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हूल दिवस विशेष : जंगे-जमीन और आजादी

Updated at : 30 Jun 2018 9:00 AM (IST)
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हूल दिवस विशेष	: जंगे-जमीन और आजादी

अनिल अंशुमन 1885 से 1898 तक संताल परगना के डिप्टी कमिश्नर रहे राबर्ट्स कांस्टेयर्स के उपन्यास ‘हाड़माज विलेज’ का वरिष्ठ साहित्यकार शिशिर द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद ‘ऐसे हुआ हूल’ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. इसमें संताल-हूल के कई ऐसे महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया गया है, जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. इसके अनुसार […]

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अनिल अंशुमन

1885 से 1898 तक संताल परगना के डिप्टी कमिश्नर रहे राबर्ट्स कांस्टेयर्स के उपन्यास ‘हाड़माज विलेज’ का वरिष्ठ साहित्यकार शिशिर द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद ‘ऐसे हुआ हूल’ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है.

इसमें संताल-हूल के कई ऐसे महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया गया है, जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. इसके अनुसार हूल ‘दामिन ए कोह’ (पुराना संताल परगना) के क्षेत्र में बसनेवाले संतालों और अन्य ग्रामीण-गरीब खेतिहर समाज के लोगों द्वारा अपनी खोई हुई जमीन की वापसी, सूदखोर-महाजनों और सरकारी अमलों के शोषण तथा अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाने हेतु एक स्वाधीन राष्ट्र कायम करने के लिए था. इसमें नेतृत्व भले ही संतालों का था, लेकिन इसमें शामिल होकर ‘हूल’ की अग्नि में आहुति देनेवालों तथा गिरफ्तार हुए कई लोगों में गैर-संताल समुदाय के लोगों का नाम भी सरकारी दस्तावेजों में देखे जा सकते हैं.

संतालों ने अंग्रेज आला अफसरों के पास कई बार अपने कष्टों का शिकायत-पत्र भेज कर गुहार लगायी, जिसमें महाजनों-जमींदारों द्वारा सूदखोरी, जमीन से बेदखली, सरकारी अमलों द्वारा लूट और अंग्रेजी हुकूमत द्वारा इन समस्याओं के प्रति उपेक्षा की ढेरों शिकायतें थीं.

लेकिन हुकूमत द्वारा उसे अनसुना किये जाने से थक-हार कर विद्रोह करना ही एकमात्र विकल्प रह गया था. तब 1855 के जून महीने की तीखी गर्मी में भोगनाडीह में दसियों हजार संताल और ग्रामीण जमा होकर शपथ ली कि वे सूदखोर-महाजन, जमींदार, दरोगा-सिपाही और अंग्रेजी हाकिम-जज की कोई गुलामी नहीं करेंगे. अपनी खोई जमीनें वापस लेने और अपना स्वाधीन देश बनाने के लिए हूल करेंगे.

इसी सर्वसम्मत संकल्प के साथ 30 जून को हजारों-हजार संताल व अन्य ग्रामीण अपने पारंपरिक हथियारों तथा कई दिनों के खाने-पीने के सामान से लैस होकर गवर्नर को अपनी शिकायत बताने कलकत्ते की ओर हूल! हूल! का नारा लगाते हुए चल दिये.

1935 में प्रकाशित अंग्रेज प्रशासक आर कांस्टेयर्स ने अपनी लिखी औपन्यासिक किताब ‘हाड़माज विलेज’ के जरिये ब्रिटिश दस्तावेजों में दर्ज ‘हूल’ के कारणों की पड़ताल और तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक व प्रशासनिक स्थितियों से अवगत कराते हुए जो सवाल उठाये, विडंबना है कि कमोबेस वे आज भी कायम हैं. इसे रेखांकित करते हुए आजाद भारत के जाने-माने मानवशास्त्री, इतिहासकार और छोटानागपुर क्षेत्र के बेहद लोकप्रिय प्रशासक रहे कुमार सुरेश सिंह ने भी गंभीरता से मुद्दा उठाया.

उनकी पुस्तक ‘बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन’ की भूमिका लिखते हुए लंदन विश्व विद्यालय के ‘स्कूल ऑफ ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज’ के विद्वान क्रिस्टोफर फौन फ्यूरेर हैमनडोर्फ ने स्पष्टतः लिखा कि ये दुखद विद्रोह कदापि न होते, यदि तत्कालीन सरकारों ने आदिवासियों-ग्रामीणों का दर्द समझ ली होती और उनको दूर करने के लिए समय रहते सही कदम उठाये होते.

