इटली के गांवों में आदिवासी दर्शन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Jul 2018 5:04 AM
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जसिंता केरकेट्टा भारत के आदिवासी ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में लोग विकास की नयी अवधारणा के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. बड़े बाजारों के अधीन होने के खिलाफ हैं. बड़े बाजार की व्यवस्था, जो आदमी के हाथ से सामान्य हुनर छीन लेती है और हर चीज के लिए लोगों को अपने ऊपर निर्भर […]
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जसिंता केरकेट्टा
भारत के आदिवासी ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में लोग विकास की नयी अवधारणा के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. बड़े बाजारों के अधीन होने के खिलाफ हैं. बड़े बाजार की व्यवस्था, जो आदमी के हाथ से सामान्य हुनर छीन लेती है और हर चीज के लिए लोगों को अपने ऊपर निर्भर बनाती है.
विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगल, प्रकृति का विनाश और मातृभाषा की कब्रिस्तान को स्थापित करने वाली इस व्यवस्था के खिलाफ इटली और फ्रांस की सीमा की पहाड़ी घाटियों में मौजूद गांवों के लोग करीब तीस साल से लड़ रहे हैं.
इन इलाकों में अपनी बोलियों और संस्कृति को लेकर स्वाभिमान है. लंबे समय से विकास के नाम पर प्रकृति, स्थानीय बोलियों, संस्कृति, सहजीविता को ध्वस्त करने वाली शक्तियों के खिलाफ हैं. यह संघर्ष भारत के आदिवासी संघर्ष से काफी मिलता जुलता है.
11 मई 2018 की सुबह इटली के तुरिनो शहर से लगभग एक घंटे की यात्रा कर हम ऐसी जगह पहुंचे जिसकी नैसर्गिक सुंदरता को देख हर किसी का मन वहीं रुक जाने को हुआ. सामने आल्प्स पर्वत की बर्फ़ से ढंकी चोटियां नजर आ रही थी. ठीक उसके पहले एक ओर भूरी चट्टानों वाले पहाड़ सीधे खड़े थे, तो दूसरी ओर गहरे हरे रंग की चादर ओढ़े ऊंचे पहाड़.
इटली और फ्रांस की सीमा पर इन पहाड़ों के बीच दूर तक छोटे गांव बसे हैं. गांव का अर्थ यहां पिछड़ा होना कतई नहीं है. ये अपने सांस्कृतिक पहचान लिये हैं. इनमें अपनी भाषा, संस्कृति, अस्तित्व, इतिहास की गहरी जड़ें हैं.
घाटी के क्षेत्रों में कम रफ्तार वाली ट्रेन चलती हैं जो आगे बढ़ कर फ्रांस की सीमा तक जाती है. घाटी में घुसते ही ठंडक बढ़ जाती है. डोरा नदी की आवाज साफ सुनाई पड़ती है. यह एक अद्भुत घाटी है. इतालवी पत्रकार डेनियला बेज्जी के साथ हम वाल्डीसूजा घाटी के एक गांव बोसेलेनो में थे.
इस पूरी घाटी के लोग लंबे समय से विकास की नयी अवधारणा के ख़िलाफ़ खड़े हैं.इसके लिए 30 सालों से लड़ रहे हैं. जब सरकार घाटी में सड़क-चौड़ीकरण का प्रोजेक्ट ले कर आयी, तो घाटी के लोगों ने कहा था कि वे पहले से मौजूद सड़कों से ही खुश हैं. पर इस इलाके में सड़कों का जबरन चौड़ीकरण किया गया. इसके खिलाफ लड़ते हुए लोगों ने अपने खेत, खलिहान, जंगल, चेरी के पेड़ों की कतारें और बहुत कुछ खोया.
“एक रात आचनक फौज ने हम पर हमला बोला और बच्चे, बूढ़े, स्त्रियों पर लाठियां बरसायीं. उस दिन घर के कई पालतू कुत्ते भी गायब हो गये जो फिर कभी लौट कर नहीं आये. संभवतः उनकी भी हत्या हो गई. क्योंकि वे उनके आने पर लगातार भौंक रहे थे. कई लोग इस पीड़ा में गुजर गये कि उन्होंने घाटी के बदलाव आने से अपनी बहुत सी सुंदर स्मृतियां खो दी हैं.
चेरी के पेड़ों के बीच गुजारी बचपन की सुनहरी यादें खो दीं. उन सबकी याद में लोगों ने गीत गाए, पेंटिंग्स बनाये, नारे लिखे, जो घरों की दीवारों पर अंकित हैं, आज भी.” घाटी के आंदोलन से शुरुआती दिनों से जुड़ी बुजुर्ग निकोलेता डॉजियो पुराने दिनों को याद करते हुए बता रही थी.
