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झारखंड : ट्रांसफर-पोस्टिंग में करोड़ों का खेल,मंत्री भी लगे हैं सौदेबाजी में

रांची : झारखंड के एक जिला अभियंता का तबादला करवाने, फिर उसे रुकवाने में लगभग एक करोड़ का खेल हुआ. इनके ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए दो मंत्री तक पैरवी पहुंची.जिला अभियंता 10 साल से एक ही जगह जमे हुए थे. पहले उनका तबादला हुआ. उन्हें अपने पैतृक विभाग में जाने का आदेश भी निकल […]

रांची : झारखंड के एक जिला अभियंता का तबादला करवाने, फिर उसे रुकवाने में लगभग एक करोड़ का खेल हुआ. इनके ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए दो मंत्री तक पैरवी पहुंची.जिला अभियंता 10 साल से एक ही जगह जमे हुए थे.

पहले उनका तबादला हुआ. उन्हें अपने पैतृक विभाग में जाने का आदेश भी निकल गया. जैसे ही जिला अभियंता को पता चला कि 30-35 लाख के लिए उनका तबादला किया जा रहा है, वे पहुंच गये एक ताकतवर मंत्री के पास. प्रस्ताव दिया कि जितने पैसे के लिए उनका तबादला कर रहे हैं, उससे चार-पांच लाख ज्यादा देने को तैयार हैं. पैसा लीजिए और तबादला रोकिए. मंत्री को सौदा घाटे का नहीं लगा. बस, रुक गया तबादला.

इस खेल में एक सीनियर अधिकारी भी शामिल थे, जिन्हें लगभग 20 लाख मिलने की सूचना है. एक-दो और बिचौलिये को भी कुछ राशि मिली. झारखंड का हाल यह है कि यहां मुख्यमंत्री को पता भी नहीं चलता और ट्रांसफर के नाम पर करोड़ों का खेल हो जाता है.चर्चा है कि एक मंत्री के करीबी अभियंता की इच्छा हुई कि वह भी जिला अभियंता बनें. उन्होंने मंत्री से बात की. 30 लाख में बात हुई.

जिला अभियंता तभी बनते, जब वह पद खाली होता. इसके लिए जिला अभियंता का तबादला करना था. तबादले का आदेश भी निकल गया. उक्त अभियंता ने उस मंत्री को 30 लाख का भुगतान भी कर दिया. जैसे ही 10 साल से जमे जिला अभियंता को खबर मिली कि उनका तबादला कर दिया गया है, उन्होंने एक दूसरे ताकतवर मंत्री को पकड़ कर ऑफर दे डाला.

अभियंता की दलील थी कि जितने पैसे के लिए आप तबादला कर रहे हैं, ट्रांसफर रोकने के लिए उससे ज्यादा वे देने को तैयार हैं. मंत्री मान गये. उन्होंने जिला इंजीनियर के लिए पीत पत्र भी लिखा. इस प्रकार जिला अभियंता की कुरसी भी बच गयी. चर्चा तो यह है कि जब जिला अभियंता का तबादला रोक दिया गया, तो जिस मंत्री ने तबादला करवाने के लिए 30 लाख लिया था, काम न होने पर उसने पैसा अभियंता को वापस कर दिया. जिला अभियंता काफी ताकतवर हैं. उन्होंने न सिर्फ तबादला रुकवाया, बल्कि पैतृक विभाग लौटने के आदेश पर भी रोक लगवा दी.

(नोट : खबर पक्की है, पर पैसे के लेन-देन का प्रमाण न होने के कारण हम पाठकों के लिए उक्त मंत्री या जिला अभियंता का नाम नहीं छाप पा रहे हैं.)

– मुख्य बातें

* जिला अभियंता का तबादला करवाने और फिर उसे रुकवाने में चली पैरवी

* एक मंत्री ने तबादला करवाया, दूसरे ने रुकवाया

* खेल में एक सीनियर अधिकारी भी शामिल

– 100 करोड़ से ज्यादा का काम देखते हैं जिला अभियंता

जिला अभियंता की अनुमति से ही जिले में ज्यादातर काम होते हैं. पंचायतों में होनेवाले विकास कार्य को धरातल पर उतारने की जिम्मेवारी जिला अभियंता की ही होती है. जिला अभियंता ही पंचायतों में होनेवाले सभी तरह के निर्माण कार्य का टेंडर फाइनल करते हैं. आम तौर पर एक साल में जिला अभियंता करीब सौ करोड़ रुपये का काम कराते हैं. टेंडर में निर्धारित कमीशन के रूप में मिलनेवाली धनराशि को जिला अभियंता की आय का बड़ा स्त्रोत माना जाता है.

।। विवेक चंद्र की रिपोर्ट ।।

– केस 2

* धान उत्पादन के आंकड़े में अंतर

झारखंड के सरकारी विभागों में कैसे काम होता है, कितना तालमेल है, इसका उदाहरण है, केंद्र को धान के उत्पादन पर भेजी गयी रिपोर्ट. झारखंड सरकार के दो विभागों ने केंद्र को अलग-अलग आंकड़ा भेजा है. उत्पादन कम हुआ और आंकड़ा ज्यादा का दिखाया गया होगा, तो यह अपराध है. इससे देश की खाद्यान्न योजना के प्रभावित होने का डर रहेगा.

