।। रवि दत्त बाजपेयी ।।
न्यायमूर्ति नहीं, न्यायप्रिय-3
– अपने कार्यकाल में किसी भी मुकदमे पर फैसला सुरक्षित नहीं रखा
न्यायमूर्ति मोहम्मद अली करीम छागला ने अपने शुरुआती दिनों में मोहम्मद अली जिन्ना के सहायक के रूप में वकालत की और मुसलिम लीग के सदस्य भी रहे. बाद में जिन्ना ने पृथक मुसलिम राष्ट्र और छागला ने एकीकृत भारत राष्ट्र के अलग–अलग रास्ते पकड़े.
छागला बंबई हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस बननेवाले पहले भारतीय हुए, बाद में भारत सरकार में शिक्षा, विदेश विभाग के कैबिनेट मंत्री हुए, अमेरिका में भारत के राजदूत भी रहे. 1980 में भाजपा के पूर्ण अधिवेशन में छागला का संबोधन धर्मनिरपेक्षता की वह परिभाषा है, जो हमारी आज की संकीर्ण राजनीति सुनना और समझना नहीं चाहती है.
भारत में ज्यादातर राजनीतिक व्यक्तियों और उनके दलों की धर्मनिरपेक्षता, चुनावी सापेक्षता के साथ जुड़ी होती है, आज के दौर में यह जानना अनिवार्य है कि कुछ ऐसे भी भारतीय हुए हैं, जिनके लिए भारत, भारतीयता, राष्ट्रीयता, धर्मनिरपेक्षता सिर्फ शब्द–संग्रह नहीं, उनके जीवन का सबसे अनमोल संग्रह था.
मोहम्मद करीम छागला ने एक न्यायविद्, न्यायमूर्ति और नागरिक के रूप में भारत और भारतीयों के न्याय व स्वतंत्रता के लिए आजीवन अनथक परिश्रम किया. 30 सितंबर, 1900 को एक संपन्न व्यापारी घर में जन्मे मोहम्मद अली करीम छागला की मां का निधन उनके बचपन में ही हो गया, अपने बचपन के अकेलेपन को उन्होंने किताबों से पूरा किया, किताबों का साथ उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय तक ले गया.
इंग्लैंड से कानून की उपाधि प्राप्त करने के बाद 1922 में अपने वकालत के आरंभिक दिनों में छागला, मोहम्मद अली जिन्ना के सहायक बने और मुसलिम लीग की राजनीतिक गतिविधियों से भी जुड़े.
1928 में साइमन कमीशन के जवाब में कांग्रेस ने मोतीलाल नेहरू को भारत के संविधान का मसौदा बनाने का जिम्मा सौंपा, इस दौरान अपनी पत्नी की बीमारी के सिलसिले में जिन्ना विदेश गये हुए थे, उनकी अनुपस्थिति में हिंदू और मुसलिम समुदाय के संयुक्त निर्वाचक मंडल पर नेहरू प्रस्ताव पर मुसलिम लीग की ओर से छागला ने अपनी स्वीकृति दी. भारत वापसी पर जिन्ना, छागला की इस सहमति से क्षुब्ध हो गये, कांग्रेस से जिन्ना अलग हो गये और जिन्ना ने पृथक मुसलिम राष्ट्र और छागला ने एकीकृत भारत राष्ट्र के अलग–अलग रास्ते पकड़े.
छागला, कांग्रेस के सदस्य बने, लेकिन उन्होंने गांधी जी की अंधभक्ति नहीं अपनायी, बल्कि राष्ट्रवादी मुसलिमों की उपेक्षा पर अपना असंतोष जाहिर किया. छागला ने लिखा, ‘कांग्रेस और यहां तक कि महात्मा गांधी ने राष्ट्रवादी मुसलमानों के प्रति बहुत बेरुखी दिखायी, जिन्ना और उनके सांप्रदायिक समर्थक बहुत महत्वपूर्ण समङो गये और उनके मुकाबले हमारी गिनती नहीं थी. गांधी जी ने जिन्ना को ‘कायद–ए–आजम’ का खिताब दिया था, जिसे जिन्ना ने बड़े फा से धारण भी किया. उस समय मुसलिम लीग की सदस्य संख्या कुछ हजार से अधिक नहीं थी और जिन्ना का व्यापक जनाधार भी नहीं था.
सन 1941 में छागला बंबई हाइकोर्ट में नियुक्त हुए, 1948 में छागला बंबई हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने वाले पहले भारतीय थे और वे इस पद पर 1958 तक रहे. न्यायमूर्ति छागला ने अदालत को सिर्फविद्वतापूर्ण बहस का अखाड़ा नहीं, बल्किआम लोगों के रक्षक और सहायक के रूप में स्थापित किया. अपने पूरे कार्यकाल में न्यायमूर्ति छागला ने किसी भी मुकदमे पर अपना फैसला सुरक्षित नहीं रखा.
