भारत-पाक के बीच गोलीबारी में फंसा सुनैना का ‘ब्रह्नास्त्र’

Updated at : 16 Oct 2014 6:33 AM (IST)
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भारत-पाक के बीच गोलीबारी में फंसा सुनैना का ‘ब्रह्नास्त्र’

मीनापुर (मुजफ्फरपुर): अगर भारत-पाकिस्तान सीमा पर गोलीबारी नहीं होती, तो मुजफ्फरपुर के घोसौत की पांचवीं पास सुनैना देवी 11 अक्तूबर को अपने जैविक‘ब्रह्नास्त्र’ के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बता चुकी होतीं. सुनैना के ‘ब्रह्नास्त्र’ से देश के दुश्मन नहीं, बल्कि खेतों के दुश्मन खर-पतवार व कीट-पतंगे मरते हैं. इसी के बारे में जानने […]

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मीनापुर (मुजफ्फरपुर): अगर भारत-पाकिस्तान सीमा पर गोलीबारी नहीं होती, तो मुजफ्फरपुर के घोसौत की पांचवीं पास सुनैना देवी 11 अक्तूबर को अपने जैविक‘ब्रह्नास्त्र’ के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बता चुकी होतीं.

सुनैना के ‘ब्रह्नास्त्र’ से देश के दुश्मन नहीं, बल्कि खेतों के दुश्मन खर-पतवार व कीट-पतंगे मरते हैं. इसी के बारे में जानने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें पीएमओ बुलाया था. सुनैना दिल्ली जाने के लिए आठ अक्तूबर को पटना पहुंचीं. विमान में बैठने की तैयारी थी कि दिल्ली से फोन आया, कार्यक्रम स्थगित हो गया है. नयी तारीख के बारे में जल्दी ही बताया जायेगा. निराश मन से सुनैना अपने गांव लौट गयीं और खेतीबारी में लग गयीं.

सुनैना की हरित क्रांति

मुजफ्फपुर जिले के मीनापुर प्रखंड के घोसौत की सुनैना देवी राधा जीविका स्वयं सहायता समूह के तहत महिमा जीविका ग्राम संगठन से जुड़ी हैं. वह गंगा जीविका कृषि उत्पादक समूह की अध्यक्ष हैं. उनके प्रयास से घोसौत के लोग जैविक खेती कर रहे हैं. सुनैना ने रासायनिक खाद व बीज का जैविक विकल्प खोजा है. उन्होंने जैविक आग्नेयास्त्र, ‘ब्रह्नास्त्र’, घन जीवामृत, जीवामृत व निमास्त्र बनाया है, जिनका उपयोग करके डीएपी व यूरिया की जरूरतों से खेत को बचाया जा सकता है.

जीवामृत डीएपी यूरिया का विकल्प है, तो घन जीवामृत बेहतर खाद का काम करता है. आग्नेयास्त्र व ‘ब्रह्नास्त्र’ बेहतर प्राकृतिक कीटनाशक हैं. उड़नेवाले कीड़ों को निमा मार गिराता है. ये सभी जैविक रूप से तैयार किये जाते हैं. सुनैना कहती हैं कि एक कट्ठा आलू की फसल तैयार करने के लिए रासायनिक खाद पर चार हजार रुपये खर्च होते हैं. वहीं, जैविक खाद का खर्च महज एक हजार रुपये आता है. जैविक खाद से खेतों की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है और उत्पादन भी ज्यादा होता है. सुनैना का प्रयास अब धरातल पर दिखने लगा है. उनकी खेती के तरीके को अब घोसौत गांव के 80 फीसदी लोगों ने अपना लिया है.

दो साल से खेती कर रहीं सुनैना

जीविका से जुड़ने के बाद सुनैना दो वर्षो से खुद खेती कर रही हैं. इसके साथ ही वह मधुमक्खी पालन भी करती हैं. पहले सुनैना के खेतों में साल में एक ही फसल होती थी, लेकिन जब से उन्होंने खेती का काम शुरू हुआ है, तब से एक ही खेत में आलू, गोभी, धनिया, लहसुन व टमाटर जैसी 10 फसलें लगाती हैं.

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