खतरे में धरती: बाली में अगुंग ज्वालामुखी विस्फोट से, बदल सकती है धरती की आबोहवा

बाली ज्वालामुखी विस्फोट आनेवाले दिनों में क्या रूप धारण करेगा, इस पर विशेषज्ञों में अनिश्चितता है. यहां के ज्वालामुखी विस्फोटों ने अतीत में धरती की जलवायु पर गंभीर असर डाला है. इस वजह से यह कयास लगाया जा रहा है कि मौजूदा विस्फोट अल्प समय के लिए हमारे ग्रह के तापमान को कुछ कम कर […]
बाली ज्वालामुखी विस्फोट आनेवाले दिनों में क्या रूप धारण करेगा, इस पर विशेषज्ञों में अनिश्चितता है. यहां के ज्वालामुखी विस्फोटों ने अतीत में धरती की जलवायु पर गंभीर असर डाला है. इस वजह से यह कयास लगाया जा रहा है कि मौजूदा विस्फोट अल्प समय के लिए हमारे ग्रह के तापमान को कुछ कम कर सकता है. अगुंग पहाड़ के ज्वालामुखी पर विश्लेषण के साथ दुनिया के ऐसे खास पहाड़ों के इतिहास और वर्तमान की पड़ताल के साथ प्रस्तुत है आज का इन-डेप्थ…
इंडोनेशिया के माउंट अगुंग में ज्वालामुखी विस्फोट भयावह रूप धारण करता जा रहा है. बाली द्वीप पर उबल रही यह ज्वालामुखी अगले क्षण क्या रुख अपनायेगी, इसे न तो स्थानीय अधिकारी समझ पा रहे हैं आैर न ही जियोलॉजिस्ट. दूसरी ओर, इसका प्रस्फुटन गंभीर होता जा रहा है और यदि यह अधिक दिनों तक होता रहा, तो पर्यटन व कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस द्वीप के लिए यह घातक होगा.
वैश्विक तापमान पर अगले कई महीनों या फिर वर्षों तक इसका असर दिखेगा. माउंट अगुंग में सक्रिय विस्फोट भले ही एक सप्ताह पहले शुरू हुआ है, लेकिन इसकी गड़गड़ाहट अगस्त में ही शुरू हो चुकी थी. ‘बीबीसी’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तब से 1,40,000 से अधिक लोग इस इलाके को छोड़ चुके हैं.
पाइरोक्लास्टिक प्रवाह का खतरा!
वर्ष 1963 में भी इस ज्वालामुखी के विस्फोट से कुछ माह के दौरान करीब 1,600 लोग मारे गये थे. इनमें से ज्यादातर की मौत विस्फोट से पैदा हुई पाइरोक्लास्टिक प्रवाह के कारणों से जुड़ी है. विस्फोट से पैदा हुई पाइरोक्लास्टिक प्रवाह राख, मलबों और गर्म गैस की तेजी से मूव करने वाली दीवार की तरह है, जो पहाड़ से इतर प्रवाहित होती है. निश्चित तौर पर यह ज्वालामुखी हिमस्खलन था.
अमेरिका के जियोलॉजिकल सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पाइरोक्लास्टिक प्रवाह अपनी राह में आने वाली तकरीबन सभी चीजों को नष्ट कर देगी. इसमें राख से लेकर बड़े पत्थरों के आकार के विविध आकार वाले टुकड़े 50 मील प्रति घंटे से अधिक की स्पीड से मैदानों की ओर प्रवाहित होते हैं और अपनी राह में आने वाले सभी ढांचों को नेस्तनाबूद करते हुए मलबे में तब्दील कर देते हैं.