* केंद्र को दो रिपोर्ट भेजी, एक फर्जी

झारखंड में धान के उत्पादन पर कृषि और सांख्यिकी विभाग द्वारा केंद्र सरकार को जो आंकड़े भेजे गये हैं, उनमें किसी एक के फर्जी होने की आशंका है. दोनों विभाग झारखंड सरकार के ही हैं. पर दोनों की रिपोर्ट में दोगुने का फर्क है. दोनों विभागों ने दावा किया है कि उनकी रिपोर्ट सही है. भारत सरकार सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट को सही मानता है और उसी आधार पर योजना तैयार करता है. यह रिपोर्ट 2011-12 की है. उस साल कृषि विभाग ने झारखंड में 5614.93 हजार मीट्रिक टन धान उत्पादन का दावा किया था, जबकि सांख्यिकी विभाग ने सिर्फ 2129.35 हजार म्ीट्रिक टन उत्पादन होने का प्रोविजनल आंकड़ा केंद्र को भेजा है, यानी आधा से भी कम.

कृषि विभाग ने अपने आंकड़े को स्टेट एग्रीकल्चरल मैनेजमेंट एंड एक्सटेंशन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (समेति) के ऑफिशियल वेबसाइट पर भी डाला है. हर साल कृषि विभाग और सांख्यिकी विभाग द्वारा केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी जाती है. 2007-08 से 2011-12 तक के आंकड़े में अंतर पाया गया है लेकिन सबसे अधिक अंतर 2011-12 के आंकड़े में है.

* दो विभागों में हैं दूरियां : अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय ने उत्पादन का आंकड़ा मांगने के लिए कई बार कृषि विभाग को पत्र लिखा लेकिन कृषि विभाग ने इसका उत्तर नहीं दिया. जब भारत सरकार के योजना मंत्रालय से बार-बार 2011-12 में धान उत्पादन का आंकड़ा मांगा गया तो अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय ने प्रोविजनल डाटा केंद्र को भेज दिया. इस रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि राज्य में भदई में 1890.18 हजार एमटी और अगहनी में 1940.33 एमटी धान का उत्पादन हुआ है.

* उत्पादन निकालने का फॉरमूला : कृषि विभाग और अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग फसल उत्पादन का आकलन अलग-अलग करता है. कृषि विभाग के उप निदेशक (योजना) एसएस अग्रवाल बताते हैं कि कृषि विभाग समय-समय पर खेती और रकबा का आकलन करता है. उत्पादन क्षेत्र को बढ़ाता रहता है. इस कारण उत्पादन बढ़ता है. कटाई के समय कृषि, सहकारिता और अंचल के कर्मचारी मिल कर हरेक अंचल में 30-30 प्लॉट पर फसल कटाई का आकलन करते हैं. उसी के आधार पर अंचल में की गयी खेती के उत्पादन को निकाला जाता है. इसी तरह जिले और फिर राज्य का आंकड़ा देखा जाता है. इसमें इसका भी मिलान कराया जाता है कि कितनी जमीन पर खेती की गयी. कितना बीज विभाग ने बांटा. बीज की उत्पादकता की स्थिति क्या है. कुल मिला कर उत्पादन का आकलन होता है.

सांख्यिकी विभाग के पास हर अंचल का खाता-खेसरा होता है. खाता खेसरा के आधार पर खेती का रकबा तैयार होता है. फसल कटाई के समय सांख्यिकी विभाग के कर्मचारी एक खेत में डेढ़ डिसमिल में फसल की कटाई पर नजर रखते हैं. उससे हरा धान लिया जाता है. इसका वजन लिया जाता है. एक सप्ताह सुखाने के बाद फिर फिर वजन लिया जाता है. इसके आधार पर उत्पादन का आकलन किया जाता है. धान सूख जाने के कारण वजन कम हो जाता है. किसान भी धान की फसल को सुखाने के बाद ही कुटाई के लिए भेजते हैं.

– क्या होगा असर

* केंद्र सरकार सांख्यिकी विभाग के आधार पर ही योजना बनाती है

* आंकड़ों में अंतर होने से देश और राज्य से संबंधित योजना पूर्ण नहीं बन पायेगी

– दोनों विभागों के आंकड़े में तालमेल हो, इसकी कोशिश की गयी है. दोनों विभागों को फसल उपज निकालने का तरीका अलग-अलग है. इस कारण एक समयबद्ध योजना तैयार की गयी है. उम्मीद है कि आनेवाले वर्षों में इस समस्या को हम दूर कर पायेंगे.

डॉ नितिन कुलकर्णी, सचिव, कृषि विभाग

।। मनोज सिंह की रिपोर्ट ।।

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