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10 राज्यपाल, जिनके फैसले रहे थे चर्चा में

Updated at : 09 Feb 2015 6:51 AM (IST)
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10 राज्यपाल, जिनके फैसले रहे थे चर्चा में

बिहार में जदयू के ज्यादातर विधायकों और मंत्रियों ने मौजूदा मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का विरोध करते हुए नीतीश कुमार को अपना नया नेता चुना है. हालांकि मुख्यमंत्री मांझी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया है. अब गेंद बिहार के राज्यपाल के पाले में है और सबको उनके फैसले का इंतजार है. राज्यपाल ने इस […]

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बिहार में जदयू के ज्यादातर विधायकों और मंत्रियों ने मौजूदा मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का विरोध करते हुए नीतीश कुमार को अपना नया नेता चुना है. हालांकि मुख्यमंत्री मांझी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया है. अब गेंद बिहार के राज्यपाल के पाले में है और सबको उनके फैसले का इंतजार है.
राज्यपाल ने इस मामले में अभी कोई फैसला नहीं लिया है, लेकिन इससे पहले ऐसे नाजुक मौकों पर कई राज्यों में राज्यपालों के ऐसे फैसले भी हुए हैं, जो लंबे समय तक विवाद का कारण बने. आज के नॉलेज में जानते हैं दस ऐसे राज्यपालों के बारे में, जिनके फैसले विवादित रहे हैं..
राज्यपाल को जानें
भारतके संविधान के भाग छह में राज्यों में शासन के प्रावधान निर्दिष्ट हैं, जो जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर देश के सभी राज्यों पर लागू होते हैं. इन प्रावधानों के मुताबिक राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का प्रमुख होता है और राज्य की मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने दायित्वों को पूरा करता है. राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होने के कारण वह एक प्रकार से केंद्र का प्रतिनिधि भी होता है.
अनुच्छेद 157 में उल्लिखित नियुक्ति की आवश्यक योग्यताओं के साथ अनुच्छेद 155 में लिखा गया है कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर की जायेगी, किंतु राष्ट्रपति केंद्र सरकार की संस्तुति के आधार पर ही नियुक्ति करते हैं.
भारतीय गणतंत्र के पहले डेढ़ दशक तक राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व संबद्ध राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह करने की परंपरा थी, परंतु 1967 में कुछ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों के सत्ता में आने के बाद इस परंपरा को किनारे कर मुख्यमंत्री से राय लिये बिना ही नियुक्तियां की जाने लगीं.
भूमिका, शक्ति और कार्य
राज्यपाल की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. वह केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है और केंद्र में राष्ट्रपति की तरह राज्यों में कार्यपालिका की शक्ति उसके अंदर निहित होती है. यानी राज्य की कार्यकारी शक्तियां राज्यपाल के पास होती है और सभी कार्य उन्हीं के नाम से होते हैं. हालांकि राज्यपाल राज्य का प्रमुख होता है, पर वास्तविक शक्तियां मुख्यमंत्री के पास होती है. राज्यपाल विभिन्न कार्यकारी कार्यो के लिए महज अपनी सहमति देता है.
राज्यपाल राज्य सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष है तथा राज्य की कार्यपालिका संबंधी शक्ति का इस्तेमाल वह अपने अधीनस्थ प्राधिकारियों के माध्यम से कराता है. वह सरकार की कार्यवाही संबंधी नियम बनाता है और मंत्रियों में कार्यो का विभाजन करता है. साथ ही राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा मुख्यमंत्री की सलाह से उसके मंत्रिपरिषद के सदस्यों को नियुक्त करता है तथा उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है.
राज्यपाल, राज्य के उच्च अधिकारियों, जैसे- महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है और राज्य के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति को परामर्श देता है.
राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह राज्य के प्रशासन के संबंध में मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त करे. जब राज्य का प्रशासन संवैधानिक तंत्र के अनुसार न चलाया जा सके, तो राज्यपाल राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करता है. जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाता है, तब राज्यपाल केंद्र सरकार के अभिकर्ता के रूप में राज्य का प्रशासन चलाता है. राज्यपालों के पास विवेकाधीन और आपातकालीन अधिकार भी हैं.
