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पारंपरिक मिठाइयों का त्योहार दीपावली!

Updated at : 07 Nov 2018 5:49 AM (IST)
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पारंपरिक मिठाइयों का त्योहार दीपावली!

पुष्पेश पंत स्तंभकार दीपावली जगमगाते दीयों का त्योहार तो है ही, इसे पकवान और मिष्ठान्न का पर्व भी समझा जाता है, जो पूरे पखवाड़े मनाया जाता है. प्रसाद में खीर या पायसम बनती है और खील-बताशे फर्श पर लक्ष्मी जी के स्वागत में बिखराये जाते हैं. पारंपरिक घरों में तैयार की जानेवाली मिठाइयों में पुए […]

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पुष्पेश पंत
स्तंभकार
दीपावली जगमगाते दीयों का त्योहार तो है ही, इसे पकवान और मिष्ठान्न का पर्व भी समझा जाता है, जो पूरे पखवाड़े मनाया जाता है. प्रसाद में खीर या पायसम बनती है और खील-बताशे फर्श पर लक्ष्मी जी के स्वागत में बिखराये जाते हैं. पारंपरिक घरों में तैयार की जानेवाली मिठाइयों में पुए और शकरपारे, लड्डू तथा बेसन की बर्फी आम थे. कहीं-कहीं अनरसे भी चखने को मिल जाते थे.
खीर और पुए दोनों ही भारत की प्राचीनतम मिठाइयों में शामिल हैं. हिंदू मिथकों के अनुसार, भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर महालक्ष्मी के साथ शयनमुद्रा में विश्राम करते हैं और इसलिए इसे सात्विक भोजन में सर्वोत्तम परमान्न समझा जाता है. चावल और ईख से बनी शक्कर, दोनों इसी धरती की संतानें हैं तथा दूध-दही वैदिक काल से ही भारतवासियों का प्रिय भोजन रहे हैं.
बौद्ध ग्रंथों में यह दर्ज है कि सिद्धार्थ से बुद्ध बने गौतम ने जब पहला खाद्य पदार्थ ग्रहण किया, वह सुजाता का लाया खीर का कटोरा ही था. इसी तरह पुओं का जिक्र वैदिक साहित्य में अपूप के नाम से मिलता है. विघ्ननाशक गणेश का पूजन लक्ष्मी जी के साथ होता है और उन्हें मोदक प्रिय हैं. उत्तर भारत में इसे लड्डू का पर्याय मान लिया जाता है, पर महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में चावल के आटे से नारियल, गुड़ से भरे इलायची से सुवासित मोदक अंशतः ही गोलाकार होते हैं और इन्हें भपोरे से भी पकाया जाता है.
आजकल पुराने चलन की मिठाइयों- इमरती, बालूशाही, खाजे- को छेने की बंगाली मिठाइयों ने या मावे की मिठाइयों ने हाशिये से भी परे पहुंचा दिया है.
माना जाता है कि छेना पनीर पुर्तगाली अपने साथ लाये. हालांकि, सभी इतिहासकार यह नहीं मानते, क्योंकि जगन्नाथ जी के छप्पन भोग में छेने के मिष्ठान्न की झलक मिलती है. यह सुझाना तर्कसंगत है कि जहां दूध की नदियां बहती थीं, वहां दही, मलाई से मिठाई बनाने में देर लगी होगी!
हां, पकवाननुमा मिठाइयों की लोकप्रियता के तर्कसंगत कारण तलाशने की दरकार है. खोए या छेने की बनी मिठाई भारत की आबोहवा में बहुत दिन खराब हुए बिना नहीं रह सकती. इसलिए बेसन, मैदे की टिकाऊ मिठास की जरूरत पड़ती है. दूध में गुंथे आटे की मिठाई या पकवान जिसमें घी का मोयन पड़ा हो, न केवल खस्ता होती हैं वरन कई दिन तक मिल-बांट कर खायी खिलायी जा सकती हैं.
यही रहस्य पक्की रसोई की यात्रा के दौरान उपयोगिता का है. गर्म तेल-घी में छानी पूडी-कचौड़ी का आनंद बिना तरकारी या सब्जी के लिया जा सकता है- अचार की एक फांक के साथ. यह बात होली की गुझिया पर भी लागू होती है. दिवाली पर ही बनारस के हलवाई मगदल बनाते हैं, जिसे आप हलवे का अधिक पौष्टिक और टिकाऊ बिरादर कह सकते हैं. बादाम या उरद की दाल से बननेवाला मगदल भी प्राचीन काल से चला आ रहा है.
गुड़ से बनी रोट का परिष्कृत रूप दक्खिन की पूरनपोली है, जिसे चने की दाल तथा नारियल से भरा जाता है. रोट सख्त होती है और पूरनपोली मुलायम. फिलहाल चूकिये मत, जो मिठाई नजर आये उसे आजमाइए जरूर, पर जरा संयम के साथ!
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