बाहरी मदद के भरोसे नहीं रह सकते हम: प्रधानमंत्री
Updated at : 29 Jun 2015 12:56 PM (IST)
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– हरिवंश – जी-20 में भारत ने 10 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान आइएमएफ कोष को किया है, जिसका मकसद यूरो संकट से बाहर आना है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस नेकनीयत कदम की देश में गलत व्याख्या की जा रही है. आप क्या कहेंगे? – हम आइएमएफ के सदस्य हैं और […]
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– हरिवंश –
जी-20 में भारत ने 10 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान आइएमएफ कोष को किया है, जिसका मकसद यूरो संकट से बाहर आना है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस नेकनीयत कदम की देश में गलत व्याख्या की जा रही है. आप क्या कहेंगे?
– हम आइएमएफ के सदस्य हैं और चाहते हैं कि यह संगठन दुनिया के वित्तीय संकट को हल करने में प्रभावी भूमिका निभाये. लॉस काबोस में यह सहमति बन चुकी है कि इसके सदस्य देशों को कोष में 450 अरब डॉलर का योगदान देना होगा, जिससे आइएमएफ जरूरत के समय पर बचाव के लिए सक्षम हो सके.
विश्व समुदाय का एक जिम्मेदार सदस्य होने के नाते यह हमारा भी दायित्व था कि भारत भी इस कोष में योगदान दे. और मैं यह कहना चाहूंगा कि यह घोषणा करने से पहले मैंने ब्रिक्स नेताओं से चर्चा की थी और सबने इसमें अपना योगदान दिया है. तो, मुझे नहीं लगता कि हमारा आइएमएफ में योगदान गलत है. यह योगदान जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जायेगा और भारत के भंडार का यह भी एक हिस्सा बना रहेगा.
मैक्सिको में अपने संबोधन के दौरान आपने कई बातों पर लंबी चर्चा की. जैसे, भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से मंदी का बढ़ना, पारदर्शी और स्थिर नीतियों को अमल में लाना, कुछ अंदरूनी कमियों को दूर करना और सब्सिडी नियंत्रण जैसे कड़े फैसलों की जरूरत बतायी. आपको लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव की उथल-पुथल में कड़े फैसले लेने के लिए जरूरी समीकरण बदल गये हैं?
– हमारे देश को बड़े फैसलों की जरूरत है, जो देश को उच्च विकास की ओर ले जाये. राजकोषीय प्रबंधन के संबंध में अनेक समस्याएं हैं. हम प्रभावी और विश्वसनीय ढंग से उनसे निबटेंगे.
भुगतान घाटे के संतुलन के प्रबंधन में भी समस्याएं हैं. उनसे भी हमें निबटना होगा. इस पर विस्तार से बात करना मेरे लिए उचित नहीं होगा. पर, मेरा आप सबको आश्वासन है कि हमारा काम भारत के विकास को और बढ़ावा देने के लिए होगा. सारा काम भारत की जरूरतों को और देश में रहने वाले लोगों की सरकार के प्रति अपेक्षा को देखते हुए किया जायेगा.
इसके अलावा, मुझे लगता है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने मेरे मत को कहीं अधिक दृढ़ किया है कि भारत जैसे आकार और विविधता वाले देश की समस्याओं का कोई अंतरराष्ट्रीय समाधान नहीं है. देश की गरिमा बचाने और विकास की गति तेज करने के लिए मैं सभी राजनीतिक दलों से आग्रह करता हूं कि वे सरकार का साथ दें.
काले धन पर मेरा एक सवाल है. इस पर जी-20 का क्या विचार था, क्या यह अप्रासंगिक हो चुका है या इस पर कुछ किया जाना बाकी है?
– कुछ कहना जल्दबाजी होगी. कालेधन की समस्या बहुत बड़ी है और इसका कोई जादुई उपाय उपलब्ध नहीं है. इसका समाधान होगा पर प्रक्रिया बहुत धीमी है.
रेटिंग एजेंसियां लगातार नकारात्मक अंकन कर रही हैं. अप्रैल में एसएंडपी ने नकारात्मक रेटिंग की और अब फिच ने भी ऐसा ही किया है. कर सुधार प्रणाली हमारे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रभावित कर रही है. उदाहरण के तौर पर, हम वोडाफोन के मामले में क्या कर रहे हैं. क्या हम अच्छे संकेत देनेवाली कोई तैयारी कर रहे हैं?