त्नकार्यकारी शक्तियां : राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री सहित, मंत्रिपरिषद, एडवोकेट जनरल और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार है. मंत्रिपरिषद और एडवोकेट जनरल राज्यपाल की इच्छा पर अपने पद पर बने रह सकते हैं. हालांकि, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को राज्यपाल के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है. हाइकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए राज्यपाल राष्ट्रपति को सलाह देते हैं. राज्यपाल जिला अदालतों के जजों की नियुक्ति करते हैं.
अगर राज्यपाल को ऐसा लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व विधानसभा में नहीं है, तो वे विधानसभा में उनके एक प्रतिनिधि को नामांकित कर सकते हैं. जिस राज्य में विधानसभा और विधान परिषद है, वहां राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वे साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और सामाजिक कार्यो से संबंधित लोगों को विधान परिषद में नामांकित कर सकते हैं.
– विधायिका की शक्तियां : राज्यपाल को राज्य विधानमंडल का हिस्सा माना जाता है. वह राज्य विधानसभा को संबोधित करने के साथ-साथ विधानसभा को मैसेज देता है. राष्ट्रपति की तरह राज्यपाल के पास विधानसभा की बैठक बुलाने और उसे भंग या स्थगित करने का अधिकार है. हालांकि, ये सारी शक्तियां औपचारिक हैं और किसी भी निर्णय लेने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद के द्वारा सलाह दी जाती है.
– आपातकालीन शक्तियां : विधानसभा में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में राज्यपाल के पास यह अधिकार होता है कि वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति में अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करे. राज्यपाल विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति को राज्य की स्थिति के बारे में रिपोर्ट करते हैं और राष्ट्रपति को राज्य में राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन करते हैं. ऐसी स्थिति में राज्यपाल के पास सारी शक्तियां होती हैं और वे राज्य के कार्यो के लिए निर्देश जारी करते हैं.
राज्यपाल का कार्यकाल
अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, लेकिन वह अपने पद पर राष्ट्रपति की इच्छानुसार ही रह सकता है. कार्यकाल की समाप्ति की बाद वह अगले व्यक्ति के कार्यभार संभालने तक प्रतिदिन के वेतन के हिसाब से पद पर बने रह सकता है. बीरेंद्र नारायण चक्रबर्ती 15 सितंबर, 1967 से मृत्युर्पयत 26 मार्च, 1976 तक हरियाणा के राज्यपाल के रूप में कार्यरत रहे थे. आधिकारिक कार्यकाल के बाद उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से वेतन मिलता था.
राज्यपालों की बर्खास्तगी के भी उदाहरण हैं. 1980 में तमिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी, 1981 में राजस्थान के राज्यपाल रघुकुल तिलक, 1992 में नागालैंड के राज्यपाल एमएम थॉमस और 2014 में मिजोरम की राज्यपाल कमला बेनीवाल को बर्खास्त कर दिया गया था. इसके अलावा बड़ी संख्या में राज्यपालों को त्यागपत्र देने के लिए विवश करने के भी अनेक उदाहरण हैं. पिछले वर्ष नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद राज्यपालों को हटाने का मामला कई दिनों तक चर्चा का मुख्य विषय बना रहा था.
– कब हटाये जा सकते हैं राज्यपाल : राज्यपाल का कार्यकाल पांच साल का होता है, लेकिन अगर सरकार की मंशा के अनुरूप वे इस्तीफा नहीं देते, तो इन परिस्थितियों में उन्हें बरखास्त किया जा सकता है. हालांकि, प्रचलित परंपरा के मुताबिक, प्रधानमंत्री अगर राष्ट्रपति से किसी राज्यपाल को बदलने की अनुशंसा करते हैं और इसके लिए राज्यपाल के भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और संविधान के विरुद्ध कार्यो (यदि ऐसा किया गया हो तो) का कारण देते हैं, तो राष्ट्रपति, राज्यपाल को तुरंत पद से इस्तीफा देने के आदेश देते हैं.
