विश्व सिनेमा में यह समय
Updated at : 05 Jan 2020 7:48 AM (IST)
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अजित राय वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विश्व सिनेमा में इस साल (2020) कई मास्टर फिल्मकारों की नयी फिल्मों का इंतजार रहेगा. दुनियाभर में सिकुड़ता लोकतंत्र, मानवाधिकारों का हनन, जीवन पर पर्यावरण के खतरे, हथियारों की होड़, संवाद की बढ़ती तकनीक के बावजूद संवादहीनता आदि की चिंताएं विश्व सिनेमा के केंद्र में रहेंगी. स्टीवन स्पीलबर्ग, अलेजांद्रो गोंजालेज […]
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अजित राय
वरिष्ठ फिल्म समीक्षक
विश्व सिनेमा में इस साल (2020) कई मास्टर फिल्मकारों की नयी फिल्मों का इंतजार रहेगा. दुनियाभर में सिकुड़ता लोकतंत्र, मानवाधिकारों का हनन, जीवन पर पर्यावरण के खतरे, हथियारों की होड़, संवाद की बढ़ती तकनीक के बावजूद संवादहीनता आदि की चिंताएं विश्व सिनेमा के केंद्र में रहेंगी.
स्टीवन स्पीलबर्ग, अलेजांद्रो गोंजालेज ईनारितु, ज्यां लुक गोदार, रोमन पोलांस्की, केन लोच, माइकल हेनेके, कोरनेल मुंड्रूचकू, असगर फरहादी, माजिद मजीदी, जफर पनाही, लुक बेसां जैसे वरिष्ठ दिग्गजों के साथ ही नाओमी क्वासे, सोफिया कपोला, फतेह अकीन, जिया झंके, कोरेइडा हिरोकाजू जैसे चर्चित फिल्मकारों की नयी फिल्मों का इंतजार रहेगा.
अब जरा पिछले साल पर नजर डालते हैं. अधिकांश फिल्मों की विषय वस्तु प्रेम और राजनीति है. हिंसा और सेक्स से उबरने के बाद विश्व सिनेमा वापस मानवीय संबंधों की अनकही कहानियां कह रहा है, लेकिन इन कहानियों के गहरे राजनीतिक आशय भी है. जर्मनी के मार्टिन शेरियर की फिल्म ‘ट्रामफैब्रिक’ और भारत के गीतांजलि राव की एनिमेशन फिल्म ‘बांबे रोज’ अलग-अलग तरह से प्रेम की सिनेमाई सिंफनी हैं.
जर्मनी के बेबल्सबर्ग में एमिल और मिलो के प्रेम के बीच बर्लिन की दीवार हैं, तो मुंबई के सलीम और कमला के बीच धर्म की दीवार. ‘टामफैब्रिक’ देखते हुए मशहूर इतालवी फिल्मकार फेदरिको फेलिनी की दृश्यात्मक भव्यता याद आती है, तो ‘बांबे रोज’ को हम मुंबई की क्लासिक छवियों की चलचित्र प्रदर्शनी कह सकते हैं.
‘टामफैब्रिक’ में फ्रांस के एक गांव में 72 साल का बूढ़ा अपने पांच साल के रोते हुए पोते को सांत्वना देने के लिए अपनी जोखिम भरी प्रेमकथा सुनाता है, जिसकी गर्ल फ्रेंड उसे छोड़कर चली गयी है. वह बताता है कि यदि उसका प्यार सच्चा है, तो एक दिन वह लौट आयेगी. आगे की फिल्म दादा-पोते की बातचीत में चलती है.
गीतांजलि राव की ‘बांबे रोज’ की प्रेम कहानी में कश्मीर से मुंबई विस्थापित सलीम और झोपड़पट्टी में लाचार पिता और छोटी बहन की देखभाल करती कमला है, जिसे चढ़ती उम्र में बूढ़े सेठ को शादी के नाम पर बेच दिया गया था. प्यासा नाम का डांस बार है, बाॅलीवुड के किस्से हैं और पुरानी फिल्मों के गानों का कोलाज है.
गुरुदत की फिल्मों की एक सह-अभिनेत्री मिस शर्ली डिसूजा साठ साल तक कुंवारी रहने के बाद अपने प्रेमी एंटनी को पहली बार डिनर पर घर बुलाती है और उनके पहुंचने से पहले ही क्लासिक अंदाज में दुनिया को अलविदा कह देती है. हिंदुओं का नेता कहनेवाला एक व्यक्ति कमला से जबरदस्ती शादी करके दुबई में उससे गलत काम कराने को आतुर है. वह धमकी भरे अंदाज में सलीम को याद दिलाता है कि वह मुसलमान है और कमला हिंदू. ईसाईयों की कब्रों से फूल चुराकर और उसे बेचकर जीविका चलानेवाला सलीम किसी भी कीमत पर कमला को खोना नहीं चाहता.
कमला की आठ साल की छोटी बहन पढ़ने में अव्वल है और एक गूंगे-बहरे बच्चे को साथ रखना चाहती है. कमला को पुलिस से बचाते हुए सलीम कार दुर्घटना में मारा जाता है, इसके सिवा सब हैप्पी एंडिंग है. एनिमेशन कमाल का है और संगीत बहुत उम्दा. सलीम और कमला बार-बार सपनों की फैंटेसी में जाते हैं, जहां खलनायक बाज बनकर आता है. फिल्म अंत तक मुंबई की तलछंट की गलियों की जादुई दुनिया में बांधे रखती है.
दुनियाभर में लोकतंत्र और मानवाधिकार हनन के साथ पर्यावरण के खतरे, हथियारों की होड़ और अत्याधुनिकता के बावजूद संवादहीनता का जो चरम बढ़ा है, उसे लेकर विश्व सिनेमा चिंतित भी है और सक्रिय भी. इन्हीं विषयों को लेकर, इस साल कुछ सार्थक फिल्मों की हमारी उम्मीद बेमानी नहीं हो सकती है.
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