सोचने-समझने और विभिन्न गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इनसान अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करता है. लेकिन, किसी के दिमाग में क्या चल रहा है, इसे तब तक समझना आसान नहीं है, जब तक कि वह खुद न बताये. हालांकि, अमेरिकी सेना ब्रेन-कंप्यूटर-इंटरफेस के रूप में एक ऐसा सिस्टम विकसित करने में जुटी है, जिससे भविष्य में कंप्यूटर हमारे दिमाग को पढ़ने में सक्षम हो सकता है.
इससे हाथ-पैर के उपयोग के बिना हमारा दिमाग ही कंप्यूटर को जरूरी निर्देश भी दे सकेगा. अमेरिका में चल रही इस कोशिश पर पूरी दुनिया की नजर है. इस कवायद की अब तक की कामयाबी समेत इससे जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में बता रहा है आज का नॉलेज…
– शंभू सुमन
व ह दिन दूर नहीं जब मानव का मस्तिष्क अत्याधुनिक कंप्यूटर के जरिये संचालित होने लगेगा और वह व्यक्ति के विचारों को पढ़ने में सक्षम हो जायेगा. इससे दिमाग का रिश्ता हमारे लिए कितना मददगार साबित होगा, वैज्ञानिक इसकी संभावनाएं तलाशने में जुटे हैं. सेना में साइबॉर्ग सोल्जर, मेडिकल सेक्टर में सर्जरी, टेलीपैथी, किसी प्रकार की शारीरिक अक्षमता के उपचार या परिवहन में इसका इस्तेमाल की योजनाएं बनायी जा रही है.
यहां यह जानना रोचक होगा कि इनसान द्वारा बनाये गये कंप्यूटर के साथ भविष्य में कैसा संवाद कायम होनेवाला है, जिसमें दिमाग सीधे तौर पर कंप्यूटर से संपर्क स्थापित कर लेगा. अर्थात् न माउस होगा, न कीबोर्ड और न ही कर्सर! यह सब इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नियंत्रित करने के नये तरीके के दरवाजे खोल सकता है, तो दिव्यांगों (शारीरिक अशक्तों) के लिए वरदान साबित हो सकता है.
यह किसी साइंस फिल्म या फिक्शन की तरह नहीं, बल्कि हकीकत में बदलने जैसे कुछ प्रयोग और किये जानेवाले प्रदर्शनों के आधार पर कहा जा सकता है कि भविष्य में कार चलाता हुआ व्यक्ति अपनी कार को दायें-बायें मुड़ने, आगे बढ़ने या रुकने का आदेश केवल अपनी सोच से ही दे दे सकता है.
इसके लिए स्टेयरिंग को हाथ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. दूर बैठे किसी रोगी के दिमाग में डाॅक्टर की महत्वपूर्ण सूचना के संकेत मिल जायेंगे और उसका उपचार आसान हो जायेगा. यह भी मुमकिन है कि कोई व्यक्ति बगैर रिमोट का बटन दबाये ही सामने टीवी का चैनल बदलने की सोचे और वह बदल जाये. यह कहें कि हम केवल सोचें और सामनेवाला व्यक्ति हमारी मनोभावना को समझ ले कि हम उसके लिए क्या करनेवाले हैं. इस संदर्भ में कुछ भविष्यद्रष्टा वैज्ञानिकों का दावा है कि आनेवाले कुछ सालों में इनसान जब अपने दिमाग को कंप्यूटर पर अपलोड करने में कामयाब हो जायेगा, तब यह संभव हो पायेगा. इस दिशा में वैज्ञानिकों को ब्रेन-कंप्यूटर-इंटरफेस बनाने में कामयाबी हासिल हो चुकी है.