रोमेश भंडारी
रोमेश भंडारी 19 जुलाई, 1996 से 17 मार्च, 1998 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे. राज्य में कल्याण सिंह के नेतृत्ववाली सरकार को तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 21 फरवरी, 1998 को बरखास्त कर दिया था.
दरअसल, भंडारी ने नाटकीय घटनाक्रमों के बीच जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. कल्याण सिंह ने राज्यपाल के इस फैसले को इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनौती दे दी. 23 फरवरी को हाइकोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक ठहरा दिया. इसके बाद जगदंबिका पाल को महज दो दिनों के बाद फैसला आते ही तत्काल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बन गये.
सैयद सिब्ते रजी
सैयद सिब्ते रजी 10 दिसंबर, 2004 से 25 जुलाई, 2009 के बीच झारखंड के राज्यपाल रह चुके हैं. वर्ष 2005 में झारखंड में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सैयद सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलायी.
हालांकि शिबू सोरेन विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने में विफल रहे और नौ दिनों के बाद ही उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद एनडीए ने राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश किया. आखिरकार 13 मार्च, 2005 को अजरुन मुंडा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार सत्ता में आयी और मुंडा को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी.
बूटा सिंह
बूटा सिंह वर्ष 2004 से 2006 के बीच बिहार के राज्यपाल रह चुके हैं. बतौर राज्यपाल बूटा सिंह का फैसला उस समय विवादों में आया, जब 2005 में बिहार विधानसभा चुनावों के बाद किसी भी दल को बहुमत न आने की अवस्था में उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस फैसले की आलोचना की. सुप्रीम कोर्ट ने बूटा सिंह की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने एक खास पार्टी को सत्ता में लाने के लिए संघीय कैबिनेट को राज्य के हालात के बारे में सही सूचना नहीं मुहैया करायी है. हालांकि बूटा सिंह ने अपने बचाव में कहा कि वे किसी भी खास पार्टी के समर्थन में नहीं हैं, लेकिन सरकार गठन को लेकर उनकी गतिविधियां संदेह के दायरे में आ चुकी थी.
कमला बेनीवाल
कमला बेनीवाल को 27 नवंबर, 2009 को गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया. इससे करीब एक माह पूर्व ही उन्हें त्रिपुरा का राज्यपाल बनाया गया था. गुजरात का राज्यपाल बनने के बाद राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके बीच कई मसलों पर टकराव की स्थिति बनी रही. अगस्त, 2011 में (अन्ना आंदोलन के समय) केंद्र सरकार की ओर से सभी राज्यों को सरकार की निगरानी के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति करने के लिए कहा गया था.
कमला बेनीवाल ने राज्य सरकार की मंजूरी के बिना राज्य के पूर्व न्यायाधीश आरए मेहता को राज्य का पहला लोकायुक्त नियुक्त कर दिया. गुजरात लोकायुक्त अधिनियम 1986 की धारा 3 के तहत राज्य सरकार से बिना सलाह के उन्होंने लोकायुक्त की नियुक्ति की थी.
राज्यपाल के फैसले के बावजूद लोकायुक्त की नियुक्ति पर राज्य सरकार ने गुजरात हाइकोर्ट के आदेश के बाद ही लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर विधानसभा में लोकायुक्त विधेयक पास किया और इसे राज्यपाल के पास भेजा. तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने राज्य सरकार के इस बिल में कई गलतियां बता कर विधेयक पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था. इसके बाद राज्य सरकार और राजभवन के बीच तल्ख रिश्ते कायम रहे.
पी वेंकटसुबैया
पी वेंकटसुबैया 26 फरवरी, 1988 से 5 फरवरी, 1990 के दौरान कर्नाटक के राज्यपाल रह चुके हैं. कर्नाटक में 1983 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी. रामकृष्ण हेगड़े जनता पार्टी की सरकार में पहले और इसके बाद अगस्त, 1988 में एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया उस वक्त विवाद में घिरे, जब 21 अप्रैल, 1989 को उन्होंने नैतिकता के आधार पर बोम्मई सरकार को बरखास्त कर दिया. सुबैया ने उस समय कहा कि बोम्मई सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है.