फिलहाल अनुमान मुश्किल
उस विस्फोट की यादें फिर ताजा हो गयीं, जब इंडोनेशिया के नेशनल डिजास्टर अथॉरिटी ने इसे देश के उच्चतम प्राकृतिक आपदा के रूप में चिह्नित करते हुए इस पहाड़ के 7.5 मील के दायरे को पूरी तरह से खाली करा दिया. इस इलाके में 20 से अधिक गांव हैं, जिनकी आबादी करीब एक लाख है. वाशिंगटन स्थित कारनेगी इंस्टीट्यूशन में जियोलॉजिस्ट डायना रोमन के हवाले से ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है, ‘अगुंग की मौजूदा सक्रियता का स्तर फिलहाल कम है, भले ही इसके चलते स्थानीय विमान सेवाओं और आबादी पर उल्लेखनीय रूप से असर पड़ा हो.’ हालांकि, डायना ने इस ओर चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यह ज्वालामुखी आगे क्या रुख अपनायेगी, इसका अनुमान लगा पाना संभव नहीं है. यह विस्फोट और अधिक गंभीर रूप अख्तियार करेगा, या इसी तरह से जारी रहेगा या थम जायेगा, इसे समझने के लिए हमारे पास कोई आधार नहीं है.
वैश्विक तापमान पर असर का अंदेशा!
महज कुछ सूचनाओं के आधार पर अधिकारी भी किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं. वैसे, मंगलवार को एक छोटा भूकंप आया था, जिससे इसके और घातक होने का अंदेशा जताया जा रहा है. विशेषज्ञों को आशंका है कि इसका असर बाली से आगे तक होगा और इससे वैश्विक वायुमंडल भी प्रभावित होगा.
संक्षिप्त में कहें तो राख के कणों से पूरा क्षेत्र आच्छादित होगा और धूलकणों की परत जमने के कारण सूरज की किरणें धरती तक नहीं पहुंच पायेंगी. लंबे समयांतराल में वायुमंडल में जल की बूंदों के साथ सल्फर डाइऑक्साइड घूल जायेंगी और पूरी दुनिया में इनके फैलने से अगले तीन सालों तक सूर्य की किरणों को धरती तक पहुंचने में बाधा पहुंच सकती है. इससे औसत वैश्विक तापमान में उल्लेखनीय रूप से बढ़ोतरी हो सकती है.
वर्ष 1991 में फिलीपींस में माउंट पिनाट्यूबो अचानक ही सुलग उठा था. अलास्का प्रायद्वीप के नोवारुप्ट में वर्ष 1992 में हुए ज्वालामुखी विस्फोट के बाद से यह सबसे बड़ा विस्फोट था. लावा, राख और चट्टानों के विस्फोट से वायुमंडल में सल्फ्यूरिक एसिड एयरोसोल के तौर पर कृत्रिम बादल का निर्माण हो गया. ये बादल तेजी से पूरी धरती पर फैलते गये और महज सालभर के भीतर पूरी दुनिया में आच्छादित हो गये. इससे धरती का तापमान करीब एक डिग्री तक कम हो गया. यहां तक कि वर्ष 1993-94 में अल नीनो भी माउंट पिनाट्यूबो में हुए विस्फोट के असर को कम नहीं कर सका और अगले कई सालों तक इसका प्रभाव दिखा.
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा
बड़े ज्वालामुखी विस्फोट जलवायु परिवर्तन के दूसरे आयामों को भी मंद कर सकता है. पिछले वर्ष जारी एक शोध रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि वर्ष 1991 में फिलीपींस में माउंट पिनाट्यूबो में हुए विस्फोट से समुद्र उल्लेखनीय रूप से शीतल हुए, जिससे उसके स्तर में होने वाली बढ़ोतरी पर व्यापक असर देखा गया.
डायना रोमन का कहना है कि 1963 में माउंट अगुंग में हुआ विस्फोट ‘मॉडरेट’ आकार का था, लेकिन मौजूदा उबाल के मुकाबले उससे कहीं अधिक मात्रा में गैस का उत्सर्जन हुआ, जिससे अगले एक साल तक समूची धरती पर शीतलता का असर देखा गया था. फिलहाल बड़ी दिक्कत यह है कि हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि क्या अगुंग महज उबल रहा है या फिर व्यापक विस्फोट की राह पर अग्रसर है. यदि यह विस्फोट और तीव्र होगा, तो निश्चित रूप से वैश्विक तापमान पर इसका असर होगा. लेकिन यह इस बात पर निर्भर होगा कि इससे किस प्रकार की और कितनी मात्रा में राख और गैस निकलेगी. दूसरे शब्दों में कहें, तो 1960 के दशक में इसने जिस तरीके से धरती को प्रभावित किया था, उससे बिल्कुल अलग तरीके से असर डाले. फिलहाल कुछ भी कहना मुश्किल है.
