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नयी तकनीक से नायाब होगा वर्ल्ड कप 2015

Updated at : 12 Feb 2015 5:57 AM (IST)
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नयी तकनीक से नायाब होगा वर्ल्ड कप 2015

महज दो दिन बाद क्रिकेट का महाआयोजन यानी वर्ल्ड कप 2015 शुरू हो रहा है. पिछले 40 वर्षो के दौरान इस आयोजन के तौर-तरीके और तकनीक में व्यापक बदलाव आ चुका है. वीडियो कैमरा, टीवी, फ्लड लाइट से आगे बढ़ते हुए कई नयी तकनीकों ने इसे बेहद दिलचस्प बना दिया है. किस तरह के महत्वपूर्ण […]

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महज दो दिन बाद क्रिकेट का महाआयोजन यानी वर्ल्ड कप 2015 शुरू हो रहा है. पिछले 40 वर्षो के दौरान इस आयोजन के तौर-तरीके और तकनीक में व्यापक बदलाव आ चुका है. वीडियो कैमरा, टीवी, फ्लड लाइट से आगे बढ़ते हुए कई नयी तकनीकों ने इसे बेहद दिलचस्प बना दिया है. किस तरह के महत्वपूर्ण बदलावों, खास कर तकनीकी परिवर्तनों, के दौर से गुजरा है क्रिकेट विश्व कप, इसके विभिन्न पहलुओं पर नजर डाल रहा है आज का नॉलेज..
अभिषेक दुबे वरिष्ठ खेल पत्रकार
49 मैच, 14 टीम, एक चैंपियन. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के 13 लाजवाब स्टेडियम का खूबसूरत माहौल. मेलबर्न से लेकर ड्यूनिडिन-नेल्सन शहर के एक लाख से लेकर पांच हजार लोगों की क्षमतावाले स्टेडियम. क्रिकेट के जुनून, खेल के रोमांच और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत पैकेज. कंगारू- कीवीलैंड में होनेवाले वर्ल्‍ड कप 2015 का मजा खेल के दीवाने ग्राउंड जीरो पर जाकर तो लेंगे ही, लेकिन ये क्रिकेट के इस महा-मेले की पहुंच का एक मामूली हिस्सा होगा.
मॉडर्न तकनीक की वजह से यह एक नायाब वर्ल्‍ड कप होगा. होस्ट प्रसारक ने वर्ल्‍ड कप के आयोजकों के साथ मिल कर ऐसा इंतजाम किया है कि दुनिया के कोने-कोने में फैले 2.5 बिलियन दर्शक क्रिकेट के इस महा-मेले का लुत्फ उठा सकेंगे. वर्ल्‍ड कप के 40 साल के इतिहास में यह सबसे अधिक लोगों द्वारा देखा जानेवाला वर्ल्‍ड कप होगा. जाहिर तौर पर ऐसे दर्शकों के लिए, जो स्टेडियम में जाकर मैच नहीं देख रहे हों, उन्हे ‘ग्राउंड और मैच फील’ दिलाने के लिए उन्नत इंतजाम किये गये हैं.
एचडी फॉर्मेट और ड्रोन कैमरे
वर्ल्‍ड कप 2015 का प्रोडक्शन ‘एचडी’ यानी हाइ डेफीनेशन फॉर्मेट में होगा और माइक थामे एक्सपर्ट कॉमेंटेटर का साथ देने के लिए ग्राफिक्स से लेकर एनिमेशन में आधुनिकतम और लीक से हट कर प्रयोग किये जायेंगे. वर्ल्‍ड कप के सभी 49 मैच को कवर करने के लिए कम से कम 29 कैमरे होंगे. इनमें हर मैच में अल्ट्रा-मोशन कैमरा, 13 मैच में स्पाइडर-कैम और सभी नॉक-आउट मैच में ड्रोन कैमरा शामिल है. रीप्ले और जबरदस्त मोशन रेजोल्यूशन की वजह से अल्ट्रा मोशन कैमरा का इस्तेमाल स्पोर्ट्स और मनोरंजन इवेंट में किया जाता है.