बोम्मई ने विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल से समय मांगा, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया. बोम्मई ने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. फैसला बोम्मई के हक में आया और तत्कालीन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से बोम्मई सरकार फिर से बहाल हुई. मालूम हो कि सुबैया बिहार के राज्यपाल (15 मार्च, 1985 से 25 फरवरी, 1988) भी रह चुके हैं.
एसके सिन्हा
बिहार के गया में जन्मे और सेना के अवकाश प्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा को यूपीए-1 की सरकार के दौरान 4 जून, 2003 को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया. राज्यपाल एसके सिन्हा और राज्य सरकार के बीच अमरनाथ श्रइन बोर्ड को लेकर पहली बार तब विवाद हुआ, जब राजभवन ने अमरनाथ यात्रा को दो महीने तक जारी रखने के लिए कहा.
हालांकि प्रत्येक वर्ष यह तीर्थयात्रा दो सप्ताह से लेकर एक महीने के बीच पूरी हो जाती थी. इसे लेकर जनरल सिन्हा का तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद से टकराव भी हुआ. राज्य सरकार ने साफ इनकार कर दिया कि इतने लंबे समय तक यात्रा की व्यवस्था देख पाना प्रशासन के लिए मुमकिन नहीं है और यह बहुत महंगा साबित होगा.
लेकिन, जनरल सिन्हा ने मुख्यमंत्री की बात को नजरअंदाज करते हुए अपने हिसाब से यात्रा का इंतजाम किया. इसके बाद श्रइन बोर्ड के सदस्यों ने राज्य सरकार और विधानसभा सदस्यों के सवालों का जवाब देना बंद कर दिया. मालूम हो कि अमरनाथ यात्रा के लिए आने वाली तीर्थयात्रियों को बेहतर सुविधा और सुरक्षा मुहैया कराने के मकसद से जम्मू-कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला के शासनकाल में वर्ष 2002 में अमरनाथ श्रइन बोर्ड का गठन किया गया था.
वर्ष 2003 में जनरल सिन्हा श्रइन बोर्ड के अध्यक्ष बनाये गये और बोर्ड के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने यह दलील दी कि राज्यपाल होने के नाते वे विधानसभा के प्रति जवाबदेह नहीं हैं.
इसके अलावा, जनरल सिन्हा ने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की ओर से कई बार की गयी उस मांग को भी ठुकरा दिया, जिसमें कश्मीर से सेना की वापसी की मांग की गयी थी. आतंकी घटनाओं में पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर भी सिन्हा के कार्यकाल के दौरान राजभवन और तत्कालीन मुख्यमंत्री के बीच एकमत नहीं कायम हो पाया था.
दरअसल, जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद चाहते थे कि सेना के साथ होने वाली मुठभेड़ों में मारे जाने वाले आतंकियों के परिवारों को भारत सरकार की ओर से पेंशन मिलनी चाहिए, लेकिन सिन्हा ने इसकी सिफारिश नहीं की. सिन्हा ने तर्क दिया कि पूर्वोत्तर समेत देश के किसी भी इलाके में इस तरह की व्यवस्था नहीं है. ऐसे में इस बात की सिफारिश करना उचित नहीं होगा.
बीएल जोशी
बनवारी लाल जोशी 28 जुलाई, 2009 से जून, 2014 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रह चुके हैं. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के बीच कई मसलों पर उनका टकराव होता रहा. दरअसल, मायावती ने अपने कार्यकाल में प्रतिमाओं और अन्य विवादित स्मारकों की सुरक्षा के लिए एक अलग फोर्स बनाने का प्रस्ताव रखा. प्रस्तावित कानून में इस फोर्स को किसी को बिना कारण बताये किसी को भी गिरफ्तार करने के भी अधिकार दिये गये.