मस्तिष्क में चिप का प्रत्यारोपण
कंप्यूटर द्वारा दिमाग को पढ़ने की दिशा में किये जा रहे प्रयोगों से मिली अब तक की सफलता से संभव है कि वह हमारे विचार को समझने में सक्षम हो जाये. अमेरिकी सेना में ‘साइबॉर्ग सोल्जर’ के रूप में इसके व्यापक स्तर पर इस्तेमाल की योजना बनायी गयी है. (साइबॉर्ग सोल्जर का अर्थ ऐसे काल्पनिक इनसान से है, जिसके शरीर में मैकेनिकल तत्वों को निर्मित करते हुए उसकी भौतिक क्षमताओं का दायरा सामान्य इनसान के मुकाबले ज्यादा व्यापक किया जाता है). इस संबंध में विकसित की जा रही नयी परियोजना के तहत मानव मस्तिष्क में एक खास चिप का प्रत्यारोपण किया जा सकता है.
इसके लिए वैज्ञानिक कंप्यूटर का इनसानी दिमाग के साथ सीधे संवाद कायम करने का तरीका निकालने में जुटे हुए हैं. अमेरिकी सेना की डिफेंस एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (डीएआरपीए) के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों ने इसके लिए प्रत्यारोपित चिप्स विकसित करने संबंधी एक कार्यक्रम शुरू किया है.
उनका कहना है कि इस तरह की तंत्रिका प्रत्यारोपण का उद्देश्य कंप्यूटर के इस्तेमाल को और तेज करना, उसे 100 फीसदी सक्षम बनाना और विभिन्न इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों के नये क्षेत्र में उपयोग के वैसे तरीके निकालना है, जो केवल अपने विचारों के जरिये ही नियंत्रित किये जा सकें. डीएआरपीए के अनुसार, यह मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा प्रयोग में आने वाले इलेक्ट्रो-केमिकल लैंग्वेज को इलेक्ट्रॉनिक मशीनों यानी कंप्यूटर के लिए महत्वपूर्ण डिजिटल बाइनरी नंबर (0 और 1) के संकेतों में बदल देगा. एजेंसी का इस बारे में कहना है कि मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किये जानेवाले छोटे चिप के आकार से भी यह काफी छोटा हो सकता है.
हालांकि, न्यूरल इंजीनियरिंग सिस्टम डिजाइन प्रोग्राम के फिलिप अवेल्डा का कहना है कि इस तकनीक का उद्देश्य ब्रेन-कंप्यूटर कम्युनिकशन के मौजूदा प्रयासों में आ रही समस्याओं पर काबू पाना भी है. जब ये उपकरण मस्तिष्क की विद्युतीय गतिविधियों का पता लगा सकते हैं, तब इनके इस्तेमालकर्ता को ध्यान केंद्रित करने और विशेष तरह के प्रशिक्षण के दौर से गुजरने की जरूरत होती है.
अवेल्डा के अनुसार, मौजूदा अच्छा ब्रेन-कंप्यूटर-इंटरफेस सिस्टम दो सुपर कंप्यूटरों द्वारा एक पुराने 300 ब्रॉड मोडम का इस्तेमाल करते हुए आपस में बातें करने की कोशिश जैसा ही है. कल्पना करें जब हम अपने उपकरणों को उन्नत बना लेंगे तो यह कितना उपयोगी बन जायेगा. ये उपकरण मानव मस्तिष्क और आधुनिक इलेक्ट्राॅनिक्स के बीच नया चैनल खोलने या आपसी तालमेल बिठाने में सक्षम हो जायेंगे.
इसके साथ ही यह परियोजना तंत्रिका संबंधी विकार के लिए नये उपचार की राहें भी बन जायेंगी. इस तरह बननेवाले उपकरणों से दृष्टि बाधितों में देखने और श्रवण बाधितों में सुनने की क्षमता विकसित की जा सकती है. इस नयी तकनीक की मदद से कंप्यूटर जल्द ही उपयोगकर्ता के दिमाग को उसकी जरूरतों के मुताबिक समझने लगेंगे.