– हमें पोर्टफोलियो निवेश और प्रत्यक्ष निवेश में विदेशी निवेश की जरूरत है. अगर इस रास्ते में किसी भी तरह की बाधा आ रही हो, चाहे वह नीतिगत ही क्यों न हो, हम उन सारी बाधाओं से प्रभावी और विश्वसनीय ढंग से पार पाने की कोशिश करेंगे.
वित्त मंत्री और सदन के नेता के तौर पर प्रणब मुखर्जी का विकल्प भी तलाशना होगा. क्या आप इस मंत्रालय का जिम्मा कुछ समय के लिए खुद संभालने के इच्छुक हैं?
– मेरे मन में भी यह सवाल चल रहा है. ईमानदारी से कहूं तो फिलहाल कई मुद्दे ऐसे हैं, जिनका मुझे निराकरण करना है. मैं अभी देश से बाहर हूं, इसलिए इस पर ज्यादा बात करना मुनासिब नहीं होगा. जब फैसला ले लिया जायेगा, तो आपको बता देंगे.
रिजर्व बैंक ने मध्य तिमाही पॉलिसी रिव्यू के तहत ब्याज दरें स्थिर रखी हैं. इसका कारण उन्होंने बताया है कि इस स्थिति में ब्याज दरें अर्थव्यवस्था में बढ़ोत्तरी में अहम भूमिका साबित नहीं करतीं. और आपका मानना है कि बाहरी कारणों और घरेलू नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था का यह हाल हुआ है. अर्थव्यवस्था के इस हाल का कारण क्या है? क्या आपको लगता है कि लोगों के बीच मुद्रास्फीति जनित इस आर्थिक मंदी का डर वाकई सही है?
– मैं नहीं मानता कि देश में मुद्रास्फीति जनित आर्थिक मंदी जैसी कोई चीज है. हां, अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी जरूर पड़ी है. मुझे अब भी विश्वास है कि शेष वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में सुधार जरूर आयेगा और यह सात प्रतिशत तक पहुंच जायेगी. रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति इस दिशा में प्रयासरत है. सरकार और रिजर्व बैंक के बीच इस बारे में चर्चाएं लगातार जारी हैं. हम रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का आदर करते हैं. इसलिए उसके फैसलों का अनुसरण संबंधित संस्थानों को करना होगा.
आप अपनी कैबिनेट में फेरबदल करनेवाले हैं. आपके साथ कुछ नयी पार्टियां जुड़ने जा रही हैं.
– मुझे लगता है कि इसके पीछे अपना तर्क है. जब यह होगा तो आपको खुद जान जायेंगे. आपने बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए आप कुछ कदम उठाने जा रहे हैं, इनमें भूमि, ऊर्जा और जल मुख्य हैं. जब हम व्यापारियों से बात करते हैं, तो वे कहते हैं कि इन तीनों के बिना वे निवेश करने में असमर्थ हैं. तो फिर केंद्र सरकार ने इन समस्याओं को हल करने के लिए प्रस्ताव क्यों दिया, जो राज्य सरकारें हल कर सकती थीं?
– हम एक अर्ध संघीय राजनीति का हिस्सा हैं और इसलिए सहकारी संघवाद इन सभी राजनीतिक दलों को अवलंबी बनाता है. केंद्र और राज्यों में शासन करनेवालों को एक साथ काम करना होगा, तभी हम अपने देश को प्रभावी तरीके से विकास के मार्ग पर आगे ले जा सकेंगे, जो हमने 2011-12 तक हासिल किया है.
पिछले दो दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपया 57 के रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर तक पहुंच चुका है, मॉनसून की ताजा स्थिति यह है कि यह सामान्य से 26 प्रतिशत नीचे है और ऐसी स्थिति में इस गिरावट को रोक पाना मुश्किल होगा. हम आनेवाले दिनों में एक बेहतर वित्त मंत्री के रूप में आपसे कुछ बड़े फैसलों की उम्मीद कर सकते हैं?
– अगला वित्त मंत्री कौन होगा यह आपको समय आने पर पता चल जायेगा. जहां तक मॉनसून की बात है, मैं इस पर कोई भविष्यवाणी नहीं करना चाहता, लेकिन इतना जरूर तय है कि हम किसी भी स्थिति से निबटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. अगर खद्यान्नों की फसल कमजोर होती है, तब पर भी देश में अनाज की कमी नहीं होगी. देश में अनाज का जरूरत से अधिक भंडार है. ऐसे में जनता सरकार पर इतना भरोसा जरूर कर सकती है कि कमजोर फसल, या भगवान न करे, अगर सूखे जैसी स्थिति भी सामने आती है, तो हम उस स्थिति का भी सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
अब बात करें रुपये की तो, इसके लिए हम बाजार आधारित एक्सचेंज रेट का संचालन कर रहे हैं. ऐसे में बड़े उतार-चढ़ाव के मामलों में ही हमारा दखल होता है. मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मैंने पहले जो उपाय सुझाये हैं, वह रुपये को बाजार में फिर से स्थापित करेगा.