विपक्ष ने इस कानून की निंदा की थी और एक नयी फोर्स बनाने को गैर-जरूरी बताया था. मायावती की ओर से इस प्रस्ताव को राजभवन भेजे जाने के बाद राज्यपाल ने बिल को मंजूरी नहीं दी, जिस कारण जोशी सुर्खियों में आये.
हंसराज भारद्वाज
यूपीए-1 की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हंसराज भारद्वाज को 25 जून, 2009 को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किया गया. भारद्वाज अपने इस कार्यकाल के दौरान उस वक्त सुर्खियों में आये, जब उन्होंने कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा की बहुमत वाली सरकार को बरखास्त कर दिया था.
हंसराज भारद्वाज ने विधानसभा में बहुमत हासिल कर चुकी येदियुरप्पा सरकार के बहुमत को फर्जी तरीके से हासिल करना बताया और उसे दोबारा बहुमत साबित करने का आदेश दिया. साथ ही, राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी. राज्यपाल रहते हुए भारद्वाज ने कर्नाटक के तीन मंत्रियों को सफाई देने के लिए राजभवन में हाजिर होने का आदेश दिया. जब तीनों मंत्रियों ने अपने-अपने वकील राजभवन भेजे, तो भारद्वाज ने चुनाव आयोग से इन तीनों मंत्रियों को हटाने के लिए कहा.
जीडी तवासे
जीडी तवासे 1980 के दशक में हरियाणा के राज्यपाल रह चुके हैं. हरियाणा में उस समय देवीलाल और भजनलाल दोनों ही जनता पार्टी के बड़े नेता थे. वर्ष 1979 में हरियाणा देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल की सरकार बनी. 1982 में भजनलाल ने देवीलाल के कई विधायकों को अपने पक्ष में करके मुख्यमंत्री का पद हासिल कर लिया. भजनलाल भले ही हरियाणा में देवीलाल के कद के नेता नहीं थे, लेकिन उन्हें कांग्रेस के कुछ केंद्रीय नेताओं का समर्थन प्राप्त था.
विधायकों को अपने पक्ष में करने की इस घटना के बाद हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल जीडी तवासे ने भजनलाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. राज्यपाल के इस फैसले से नाराज चौधरी देवीलाल ने राजभवन पहुंच कर और राज्यपाल के चेहरे पर स्याही पोत कर अपना विरोध जताया था. अपने पक्ष के विधायकों को देवीलाल अपने साथ दिल्ली के एक होटल में ले आये थे, लेकिन ये विधायक यहां से निकलने में कामयाब रहे और भजनलाल ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया.
ठाकुर रामलाल
ठाकुर रामलाल 15 अगस्त, 1983 को आंध्र प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त किये गये. हिमाचल प्रदेश में जन्मे ठाकुर रामलाल 29 अगस्त, 1984 तक इस पद पर रहे. इनका फैसला उस समय विवाद में आया, जब अपने कार्यकाल के दौरान इन्होंने बहुमत हासिल एनटी रामाराव की सरकार को गिराते हुए रामाराव की सरकार में वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया.
दरअसल, उस समय एनटी रामाराव हार्ट सजर्री के सिलसिले में अमेरिका गये हुए थे. अमेरिका से लौटने पर एनटी रामाराव ने तत्कालीन राज्यपाल रामलाल के खिलाफ मोरचा खोल दिया. राज्य में बिगड़ते हालात को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को न चाहते हुए भी आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रामलाल को पद से हटाना पड़ा. शंकर दयाल शर्मा को राज्यपाल बनाया गया और उन्होंने एनटी रामाराव को एक बार फिर आंध्र प्रदेश की बागडोर सौंपते हुए राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त किया.
एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में
सुप्रीम कोर्ट का वह महत्वपूर्ण फैसला
एस आर बोम्मई
(जन्म-6 जून, 1924. निधन- 10 अक्तूबर, 2007)
एस आर बोम्मई कर्नाटक के ग्यारहवें मुख्यमंत्री (कार्यकाल – 13 अगस्त, 1988 से 21 अप्रैल, 1989 तक) थे. वे यूनाइटेड फ्रंट सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री (1996 से 1998) भी रहे.