अंत में उन्होंने यह भी कहा कि बिरसा मुंडा आन्दोलन से जो सबक मिलता है, उसे आधुनिक प्रशासन भूल न जाये. विकास के नाम पर पिछड़े जनजातीय समाज को किसी जोर-जबरदस्ती या डरा-धमका कर अपना दृष्टिकोण या जीवन-पद्धति बदलने के लिए बाध्य करना नुकसानदेह होगा.

इन्हीं संदर्भों में हमें यह सनद रखने की नितांत आवश्यकता है कि 1855 के संताल-हूल ने ही इतिहास में दर्ज भारतीय स्वतंत्रता के 1857 के प्रथम महासंग्राम की मजबूत बुनियाद रखी थी. हूल की प्रेरणा के साथ-साथ उसके सवाल आज भी लोकतांत्रिक राज-समाज के लिए एक जरूरी कार्यभार बन कर हमारे समक्ष उपस्थित हैं.

हूल आज भी है प्रासंगिक

रांची : 1855 में संथाल हूल हुआ था. स्थानीय जमींदारों अौर अंग्रेजों के खिलाफ सिदो-कान्हू, चांद-भैरव अौर फूलो झानो के नेतृत्व में बड़ी संख्या में संथालों ने भोगनाडीह की धरती पर संघर्ष किया था. हूल की प्रासंगिकता के विषय में हमने आदिवासी समाज के बुद्धिजीवी अौर सामाजिक अगुओं से बातचीत की. प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश :

सिदो-कान्हू के साथ जितने भी लोगों ने अपना खून बहाया है, वह निश्चित रूप से हमारे लिए प्रेरक हैं. आज भी कई कंपनियां जमीन, जंगल, पानी को लूटने के लिए खड़ी है. 2018 का हूल दिवस हमें पुराने इतिहास की याद दिला रहा है अौर यह बता रहा है कि स्थिति अब भी वही है अौर हमें एक नये हूल के साथ लड़ना है, संघर्ष करना है, अपनी भाषा, संस्कृति, जंगल को बचाने के लिए.

दयामनी बरला, सामाजिक कार्यकर्ता

1855 में जो हूल हुआ, उसकी वजह थी धन, धरती, धर्म, भात अौर इज्जत. इनके खिलाफ सिदो-कान्हू अौर उस क्षेत्र के हजारों लोगों ने संघर्ष किया. 30 हजार लोग हूल विद्रोह के दौरान मारे गये. इतना बड़ा नरसंहार शायद ही कभी हुआ हो. आज भी जो विकास का मॉडल है, वह आदिवासी जनता के अनुकूल नहीं है. पहले हमारे विकास में अंग्रेज बाधक थे. अब सरकार है.

गिरिधारी राम गोंझू, बुद्धिजीवी

सिदो कान्हू के नेतृत्व में लड़ा गया हूल, बिरसा आंदोलन सभी का मूल कारण लगभग एक जैसा ही रहा. हूल की प्रासंगिकता आज भी है. आदिवासी संघर्ष के लिए ही पैदा हुआ है. अगर संघर्ष नहीं करेगा, तो वह बचेगा नहीं. यह शांतिप्रिय समाज है अौर अगर इस पर हमला हुआ है, तो वह संघर्ष करेगा ही. बिरसा या सिदो कान्हू ने धर्म के लिए नहीं जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष किया था.

रतन तिर्की, सदस्य टीएसी

हूल विद्रोह हुआ था अपनी संस्कृति, परंपरा, जमीन अौर अस्तित्व की रक्षा के लिए. आज सरकार हूल दिवस पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम करती है, पर इस आयोजन का कोई मतलब नहीं है, अगर हूल के उद्देश्यों को नहीं समझा जाता, हूल के शहीदों को सम्मान नहीं दिया जाता. आदिवासियों के लिए प्रावधान निम्न हो रहे हैं. जिस उद्देश्य से राज्य बना था, वह पूरा नहीं हो पा रहा है.

प्रभाकर तिर्की, बुद्धिजीवी

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