स्पाइडर कैमरा में पहले से तय किये गये दायरे पर कैमरा ‘हॉरिजेंटली और वर्टिकली’ चल कर ऊंचे स्थान से हर एंगल की तसवीर ले सकता है. यह 1984 में अमेरिका में आविष्कार किये गये ‘स्काइ कैम’ का अगला वर्जन है. हाल के वर्षो मे इसका इस्तेमाल फुटबॉल और क्रिकेट मैच के कवरेज में बहुत ही कारगर साबित हुआ है.
क्या आपने फिल्मों में वे शॉट्स देखे हैं, जिसमें आप महानगर और शहर में तालाब-नदी, गगनचुंबी ऐतिहासिक और आधुनिक इमारत व फ्लाइओवर समेत लैंडस्केप से रूबरू होते है. यह रिमोट कंट्रोल से संचालित ड्रोन कैमरा का कमाल होता है. वर्ल्‍ड कप 2015 में क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल और फाइनल मैच में इन कैमरों का इस्तेमाल होगा.
रेडियो भी पीछे नहीं
क्रिकेट शायद ऐसा विरला खेल है, जिसमें प्राचीन टेस्ट मैच से लेकर वन डे और आधुनिकतम टी-20 मैच तीनों ही फॉर्मेट का समावेश है. क्रिकेट मैच को लोगों तक पहुंचाने का जरिया भी इससे अलग नहीं. तभी तो एक ओर न्यू मीडिया और टीवी ने इसके कवरेज की तैयारी की है, तो रेडियो भी पीछे नहीं. ऑस्ट्रेलिया में एबीसी यानी ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन और क्रॉक मीडिया, न्यूजीलैंड में स्पोर्ट्स रेडियो, भारत में ऑल इंडिया रेडियो, श्रीलंका में एसएलसीबी, दक्षिण अफ्रीका में एसएबीसी, पाकिस्तान में 107 एफएम और अमेरिका मिडिल इस्ट में चैनल 2 ने लोगों तक मैच का आंखों देखा हाल पहुंचाने की तैयारी पूरी कर ली है. जाहिर तौर पर मीडिया और एंटरटेनमेंट के हर साधन ने वर्ल्‍ड कप में हिस्सा लेनेवाले हर देश और दूसरे देशों में मैच को मौजूदा आधुनिकतम तकनीक के सहारे पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली है.
बदलाव का सफर
वर्ल्‍ड कप 2015 के आगाज से ठीक एक महीने पहले कप्तान महेंद्र सिंह धौनी की अगुवाई में टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने नयी जर्सी के साथ मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड के रूफ-टॉप पर तसवीर खिंचवायी. नयी जर्सी का हर किट उच्चस्तरीय प्रदर्शन और मजबूती का समावेश है. जर्सी और इसके साथ पहने जानेवाले पैंट को मिला कर हर किट कमोबेश 33 रिसाइकल बॉटल से बनाया गया है. इसे बनाने से पहले खिलाड़ियों के हाव-भाव और हर मूवमेंट के आंकड़े जमा किये गये और उसके आधार पर शोध किये गये. इसमें ड्राइ-फिट और प्रो बेस लेयर तकनीक का सहारा लिया गया है, जिससे कि शरीर के तापमान और सांस लेने की प्रक्रिया में निरंतरता रह सके. साथ ही इसकी मदद से खिलाड़ी खेल पर फोकस कर सकें.
नयी जर्सी के साथ फोटो खिंचवाने के बाद कप्तान धौनी का बयान था- ‘भारतीय टीम का नया यूनिफॉर्म हल्का व आरामदायक है. इसमें कई ऐसे नायाब प्रयोग किये गये हैं, जिनकी मदद से खिलाड़ी तनाव के माहौल में अपने खेल पर पूरी तरह से फोकस कर सकेंगे. यह ऐसे टूर्नामेंट में काफी मददगार साबित होगा, जिसमें एक मिलीमीटर का अंतर एक बड़ी पारी या विकेट मिलने-न मिलने में फर्क डाल सकता है.’ प्रमोशनल इवेंट के दौरान दिया गया कप्तान धौनी का यह बयान खेल को नजदीक से समझनेवालों को अतीत और वर्तमान के बीच खेल के हर पहलू में तकनीकी तौर पर आयी क्रांति के रोचक और दिलचस्प सफर की ओर ले गया.