मार्च, 1994 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक खंडपीठ ने एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में बहुचर्चित निर्णय दिया था. इसमें संविधान के अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश थे. इस मामले में खंडपीठ ने कुल छह फैसले दिये थे. अलग-अलग फैसलों की वजह से कुछ समय के लिए अंतिम निष्कर्षो को लेकर भ्रम की स्थिति भी थी, लेकिन जल्दी ही मामला स्पष्ट हो गया था.
ऐसी उमीद की जा रही थी कि इस निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा राज्यपाल के जरिये राज्य सरकार को स्थापित करने या हटाने के मनमाने रवैये पर लगाम लगेगी. कुछ हद तक ऐसा हुआ भी है, लेकिन इसके बाद भी ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिनमें केंद्र सरकार और राज्यपाल की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं. खंडपीठ के बहुमत के निर्णय की बड़ी खासियत यह है कि इसने 1977 के एक मामले के फैसले के तहत अनुच्छेद 356 के प्रयोग को अदालतों द्वारा समीक्षा न कर सकने की परंपरा को उलट दिया.
बोम्मई मामले के फैसले ने राज्य सरकार के बहुमत के निर्धारण की प्रक्रिया को स्पष्ट शब्दों में उल्लिखित किया है- ‘उन सभी मामलों में, जहां कुछ विधायकों द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने की बात हो, बहुमत के निर्धारण का उचित तरीका सदन में शक्ति-परीक्षण है, न कि किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत मत, भले ही वह राज्यपाल हो या राष्ट्रपति.’
न्यायाधीश बी पी जीवन रेड्डी और एस सी अग्रवाल ने अपने फैसले में सदन में शक्ति-परीक्षण की प्रक्रिया को भी निर्धारित किया है- ‘मंत्रिपरिषद के पास बहुमत को लेकर पैदा हुए किसी संशय की स्थिति में इसके निर्धारण की एकमात्र जगह सदन है.’
इस स्थिति में सिर्फ एक अपवाद को उल्लिखित करते हुए इन न्यायाधीशों ने कहा था कि राज्यपाल भारी हिंसा की आशंका की स्थिति में और इस बारे में रिपोर्टो को रेखांकित करते हुए अगर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सदन में समुचित मतदान की स्थिति नहीं है, तो सदन में शक्ति-परीक्षण को टाला जा सकता है. न्यायाधीश पीबी सावंत और कुलदीप सिंह ने सुझाव दिया था कि ऐसी स्थिति में यदि कोई उपाय निकाले जाने की संभावना हो और इससे संविधान के अनुसार राज्य के शासन में कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता है, तो इस अनुच्छेद के तहत घोषणा नहीं की जा सकती है.
न्यायाधीश जीवन रेड्डी और अग्रवाल की राय से न्यायाधीश एस रत्नावेल पांडियन भी सहमत थे. कहा गया कि संविधान के किसी विशेष व्यवस्था के न मानने की प्रत्येक स्थिति आवश्यक नहीं है कि वह अनुच्छेद 356 के लागू करने का आधार बन जाये.
इन आधारों पर स्पष्ट है कि बोम्मई मामले में न्यायाधीशों की बहुमत राय यही थी कि राज्य में राष्ट्रपति शासन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए. 1992 में बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद भाजपा-शासित चार प्रदेशों के सरकार की बरखास्तगी को अलग-अलग तर्को पर न्यायाधीशों ने सही ठहराया था.
बहरहाल, बोम्मई फैसला सिर्फ सरकार बनाने या हटाने को लेकर ही एक महत्वपूर्ण निर्णय नहीं है, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंधों तथा भारत के संघीय ढांचे को मजबूत करने के लिहाज से भी भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर है.
दुर्भाग्य से, निर्णय की स्पष्टता के बावजूद राज्यों में सरकार गठन के मामले में केंद्र सरकारों के अनुचित दखल के कई उदाहरण मिलते रहे हैं. विभिन्न राजनीतिक दलों ने अलग-अलग समय में बोम्मई मामले के निर्णय की मूल भावना से उलट हरकतें की हैं.
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