ऐसे सफल हुआ ब्रेन-कंप्यूटर- इंटरफेस
पैरालाइसिस की मरीज जेन सेउरमन वह पहली महिला थीं, जिनके दिमाग में ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस यानी बीसीआइ तकनीक का इस्तेमाल किया गया. इस तकनीक के इस्तेमाल से उनके दिमाग में न्यूराॅन्स के साथ सीधे दो चिप्स प्रत्यारोपित किये गये थे. इस तरह का सबसे पहला मानव मस्तिष्क प्रत्यारोपण ब्राउन यूनिवर्सिटी के न्यूरो साइंटिस्ट जॉन डोनोगुए ने 2004 में किया था.
उस समय ये चिप्स सीधे कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से ब्रेन गेट तकनीक का उपयोग करते हुए मस्तिष्क से जुड़ गये थे. ब्रेन गेट एक ऐसा आविष्कार है, जिसकी मदद से इनसान अपने विचारों की शक्ति से बिजली के उपकरणों को नियंत्रित कर सकता है. जेन सेउरमन के मस्तिष्क में ब्रेन गेट चिप प्रत्यारोपण के बाद उसकी शिथिल भुजा में हरकत आ गयी और उसने चॉकलेट का एक टुकड़ा उठा कर मुंह में डाल लिया. दरअसल, सेउरमन 40 वर्ष की उम्र में एक बड़ी अानुवांशिक बीमारी से ग्रस्त हो गयी थी.
उसके हाथ-पैर शिथिल हो गये थे. करीब 10 वर्षों तक कठिन जीवन गुजारने के बाद ब्रेन गेट सिस्टम से उसे नया जीवन मिला. उसके बाद चिकित्सा जगत में यह संभावना प्रबल हो गयी कि किसी लकवाग्रस्त या अपाहिज व्यक्ति इसके प्रयोग से व्हीलचेयर का नियंत्रण कर सकते हैं. ब्रेन गेट चिप मस्तिष्क के विद्युत संकेतों को पढ़ता है और उसका विश्लेषण कर दूसरे अंगों को प्रेषित करता है.
चीनी मस्तिष्क कंप्यूटर-चिप डार्विन
मानव मस्तिष्क की तंत्रिका तंत्र का अनुकरण कर कंप्यूटर के कार्य को पूरा करने के उद्देश्य से चीन के झेंजियांग प्रांत में वैज्ञानिकों ने मानव मस्तिष्क के जैसा काम करनेवाली चिप का निर्माण किया है.
हांग्जो डियांजी यूनिवर्सिटी और झेंजियांग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा मिल कर बनाये गये इस विशेष चिप का नाम ‘डार्विन’ रखा गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इसमें न्यूराॅन्स सिनैप्सिस के माध्यम से कंप्यूटर और मानव मस्तिष्क एक दूसरे से जुड़े होते हैं. हांग्जो यूनिवर्सिटी के एक वैज्ञानिक के अनुसार, काले प्लास्टिक की बनी यह चिप सामान्य सिक्के के 10वें भाग से भी छोटी है, लेकिन इसमें दो हजार से अधिक न्यूरॉन्स और चार हजार सिनेप्सिस समाये हुए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रोबोट्स, हार्डवेयर सिस्टम और ब्रेन-कंप्यूटर सिस्टम के लिए यह उपयोगी है.
हालांकि, इस पर अभी बहुत काम होना बाकी है. वैसे अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनी आइबीएम भी अक्तूबर, 2013 में ट्रनर्थ नाम की मानव चिप्स बनाने मे सफल रही है. इसके बाद ही चीन ने इस तरह का चिप बनाने की योजना बनायी थी. डार्विन के विकास के साथ चीनी मस्तिष्क प्रेरित कंप्यूटर अनुसंधान के क्षेत्र में चीन अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने की कोशिश में है.