क्रिकेट वर्ल्‍ड कप के इतिहास को अभी 40 साल हुए हैं, लेकिन तकनीक और बदलते वक्त की आंधी ने इस गेम की सूरत और सीरत बदल दी है. 1975 वर्ल्‍ड कप का सफेद कपड़ा 1992 का वर्ल्‍ड कप आते-आते रंगीन हो गया और अब 2015 तक तो पूरी तरह से हाइटेक हो चला है. दरअसल कपड़े का बदलना गेंद बल्ले से लेकर रोशनी के बदलने का प्रतीक भर है. गेंद, बल्ला, स्टंप्स, अंपायर के पास साधन, आसमानी रंग, पीने के पानी से लेकर एनर्जी ड्रिंक सब कुछ बदल गया है.
कैरी पेकर का सर्कस
1975 में प्रुडेंशियल कप को वर्ल्‍ड कप का नाम तक नहीं मिला था. सफेद कपड़ों में खिलाड़ी लाल गेंद से गेंदबाजी करते और बल्ले-पैड से लेकर क्रिकेट से जुड़े दूसरे एक्विपमेंट को लेकर नजरिया भी कंजर्वेटिव ही रहा. 1975-83 के बीच इंगलैंड में खेले गये तीन वर्ल्‍ड कप क्रिकेट को टेस्ट फॉर्मेट से पूरी तरह से बाहर लाने के लिए मशक्कत करते दिखा.
इसने आहिस्ते-आहिस्ते हर टीम को एक मंच पर अपना हुनर दिखाने का साधन दिया. लेकिन, बदलते वक्त के साथ तकनीक की हवा को कोई नहीं रोक सकता. ऑस्ट्रेलिया के मीडिया मुगल कैरी पेकर ने अपने चैनल में जान फूंकने के लिए ‘पेकर सर्कस’ को जन्म दिया. लगातार मैच का सिलसिला, फिटनेस पर जोर, रंगीन कपड़े, ड्रॉप इन पिच यानी बाहर से लाकर पिच को डालना, फ्लड लाइट्स और दूधिया रोशनी में खेल, यह सब कैरी पेकर के सर्कस की ही देन है.
इसके बाद क्रिकेट लगातार टीवी के लिए खेला जानेवाला खेल बनता चला गया. 1983 में भारत वर्ल्‍ड कप चैंपियन बना और 1985 में खेल के दीवानों ने भारत को ऑस्ट्रेलिया में बेनसन एंड हैजेज कप जीतते देखा. ये मैच रंगीन कपड़े में, दूधिया रोशनी में सफेद गेंद से खेले गये और दर्शकों ने इसमें क्रिकेट प्रसारण में किये गये नये प्रयोग का लुत्फ लिया. इसमें स्क्रीन पर दो बॉक्स का प्रयोग शामिल है, जिसमें एक बॉक्स में खिलाड़ी गेंद के पीछे भागते हुए दिखता और दूसरे में विकेट के बीच रन के लिए दौड़ लगाता हुआ. यानी क्रिकेट अब तकनीकी क्रांति में नयी करवट लेने को तैयार बैठा था.
फ्लड लाइट का दौर शुरू
1987 में वर्ल्‍ड कप पहली बार इंग्लैंड से बाहर भारत-पाकिस्तान में खेला गया. लेकिन, नये प्रयोग की बात करें तो अब तक सिर्फ प्रति पारी में 60 ओवर खेले जानेवाले मैच घटा कर 50 ओवर के कर दिये गये. तकनीकी लिहाज से जो वर्ल्‍ड कप क्रिकेट इतिहास का टर्निग प्वॉइंट रहा, वह 1992 में ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में खेला जानेवाला वर्ल्‍ड कप था. जहां इस वर्ल्‍ड कप ने मैदान के अंदर स्पिनर से गेंदबाजी की शुरुआत और पहली गेंद से ही हल्ला बोल जैसे प्रयोग देखे, वहीं तकनीकी लिहाज से ऐसे कई प्रयोग किये गये, जो अब वर्ल्‍ड कप और वनडे क्रिकेट की परंपरा का हिस्सा हैं.