अपने राष्ट्रीयकरण के केवल दो साल बाद, भारतीय जीवन बीमा निगम ने हरिदास मूंधरा की असफल कंपनियों में 1.24 करोड़ का निवेश किया और यह सारा निवेश डूब गया. इस दौर के भारत में दामाद को बचाना नहीं, बल्किदामाद से बचना जरूरी था, फिरोज गांधी ने लोक सभा में यह मामला उठाया, तो प्रधानमंत्री नेहरू ने इसकी जांच के लिए न्यायमूर्ति छागला के नेतृत्व में एक सदस्यीय आयोग नियुक्त किया.
मात्र 24 दिनों में न्यायमूर्ति छागला ने अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके बाद भारत सरकार के वित्त सचिव और जीवन बीमा के दो अधिकारियों को त्यागपत्र देना पड़ा. अंत में वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को भी अपना पद छोड़ना पड़ा. छागला आयोग की रिपोर्ट को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इसे सर्वोत्तम न्यायिक फैसलों में से एक बताया और कहा, यदि विश्व के छह सर्वश्रेष्ठ न्यायाधीश भी एकत्रित किये जाते, तो भी वे इतना न्यायसंगत और इतना न्यायसम्मत निर्णय नहीं ले सकते थे.
हाइकोर्ट से सेवानिवृत्ति के बाद भी न्यायमूर्ति छागला बेहद सक्रि य रहे. बंबई विश्वविद्यालय के उपकुलपति, हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जज, अमेरिका, ब्रिटेन में भारतीय राजदूत, भारत सरकार में शिक्षा मंत्री और विदेश मंत्री जैसी जिम्मेदारियों को निभाया. भारतीय शिक्षा पद्धति में आमूल–चूल परिवर्तन के लिए कोठारी आयोग के गठन का श्रेय भी न्यायमूर्ति छागला को दिया जाता है.
छागला ऐसे शिक्षित भारतीय बनाना चाहते, जिनके लिए एक हिंदू का अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय का और एक मुसलिम का बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उपकुलपति बनना आश्चर्यजनक बात न हो. वर्ष 1964 में संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर मसले पर उनका ऐतिहासिक उद्बोधन किसी विश्व मंच पर इस समस्या के भारतीय पक्ष की श्रेष्ठतम व्याख्या है.
वर्ष 1973 में जब इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता क्र म में उलट फेर किया, तो विरोध करने वालों में न्यायमूर्ति छागला सबसे आगे थे, उनके आह्वान पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं ने पहली बार एक दिन के लिए अदालत का बहिष्कार किया था.
26 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद हजारों राजनेताओं की तरह बेंगलुरु में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी को भी गिरफ्तार कर लिया गया. कर्नाटक हाइकोर्ट में इन दोनों नेताओं की रिहाई के लिए जिरह करने छागला खड़े हुए, हाइकोर्ट ने वाजपेयी व अडवाणी की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया. आपातकाल के दौरान न्यायमूर्ति छागला ने सरकारी दमन की परवाह किये बिना इसका मुखर सार्वजनिक विरोध किया, लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने न्यायमूर्ति छागला की आत्मकथा ‘रोजेज इन दिसंबर’ की प्रस्तावना में छागला के आपातकाल के निडर विरोध को उनकी राष्ट्रभक्ति और निर्भीकता का परिचायक और इस संघर्षकाल को उनके जीवन का सबसे उत्कृष्ट समय बताया. 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद इसके पहले पूर्ण अधिवेशन के वक्ताओं में न्यायमूर्ति छागला भी थे, छागला का संबोधन धर्मनिरपेक्षता की वह परिभाषा है, जो हमारी आज की संकीर्ण राजनीति सुनना और समझना नहीं चाहती है.
9 फरवरी, 1981 को न्यायमूर्ति छागला का देहांत हो गया. बंबई हाइकोर्ट ने इनकी प्रतिमा के नीचे लिखा ‘एक महान न्यायाधीश, एक महान नागरिक, और इन सबसे ऊपर एक महान इनसान.’ छागला इनका कुलनाम नहीं था इनका पारिवारिक नाम मर्चेट था, युवा मोहम्मद करीम को ऐसा व्यावसायिक कुलनाम कतई पसंद नहीं था, तो उन्होंने अपने दादा से शिकायत की और उनकी सलाह पर अपना कुलनाम छागला रखा. कच्छी भाषा में छागला का अर्थ है परम प्रिय या आंख का तारा, सचमुच छागला भारत की हर भाषा में इस मुल्क के आंख के तारे हैं और रहेंगे.