इलेक्ट्राॅनिक खून : मानव बनाम मशीन
इ नसान के दिमाग की संरचना से प्रेरित आइबीएम ने इनसानी दिमाग जैसा कंप्यूटर बनाने के क्रम में वैज्ञानिकों ने जिस द्रव का इस्तेमाल किया है, उसे कंप्यूटर का ‘इलेक्ट्रॉनिक खून’ कहा जा सकता है. इस द्रव के जरिये ही उस दिमाग जैसे कंप्यूटर को ऊर्जा मिलती है और सहजता से संचालित होता है. इनसान के दिमाग की बहुत छोटी-सी जगह में असाधारण गणना क्षमता होती है और उसके लिए मात्र 20 वॉट ऊर्जा की जरूरत पड़ती है.
आइबीएम की यही कोशिश रही कि उसके नये कंप्यूटर में भी ऐसी ही क्षमता विकसित की जा सके. इसके लिए वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर के नये ‘रिडॉक्स फ्लो तंत्र’ का इस्तेमाल किया. यह तंत्र एक ऐसी रासायनिक प्रक्रिया के तहत कार्य करता है, जिसमें एक बार ऑक्सीकरण होने पर उसकी विपरीत प्रतिक्रिया में कमी आती है. इसके जरिये ही कंप्यूटर में इलेक्ट्रॉनिक खून का प्रवाह बनता है और कंप्यूटर को बिजली मिलती है. यानी इलेक्ट्रॉनिक खून ऐसा द्रव है, जिससे बिजली प्रवाहित होती है.
इस प्रयोग की सफलता को ज्यूरिख में आइबीएम की प्रयोगशाला में डॉ पैट्रिश और डाॅ ब्रूनो मिशेल ने अक्तूबर, 2013 में एक छोटे मॉडल के तौर पर पेश किया था. उनका कहना है कि अगले 40 सालों में बड़े आकारवाले पेटाफ्लॉप कंप्यूटर को डेस्कटॉप में फिट करने लायक बनाना संभव होगा. उनकी इच्छा एक शूगर क्यूब के अंदर एक सुपर कंप्यूटर को फिट करने की है. वे कहते हैं- ऐसा तभी संभव है, जब हम इलेक्ट्रॉनिक्स में बदलाव कर लें और दिमाग से प्रेरित हो जाएं.
इनसान का दिमाग किसी कंप्यूटर के मुकाबले 10,000 गुना ज्यादा जटिल और क्षमतासंपन्न है. यह अत्यंत सूक्ष्म नलिकाओं के नेटवर्क और रक्त वाहिकाओं से गर्मी और ऊर्जा हासिल करता है.
अब यदि अमेरिका के लोकप्रिय टीवी क्विज शो ‘जियोपार्डी’ के दो चैंपियनों को हरानेवाले दिमागी क्षमता के समतुल्य कंप्यूटर ‘वॉटसन’ की बात करें, तो यह जानकारी आधारित कंप्यूटिंग के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. मशीन में मानव को पीछे छोड़ने की क्षमता हो सकती है, इसे उसी समय जान लिया गया था. इस प्रतियोगिता के मूल में तकनीकी बात मानव मस्तिष्क और वॉटसन के भीतर संचालित ऊर्जा ही थी. इनसानी प्रतिभागियों का दिमाग मात्र 20 वॉट की ऊर्जा से संचालित था, जबकि वॉटसन को 85,000 वॉट की ऊर्जा प्रदान की गयी थी. इस आधार पर वैज्ञानिकों ने दावा किया कि अगली पीढ़ी के कंप्यूटर चिप के लिए ऊर्जा दक्षता ही अहम होगी.