यह पहला वर्ल्‍ड कप था, जिसके मैच फ्लड लाइट में दूधिया रोशनी में खेले गये, जिसमें खिलाड़ी रंगीन कपड़ों में उतरे और सफेद गेंद का इस्तेमाल किया गया. साथ ही पैड-ग्लव्स से लेकर बल्ले तक में कई आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया.
1992 : एक अहम पड़ाव
जाहिर तौर पर अगर वर्ल्‍ड कप एक साइन पोस्ट की तरह होता है, जिसमें तकनीक और खेल में आये बदलाव के संकेत मिलते हैं, तो उस लिहाज से वर्ल्‍ड कप 1992 एक अहम पड़ाव रहा. इससे पहले बारिश की वजह से खलल पड़ने पर अंक बांट दिये जाते थे या फिर खेल वहीं से शुरू होता था. 1992 के वर्ल्‍ड कप में बारिश के नियम शुरू किये गये, जिसमें एक फॉमरूले के हिसाब से रन तय किये जाते. यह सच है कि दक्षिण अफ्रीका को इस नियम का खामियाजा भुगतना पड़ा, लेकिन यह फॉमरूला एक बेस साबित हुआ, जिसे आगे के वर्षो मे बेहतर और तर्कसंगत बनाया गया.
थर्ड अंपायर
1992 से 2015 तक के वर्ल्‍ड कप के सफर में और भी बदलाव हुए. इसमें थर्ड अंपायर का आना (जो टीवी देख कर फैसला सुनाता है) और मैच रेफरी का होना शामिल है, जो क्रिकेट के नियमों के हिसाब से फैसले सुनाता तथा इसकी समीक्षा के लिए रिपोर्ट देता है. इसमें बल्लों का इस कदर बनाना शामिल है कि गेंद कम ताकत से अधिक से अधिक दूर जाये और पैड से लेकर हेल्मेट में किये गये प्रयोग हैं, जो खिलाड़ियों को सुरक्षित बनाते हैं.
पहले के वर्ल्‍ड कप में खिलाड़ियों के साथ सपोर्ट स्टाफ की संख्या इतनी नहीं थी, लेकिन अब कुछ टीम खिलाड़ी के बराबर, 15 सपोर्ट स्टाफ के साथ टूर्नामेंट में रहते हैं. इसमें फिजियो, ट्रेनर, मसाज करनेवाले, योग कराने वाले, खान-पान का ध्यान रखनेवाले, वीडियोग्राफर, गेंदबाजी, बल्लेबाजी और फील्डिंग के लिए स्पेशलिस्ट कोच शामिल हैं. साथ ही मौसम, तापमान और नमी के हिसाब से खिलाड़ियों को एनर्जी ड्रिंक दिये जाते हैं और हर खिलाड़ी की शारीरिक क्षमता के हिसाब से उनका फिटनेस मॉड्यूल तैयार किया जाता है.
अब ड्रॉप इन विकेट भी
क्रिकेट का एक अहम पहलू हर जगह के हिसाब से उनके विकेट का मिजाज है. ऑस्ट्रेलिया के विकेट पारंपरिक तौर पर उछाल और पेस के लिए मशहूर हैं, तो न्यूजीलैंड के विकेट सीम और स्विंग के लिए. लेकिन वर्ल्‍ड कप 2015 में पांच नॉक आउट मैच ‘ड्रॉप इन विकेट’ पर खेले जायेंगे. ये विकेट बाहर में तैयार किये जाते हैं और मैच से पहले मैदान में डाल दिये जाते हैं. इससे विकेट के व्यवहार में स्थानीय विविधता कम हो जाती है. जानकार इस लिहाज से भले ही ‘रेंटल वर्ल्‍ड कप’ या किराये पर कराया गया वर्ल्‍ड कप कहें, लेकिन कंगारू लैंड और कीवी लैंड 1992 वर्ल्‍ड कप की तर्ज पर एक और तकनीकी बदलाव के लिए तैयार बैठा है.
