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कस्बाई-संस्कृति की परिचायक गलियां

Updated at : 22 Sep 2019 2:24 AM (IST)
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कस्बाई-संस्कृति की परिचायक  गलियां

ऐश्वर्या ठाकुरआर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर गुलजार जब भी ‘बल्ली-मारां के मोहल्ले की पेचीदा दलीलों की-सी गलियों’ की बात करते हैं या बशर नवाज जब भी ‘गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाजा’ याद दिलाते हैं, तो स्मृतियां खुद-ब-खुद पुराने शहरों, कस्बों और गावों की तंग गलियों में भटकने लगती हैं. गलियों को स्थानीय संस्कृति के […]

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ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर

गुलजार जब भी ‘बल्ली-मारां के मोहल्ले की पेचीदा दलीलों की-सी गलियों’ की बात करते हैं या बशर नवाज जब भी ‘गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाजा’ याद दिलाते हैं, तो स्मृतियां खुद-ब-खुद पुराने शहरों, कस्बों और गावों की तंग गलियों में भटकने लगती हैं. गलियों को स्थानीय संस्कृति के स्थायी ठौर के रूप में भी देखा जा सकता है.
नये शहर जहां ऊंची इमारतों और ट्रैफिक से अटी चौड़ी सड़कों से पहचाने जाते हैं, वहीं हर डाउनटाउन की असल पहचान होती हैं वहां की संकरी गलियां. हर कस्बे की धमनियों सी हुआ करती हैं ये गलियां, जो शहर के एक हिस्से का राब्ता दूसरे हिस्से से जोड़ती हैं. शायद तभी फ्रांसीसी वास्तु-शिल्पी कार्बूजिए ने भी अपने बसाये नये शहर चंडीगढ़ में सड़कों और गलियों को 7 वी का नाम दिया, जो शरीर की नसों की तरह संचार का माध्यम बने.
गलियां शुरू से ही एक धीमी रफ्तार जिंदगी की परिचायक रही हैं. संकरे होने के कारण गलियों में तांगा, गाड़ी या बसों की आवाजाही नहीं हो सकती थी, जिसके चलते यहां हमेशा से पैदल यात्रियों का एकाधिकार रहा है. बेशक, साइकिलों और स्कूटरों ने गलियों को अपनी घंटी और हॉर्न से भेदकर गुजरने के लिए जगह बना ली है, मगर तब भी बेफिक्री से गुनगुनाते हुए पैदल वालों के लिए गलियां सबसे माकूल रहती हैं.
जापान में ‘रोजी’, यूरोप में ‘ऐली’ और बंगाल में ‘सरणी’ जैसे नामों से पहचानी जानेवाली गलियों का चित्रण अक्सर साहित्य और सिनेमा में भी कई रूपों में दिखायी देता है. जहां अमृता प्रीतम का उपन्यास ‘दिल्ली की गलियां’ इस भूल-भुलैया सी गलियों वाले शहर में भटकते हुए किरदारों का इकबालनामा मालूम होता है, वहीं ईरानी निर्देशक अब्बास कियारुस्तमी की फिल्म ‘नान ओ कूचे’ (द ब्रेड एंड द ऐली) में गली एक खूबसूरत रूपक के तौर पर इस्तेमाल की गयी है.
साल 1940 में छपी अहमद अली की किताब ‘ट्विलाइट इन देल्ही’ में पुरानी दिल्ली यानी शाहजहानाबाद की पुर-रौनक गलियों का खूबसूरत जिक्र मिलता है, वैसे ही 2019 में आयी फिल्म ‘गल्ली बॉय’ मुंबई की सबसे बड़ी बस्ती धारावी की तंग गलियों में छिपी कहानियों को बीनती है. कई जासूसी रिसालों में गलियों को अंधेरे, गंदे, अपराधग्रस्त गलियारों की शक्ल में भी बयान किया गया है.
जहां एक तरफ गुरदास मान अपने गीत ‘पिंड दियां गलियां’ से यादों का एक पिटारा खोल देते हैं, वहीं सूफी कलाम में ‘काबे वाली गली’ को अपने माशूक (आराध्य) के घर का पता बताया गया है. अपनी रहस्यमयता और कशिश के कारण बार-बार गलियों को रचनात्मक उपमाओं के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.
तारीख के गुजिश्ता निशानों को खोजते-खरोंचते हुए नौजवानों के दस्ते आज भी जब हैरिटेज-वॉक करते हुए इन गलियों को हैरतजदा नजरों से देखते हुए गुजरते हैं, तो लगता है कि इन बूढ़ी गलियों का वक्त अभी पूरा नहीं हुआ.
अपने घरों की ड्योढ़ियों पर बैठी औरतें-बच्चे आज भी इन गलियों के मुहाफिज जान पड़ते हैं. इन गलियों में कंचे और क्रिकेट खेलते हुए कितने ही बचपन बीत जाते हैं और खुली बस्तियों की तरफ कूच कर जाते हैं, मगर इन गलियों को हमेशा नये-पुराने लोगों के लिए बाहें फैलाये मुंतजिर ही पाया गया है.
हैदराबाद का चूड़ी बाजार हो या लाहौर की पान गली, दिल्ली की गली कासिम-जां हो या पेशावर की चक्का गली; गलियां जेरूसलम की हों या जैसलमेर की, कस्बाई संस्कृति की मोहर लिये ये कूचे (गलियां) आज भी हर रहगुजर को इन ‘अर्बन’ रेगिस्तानों में नखलिस्तान जैसा सुकून देते हैं.
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