रियो में आपने इस बात का जिक्र किया कि तकनीकी रूप से सक्षम देश अपने ज्ञान को दूसरों के बीच बांटने और सहयोग करने से पीछे हट रहे हैं. क्या आप इसको विस्तार से बतायेंगे?
– अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में देशों के बीच आपसी सहयोग पर जोर दिया जाता है. वर्तमान परिदृश्य में गरीब और कमजोर देशों को अपनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार बरकरार रखने के लिए पैसों और पूंजी की जरूरत होती है. उन्हें दूसरे देशों से अनुकूल शर्तों पर तकनीक की भी जरूरत होती है, ताकि उनके विकास को सही गति मिले. इस मामले में ऐसे सम्मेलनों में विकसित देश विकासशील देशों की तकनीक और पूंजी आदि हर जरूरत को पूरा करने का मौखिक आश्वासन भर ही देते हैं. जब बात इन्हें अमल में लाने की होती है तो नतीजे संतोषप्रद नहीं होते हैं, जैसा मैंने रियो सम्मेलन में कहा. जहां तक हमारे भारत की बात है, मैंने पहले ही कहा है कि हमें अपनी अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत करनी होगी कि हमें किसी बाहरी देश की जरूरत न पड़े.
आपने सभी राजनीतिक दलों से इस संकट की स्थिति में सहयोग करने की अपील की है. ऐसे समय में आपका सहयोगी तृणमूल कांग्रेस आपकी राह में रोड़े डाल रहा है. आपको ऐसा लगता है कि यूपीए में आप किसी और दल के साथ तालमेल बढ़ायेंगे?
– मैं अभी देश से बाहर हूं और ऐसी स्थिति में आंतरिक राजनीति के बारे में चर्चा करना मुनासिब नहीं. मुझे अब भी विश्वास है कि देश की मूलभूत समस्याओं की बारी आने पर सारे राजनीतिक दल हमारा सहयोग करेंगे. मुझे आशा है कि हममें से हर एक संकट की इस घड़ी में अपना बेहतर और सार्थक योगदान देगा, जिससे हमारा देश फिर से विकास के पथ पर दौड़ने लगेगा.
भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण अपनाये 20 साल हो चुके हैं. इनमें पांच साल की अवधि तक आप वित्त मंत्री रहे और बाद में आठ साल से प्रधानमंत्री हैं. ऐसे में आप अर्थव्यवस्था से पूरी तरह वाकिफ हो चुके होंगे. आपके अनुसार, इस स्थिति पर पहुंचने की वजह कौन-सी गलत नीति है?
– मैं आपको यह बता दूं कि इन गलतियों की जड़ भारत के बाहर है. 2008 के वित्तीय संकट ने हमारी वृद्धि दर को प्रभावित किया. हमारी वृद्धि दर नौ प्रतिशत से घट कर 6.7 प्रतिशत पर पहुंच गयी. जिससे उबरने में हमें दो साल लगे, लेकिन तभी यूरो संकट सामने आया. इससे विकसित देशों में पूंजी की कमी हो गयी. कई देशों की पूंजी जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में जमा होने लगी, जिससे चीन सहित तमाम विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं चरमराने लगी. हमारे देश को भी यह संकट झेलना पड़ा. वित्तीय संतुलन बनाये रखने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी होगी.
यूपीए की एकता बनाये रखने के लिए क्या आप ममता बनर्जी से प्रणब दा को समर्थन देने और अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह व भाजपा से उनका प्रत्याशी वापस लेने की अपील करेंगे?
– जैसे ही हमने प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का फैसला किया, मैंने आडवाणी, सुषमा और जेटली को फोन कर प्रणब मुखर्जी को निर्विरोध राष्ट्रपति चुने जाने के लिए सरकार को सहयोग देने का आग्रह किया. जहां तक तृणमूल कांग्रेस की बात है, वह अब भी यूपीए का हिस्सा है और मुझे अब भी पूरा विश्वास है कि प्रणब मुखर्जी को तृणमूल कांग्रेस का पूरा समर्थन मिलेगा.
दिनांक 25.06.2012
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