ब्रेन फ्लाइट प्रोजेक्ट
वि मान संचालन आसान काम नहीं और न ही इसके लिए केवल कंट्रोल पैनल संभालना पड़ता है, बल्कि मानसिक तौर पर भी सतर्क और जागरूक रहना पड़ता है. जून, 2014 में एक फ्लाइट सिमुलेटर में बैठे पायलट को हाथ का इस्तेमाल किये बगैर विमान को अपने रास्ते पर बनाये रखने और संचालन में कामयाबी मिली थी. ऐसा यूरोपीय संघ की मदद से एक ब्रेन फ्लाइट प्रोजेक्ट के तहत संभव हुआ. इसके लिए पायलट को दिमागी गतिविधियों को मापनेवाला इलेक्ट्रोड कैप पहनाया गया, जिससे विमान संचालन के समय उसका दिमाग ही आंख की भूमिका निभाने में सक्षम बन गया था और वह जॉय स्टिक की मदद से विमान का उड़ान पथ तय करने में सफल हुआ.
हालांकि, इस तकनीक का इस्तेमाल शारीरिक अशक्त पायलटों के लिए होने में अभी कई साल लगेंगे, लेकिन तब यह प्रयोग दिमागी कंट्रोल काफी चौंकाने वाला साबित हुआ. म्यूनिख के फ्लाइट सिस्टम डायनामिक्स इंस्टीट्यूट के कोऑर्डिनेटर टिम फ्रीके का कहना है कि यह तकनीक कंप्यूटर को ब्रेन-कंप्यूटर-इंटरफेस के जरिये हमारे विचारों और भावनाओं तक पहुंच को मुमकिन करते हुए उन पर काम करना और आसान बना सकता है. बर्लिन की तकनीकी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थॉर्स्टन सांडर का मानना है कि नये इंटरफेस बनाये जा सकते हैं, जो आवाज की लय, संकेतों और नकल करने की आदतों जैसी इस्तेमाल की बहुत सारी सूचनाओं का उपयोग करते हैं.
उनका कहना है कि इस समय हम टाइप कर या कर्सर घुमा कर सीधे कमांड के साथ कंप्यूटर के साथ कम्युनिकेट करते हैं. कंप्यूटर कुछ सही नहीं होने पर किसी इस्तेमाल करनेवाले की झल्लाहट को रिकॉर्ड नहीं करता है, और न ही प्रोग्राम के धीमे चलने पर होने वाली बेचैनी को दर्ज करता है, लेकिन ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस के साथ इस संबंध में कंप्यूटर को सूचनाएं दी जा सकेंगी. ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस का परीक्षण महज हवाई उड़ान के मामले में ही नहीं, बल्कि कार ड्राइवरों के दिमाग की गतिविधियों को मॉनीटर करने के लिए भी किया गया.
मरीजों के लिए मददगार
ब्रेन फ्लाइट प्रोजेक्ट की तकनीक का फायदा अस्पतालों में किया जा सकता है. इस संबंध में ऐसे सिस्टम पर काम किया जा रहा है, जिसमें सर्जन को ऑपरेशन थिएटर में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस की मदद मिल पायेगी. इसके जरिये कंप्यूटर यदि सर्जन की दिमागी हालत का आकलन कर लेगा, तो साथ में काम रहे उसके सहायकों को भी यह जानकारी दे देगा. इस बारे में सांडर कहते हैं, ‘अगर सर्जन किसी चीज पर ध्यान केंद्रित कर रहा है या कोई जटिल ऑपरेशन कर रहा है, तो इसे एक लाल बत्ती के जरिये दिखाया जा सकता है, ताकि सहायकों को पता लग जाये कि उस समय कोई सवाल नहीं करना है.’ इस सिस्टम के जरिये मानव दिमाग के बारे में सीधे संवाद या बोले बिना कंप्यूटर को निर्देश दिया जा सकता है.
बहरहाल, दो लाख सालों में इनसान के दिमाग के क्रमिक विकास का नया रूप क्या रंग दिखायेगा और जीवनशैली को कितना सरल-सहज बना पायेगा, इसका आकलन हम सभी अपनी बौद्धिकता से लगा सकते हैं, जो हैरत में डालनेवाली नहीं, बल्कि विज्ञान की महत्ता को और पुख्ता कर देगा.