सक्रिय ज्वालामुखी – जिस ज्वालामुखी में 10,000 वर्षों में कम-से-कम एक बार विस्फोट होता हो, उसे सक्रिय ज्वालामुखी माना जाता है.
सुप्त ज्वालामुखी – वैसी सक्रिय ज्वालामुखी, जिसमें कुछ समय से विस्फोट नहीं हो रहा हो, लेकिन भविष्य में ऐसी संभावना हो, सुप्त ज्वालामुखी कहलाती है.
मानव-इतिहास के भयावह ज्वालामुखी विस्फोट
1. माउंट उंजेन, जापान
जापान के इतिहास का यह सबसे भयावह विस्फोट 1792 में हुआ था जिसमें 12 से 15 हजार लोगों की मौत हुई थी. यह नागासाकी के पूर्व में है.
2. नेवादो देल रुइज, कोलंबिया
वर्ष 1985 की 13 नवंबर को हुए इस ज्वालामुखी विस्फोट में 23 हजार के करीब लोग मरे थे और अर्मेरो शहर मलबे में दफन हो गया था.
3. माउंट क्राकाटोआ, इंडोनेशिया
वर्ष 1883 में 16 से 28 अगस्त के बीच हुए विस्फोटों में 36 हजार लोगों की मृत्यु हुई थी. इस विस्फोट के धमाकों की आवाज ऑस्ट्रेलिया तक सुनी गयी थी.
4. माउंट पेली, वेस्ट इंडीज
1902 में 25 अप्रैल और आठ मई के बीच घटी इस त्रासदी में 40 हजार लोग मरे थे. सेंट पियरे शहर बर्बाद हो गया था और सिर्फ दो लोग बच सके थे.
5. माउंट तंबोरा, इंडोनेशिया
वर्ष 1816 में 10 से 15 अप्रैल के बीच हुए विस्फोट को मानव इतिहास की सबसे बड़ी ज्वालामुखी त्रासदी मानी जाती है. इसमें करीब एक लाख लोग मारे गये थे. उस साल गैस और मलबों की वजह से गर्मी नहीं पड़ी थी.
एक लाख से अधिक आबादी प्रभावित
बाली के माउंट अगुंग ज्वालामुखी में पिछले कुछ दिनों के अंतराल में कई विस्फोट हुए हैं. इस कारण राख का गुबार और धुआं 6,000 मीटर ऊंचाई तक फैल गया है. बाली की राजधानी डेनपासर और पड़ोसी द्वीप लोमबोक से इस गुबार को देखा जा सकता है. विस्फोट की वजह से बाली के हवाई अड्डों को बंद कर दिया गया है, जिससे 196 अंतरराष्ट्रीय और 249 घरेलू उड़ानें रद्द कर दी गयी हैं़ करीब 89 हजार यात्री वहां फंस गये हैं. इंडोनेशिया में 120 ज्वालामुखी सक्रिय हैं, जो कभी भी फट सकते हैं.
10 सबसे खतरनाक सक्रिय ज्वालामुखी
1. मौना लोआ, हवाई
अमेरिका के हवाई द्वीप का मौना लोआ ज्वालामुखी क्षेत्र के हिसाब से विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी है. 1984 के बाद से इसमें विस्फोट नहीं हुआ है.
2. ताल ज्वालामुखी
यह फिलीपींस के लुलोन द्वीप के एक झील में स्थित है. यह फिलीपींस के सक्रिय ज्वालामुखी में से एक है. इसमें कई भयंकर विस्फोट हो चुके हैं. सबसे भयंकर विस्फोट 1911 में हुआ था, जिसमें हजारों लोग मारे गये थे. अंतिम बार 1977 में इसमें विस्फोट हुआ था.
3. उलावुन
उलावुन पापुआ न्यूगिनी का सबसे ज्यादा सक्रिय और खतरनाक ज्वालामुखी है. इस ज्वालामुखी में पहला विस्फोट वर्ष 1700 में हुआ था और अब तक यह 22 बार फट चुका है. वर्ष 2010 में इसमें अंतिम बार विस्फोट हुआ था और इससे निकले राख का गुबार 3.7 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था.