वे कहती हैं, “घाटी के लोग लड़ाई हार गये और विकास के नाम पर सरकार जीत गयीं थी. अब इतने सालों बाद फिर से इस घाटी से होकर 50 किलोमीटर लंबी बुलेट ट्रेन का ट्रैक बनाने की बात होने लगी. इसे इतालवी और फ्रेंच सरकार 9 बिलियन यूरो की लागत से बनाना चाहती थी. इसके लिए पहाड़ों की खुदाई जरूरी थी.
घाटी के लोगों को विकास का असली अर्थ समझ में आने लगा. वे समझ गये कि पहाडों के बिकने की खतरनाक घड़ी आ रही है. लोग फिर से जुटे और एक जोरदार आंदोलन की शुरुआत की. यह जानकारी भी सामने आयी है कि इन पहाड़ों के नीचे यूरेनियम है. इसके लिए होने वाली ड्रिलिंग से घाटी के साथ आसपास के इलाके भी बुरी तरह पर प्रभावित-प्रदूषित हो जायेंगे.”
यूरोप के दूसरे हिस्से के लोग घाटी के लोगों के संघर्ष में साथ देने के लिए जुटने लगे. वे घाटी में आकर कैंप करते और लोगों के साथ खड़े होने लगे. कई लोग शहर छोड़ कर घाटी में ही हमेशा के लिए रुक गये, उनके ही बीच. उस दौरान आंदोलन से जुड़े लोगों को नक्सली बता कर जेल में डाला गया.
स्त्रियों की मजबूत अवाज निकोलेता को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया. अपने घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. लेक़िन उन्होंने अपनी आजादी के लिए भी संघर्ष किया. यूरोप से कुछ वकीलों की टीम इन लोगों के साथ जुड़ी, जो इनकी ओर से कानूनी लड़ाई लड़ रही है. लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप के दूसरे हिस्से के लोग इनके संघर्ष को देखने-समझने पहुंचते हैं.
निकोलेता डॉजियो पूछती हैं कि उन्हें क्यों बड़े बाज़ारों के अधीन किया जा रहा है, जबकि वे अपने इलाके में जरूरत की सारी चीजें उपजा सकते हैं?
वे छोटे-छोटे बाज़ार लगाते हैं जहां अपनी चीजें खरीदते-बेचते हैं. निकोलेता ने अपने कुछ मित्रों के साथ ऐसे सांस्कृतिक-केंद्र बनाये हैं, जहां खाने-पीने के साथ चर्चा-परिचर्चा का दौर चलता है. जहां लोगों का ध्यान एक नये जीवन शैली की ओर आकर्षित किया जाता है.
वह जीवनशैली, जो समानता, सम्मान, एक दूसरे के गरिमामय जीवन के लिए साथ आने, प्रकृति को बचाने और अपना जीवन साझा करने पर आधारित है. ऐसी जगह, जहां जानवरों को भी उनके हिस्से की आजादी मिलती है, भोजन में हिस्सा और एक सुरक्षित जंगल मिलता है. इस जीवन शैली के कई तत्व आदिवासी समाज के भीतर लंबे समय से हैं.
वह आगे कहती हैं कि सिर्फ प्रतिरोध का हिस्सा बन प्रतिक्रिया करते रहने को लोग समाधान नहीं मानते. प्रतिरोध के साथ वे दूसरों के बीच नयी जीवन शैली का प्रचार-प्रसार करते हैं. उनके पुरखों ने लंबे समय से घाटी के खिलाफ बनने वाले बुरे मंसूबों से संघर्ष किया है. वे ऐसे पुरखों की ही पीढ़ियां हैं.
वे उस इतिहास का हिस्सा हैं. उनके लंबे संघर्ष के बाद फ्रांसीसी सरकार ने इस परियोजना को लाभदायक न बताते हुए वापस ले लिया है. लौटते वक्त इस पूरे आंदोलन को दिशा-दशा देने वाले बुद्धिजीवी जीजी रीकोतता से मुलाकात हुई. घाटी अभी शांत है.
सिर्फ कभी-कभी पहाड़ों पर ड्रिलिंग की आवाज आती है. वे जानते हैं उनका संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है. यह जान कर कि उनका संघर्ष भारत में आदिवासियों के संघर्ष से, उनके जीवन और उनके यकीन से किस कदर मेल खाता है, निकोलेता की आंखें चमक उठती हैं.
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