चमचमाते एलक्ष्डी स्टंप्स
वर्ल्‍ड कप 2015 में ‘रियल टाइम’ स्निक्को और एलक्ष्डी स्टंप्स का इस्तेमाल किया जायेगा. रियल टाइम स्निक्को की मदद से जानकार और खेल प्रेमी असली समय में देख सकेंगे कि गेंद कहां छू कर गयी है. क्रिकेट के दीवानों ने टी-20 वर्ल्‍ड कप में गेंद स्टंप्स से टकराते समय या विकेट कीपर के दस्ताने से बेल्स को हटाते वक्त स्टंप्स को चमचमाते देखा होगा. यही एलक्ष्डी स्टंप्स है और इसका आविष्कार ऑस्ट्रेलिया के ब्रोन्ते एकक्केरमान ने किया. एडिलेड में एक क्लब गेम में इसका सबसे पहली बार इस्तेमाल हुआ और बिग बश लीग के रास्ते इसने वर्ल्‍ड कप तक का रास्ता तय किया. ऐसे हर स्टंप सेट की कीमत 25 लाख रुपये के करीब होती है और इस बात का खास ध्यान दिया जाता है कि मैच जीतने के बाद खिलाड़ी जश्न मनाने के सिलसिले में स्टंप्स को लेकर न भागें. सवाल यह है कि क्या एलक्ष्डी स्टंप्स के आविष्कारक ब्रोन्ते टी-20 वर्ल्‍ड की तरह वर्ल्‍ड कप 2015 में इस बात का ऐलान करेंगे कि ट्रॉफी जीतने पर वे भारतीय कप्तान धौनी को स्टंप सोविनिएर के तौर पर ले जाने की इजाजत देंगे. इतना ही नहीं, क्रिकेट इतिहास में पहली बार ‘4 के’ तकनीक का इस्तेमाल भी किया जायेगा. कवरेज में इस तकनीक का इस्तेमाल सेमीफाइनल और फाइनल मैच में होगा. डिजिटल टीवी और सिनैमेटोग्राफी में इसे अल्ट्रा हाइ डेफिनेशन कहा जाता है. जानकारों की मानें तो यह क्रिकेट कवरेज में तकनीकी प्रयोग में एक नयी क्रांति होगी.
होगा इस साल का सबसे बड़ा और अनूठा खेल मेला
क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था ‘आइसीसी’ के चीफ एग्जीक्यूटिव डेव रिचर्डसन की मानें तो- ‘हमें इस बात की पूरी उम्मीद है कि वर्ल्‍ड कप 2015 अब तक के वर्ल्‍ड कप इतिहास में सबसे अधिक देखे जाने वाला टूर्नामेंट होगा. क्रिकेट के एक्सपर्ट्स की तगड़ी फौज और टीवी कवरेज में अब तक के सबसे नायाब इंतजाम की वजह से हमें पूरा भरोसा है कि यह इस वर्ष के दौरान किसी भी खेल का सबसे बड़ा मेला होगा’. ऑस्ट्रेलिया- न्यूजीलैंड में 14 स्टेडियम में होने वाले 49 मैच के लिए 4 टीम 7 स्टेट ऑफ आर्ट तकनीकी किट के साथ तैनात किये जा रहे हैं.
वर्ल्‍ड कप का एक और अहम पहलू हिंदी समेत सात रीजनल भाषाओं मे कॉमेंटरी है, जिसे 45 अलग-अलग ब्रॉडकास्टर अपने क्षेत्रों में प्रसारित करेंगे. रेडियो से शुरुआत करते हुए टीवी के दौर को पार कर क्रिकेट अब न्यू मीडिया युग में प्रवेश कर चुका है.
कोई आश्चर्य नहीं, दुनिया के जिन हिस्सों में टीवी नेटवर्क की सुविधा नहीं है, वहां के दर्शकों के लिए लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा है. यही नहीं, अगर किसी वजह से आप अपनी व्यस्तता के कारण मैच नहीं देख पा रहे हों तो नामीगिरामी मीडिया हाउस ट्विट्स के माध्यम से आपको अहम पलों की जानकारी देंगे. स्पोर्ट्स वेबसाइट और पोर्टल में भी स्कोर अपडेट मिलने की सुविधा होगी.
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