्रदाय के लोगों द्वारा अपनी इच्छाशक्ति से छठ पर्व का अनुष्ठान पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान से किया जाता है.
आज भी अपने मूल रूप में बरकरार है छठ
वर्तमान व्यापारीकरण के दौर में छठ पर्व पर न तो ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव पड़ा है और न ही शहरीकरण अपना वर्चस्व जमा सका है. इसी कारण अमीर हो या गरीब कोई भी इसे आसानी से कर सकता है. हालांकि कुछ लोग सोने, चांदी, तांबा, कांसा और पीतल के बने सूप से सूर्यदेव को अर्घ देते हैं, लेकिन बांस के सूप और दउरा का उपयोग आज भी अनिवार्य है.
ग्लोबलाइजेशन की इस दौर में जो लोग नौकरी या कुछ पढ़ाई के लिए अपने घर-परिवार से दूर हैं, उनका अपने परिवार से मिलन अक्सर फोन/वीडियो कॉल से ही हो पाता है.
ऐसे में छठ एक बड़ी वजह बन जाती है, इस भागदौड़ वाली लाइफ का पॉज बटन दबा कर फुर्सत के कुछ पल अपने घर-परिवार के साथ बिताने का. दादा-दादी वाले जेनरेशन से लेकर पोता-पोती वाले जेनरेशन तक को एक ही छत के नीचे छठ की तैयारी करने में उलझा कर परिवार को एक सूत्र में बांधने का. पुराने शिकायतों को भूल कर रिश्तों के महत्व को समझने का. महीनों पहले से लोग इसके लिए तैयारियां शुरू कर देते हैं.
कुल मिला कर देखें तो छठ पर्व ही तैयारी से लेकर पर्व के चार दिनों के दौरान के एक-एक पल में हमारी भारतीय संस्कृति के अनेकों सकारात्मक एवं समृद्ध पहलू नजर आते हैं. यह त्योहार खुद में जितनी शक्ति समेटे हुए है, इसमें उतनी भक्ति का संदेश भी शामिल है. यही वजह से छठ को पर्व नहीं, बल्कि महापर्व कहा जाता है.
कमरख और सुथनी जैसे फलों को जिंदा रखता है छठ
मानव समाज और प्रकृति के बीच के अनूठे संबंध का परिचायक है छठ. भारत एक कृषि प्रधान देश है. इसी वजह से यहां मनाये जानेवाले ज्यादातर पारंपरिक त्योहार भी फसल की बुआई, रोपाई कटाई आदि की सफलता के साथ उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है. कृषि के साथ हम लोगों के जन-जीवन के लिए भी सूर्य की उदय और अस्त दोनो ही महत्वपूर्ण रहा है. इस वजह से सूर्य की उपासना सभ्यता की शुरुआत से ही होती रही है.
छठ अपने अंदर इन महत्वों को समेटे हुए आज भी इन संदेशों को प्रदर्शित करती है. स्ट्रॉबेरी, एप्पल,पाइनेपल, कीवी वाले जमाने में भी ईंख, गागर नीबू, सुथनी, शरीफा कमरख, शकरकंद जैसे फलों का अस्तित्व छठ की वजह से ही कायम है. थाइ, चाइनीज, इटालियन फूड के जमाने में भी खीर, रसिया, रोटी, चावल, दाल, कद्दू, कोहड़ा, अगस्त्य के फूल आदि सहित अन्य साग-सब्जियों का स्वाद बरकरार है, यह छठ की ही देन है.
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