4. माउंट निरागोंगो
यह अफ्रीका का सबसे ज्यादा सक्रिय ज्वालामुखी माना जाता है. 1882 से अब तक इसमें 34 बार विस्फोट हो चुका. 2002 में इसमें आखिरी बार विस्फोट हुआ था़
5 माउंट मेरापी
इंडोनेशिया का यह सबसे सक्रिय ज्वालामुखी है. 1548 से इसमें विस्फोट हो रहा है. यह 10,000 वर्षों से सक्रिय है. इसमें हर दूसरे-तीसरे वर्ष छोटे और 10 से 15 वर्षों में बड़े विस्फोट होते हैं.
6. गैलेरास, कोलंबिया
गैलेरास ज्वालामुखी दस लाख वर्षों से सक्रिय है. पहला विस्फोट 1580 में हुआ था. 10 वर्ष तक सुप्त रहने के बाद यह 1988 में एक बार फिर सक्रिय हो गया. वर्ष 2000 में हुए दो विस्फोट के बाद से इसमें लगभग हर वर्ष विस्फोट हुआ है. 2010 में यह अंतिम बार फटा था.
7. साकुराजिमा, जापान
पहले यह एक द्वीप था. इस ज्वालामुखी में हर वर्ष हजारों विस्फोट होते हैं. 45 वर्षों में इसमें लगभग 7,300 विस्फोट हो चुके हैं.
8. प्रोपोकैटेपेल्ट
यह मेक्सिको का दूसरा सबसे ऊंचा ज्वालामुखी है.1519 से अब तक इसमें 20 विस्फोट हो चुके हैं. 1994 से यह फिर सक्रिय हो चुका है. अंतिम बार 2000 में फटा था.
9. माउंट वेसुवियस
इटली के इस ज्वालामुखी में अाखिर बार 1944 में विस्फोट हुआ था. दो सप्ताह तक इसमें विस्फोट होता रहा था. यह विश्व के सबसे खतरनाक विस्फोट में से एक था.
10. येलोस्टोन कैलडेरा
इसे सुपर-वोल्केनो भी कहते हैं क्योंकि अब तक जितने भी ज्वालामुखी फटे हैं, उनसे हजार गुना ज्यादा बड़ा विस्फोट करने की क्षमता इसमें है.
विश्व के 10 सुप्त ज्वालामुखी
1. मौना कीया : हवाई द्वीप पर स्थित यह ज्वालामुखी अंतिम बार ईसा के जन्म से 2460 वर्ष पूर्व फटा था.
2. माउंट टेल्डे : स्पेन के केनारी द्वीप पर स्थित इस ज्वालामुखी में वर्ष 1909 से एक भी विस्फोट नहीं हुआ है.
3. सेटे सिडेड्स : पुर्तगाल के साओ मिगुएल द्वीप स्थित यह ज्वालामुखी 22 हजार वर्षों से सुप्तावस्था में है.
4. माउंट अरारात : तुर्की के माउंट अरारात ज्वालामुखी में अंतिम बार 1840 में विस्फोट हुआ था.
5. सोलफतारा : दक्षिण इटली का यह ज्वालामुखी 1158 में अंतिम बार फटा था. इससे अब भी लगातार सल्फ्यूरस गैस निकलता रहता है.
6. माउंट हुड : अमरिका स्थित माउंट हुड ज्वालामुखी में अंतिम बार 170 से 220 वर्षों पूर्व विस्फोट हुआ था.
7. अगुआ डे पाउ : साउ पाउलो द्वीप स्थित यह ज्वालामुखी 1564 से ही सुप्त अवस्था में है.
8. माउंट राल्नेर : यह ज्वालामुखी 1894 के बाद से ही सुप्त अवस्था में है.
9. माउंट शास्ता : कैलिफोर्निया स्थित माउंट शास्ता ज्वालामुखी में आखिरी बार 224 वर्ष पहले विस्फोट हुआ था.
10. माउंट कीमांजारो : इसमें 360,000 वर्ष पूर्व विस्फोट हुआ था.
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