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आज के संदर्भ में इंद्र

Updated at : 01 Sep 2019 3:00 AM (IST)
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आज के संदर्भ में इंद्र

हमारा देश― मानवीय इतिहास का सूक्ष्म रूप है, अनुभवों का अकूत भंडार है, ज्ञान का अद्भुत अभिलेखागार है और उत्पीड़नों का एक सूचीपत्र भी है. यहां हर तरह की प्रज्ञा के संकेत-चिह्न मौजूद हैं. पौराणिक कथाओं की तो यहां एक आकाशगंगा ही बहती है. इन्हीं पौराणिक-आध्यात्मिक कथा-लोक से मनोरंजक और शिक्षाप्रद काल्पनिक रचनाएं रची जाती […]

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हमारा देश― मानवीय इतिहास का सूक्ष्म रूप है, अनुभवों का अकूत भंडार है, ज्ञान का अद्भुत अभिलेखागार है और उत्पीड़नों का एक सूचीपत्र भी है. यहां हर तरह की प्रज्ञा के संकेत-चिह्न मौजूद हैं. पौराणिक कथाओं की तो यहां एक आकाशगंगा ही बहती है. इन्हीं पौराणिक-आध्यात्मिक कथा-लोक से मनोरंजक और शिक्षाप्रद काल्पनिक रचनाएं रची जाती हैं. मंजुल प्रकाशन से आयी आशुतोष गर्ग की किताब ‘इंद्र : देवलोक के वर्तमान राजा-पुरंदर की गाथा’ एक ऐसी ही रचना है.

भारतीय मनीषा में देवराज इंद्र अंतरिक्ष के देवता माने जाते हैं. देवताओं के राजा होने के कारण उन्हें देवराज या सुरपति भी कहा जाता है. वर्तमान में उनकी भूमिका पुरंदर की है. दुख की बात है कि पुरंदर के असीम बल, जबरदस्त युद्ध-कौशल और विराट उपलब्धियों के बावजूद, उसका चरित्र अहंकारी और कामुक राजा के रूप में उभरता है. वह देवलोक का स्वामी और देवताओं का राजा भले हो, लेकिन दुर्भाग्य से उसे देवताओं और मनुष्यों के बीच सम्मान और विश्वास प्राप्त नहीं है.
इस किताब के पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि इंद्र देवताओं के राजा का नाम नहीं है और न इंद्र किसी ईश्वर का नाम है. वास्तव में इंद्र एक पदवी है, एक उपाधि है. यह उस व्यक्ति का पदनाम है, जिस पर देवताओं की नगरी देवलोक पर शासन करने का दायित्व होता है. साधारणतः देवलोक के राज-सिंहासन पर बैठनेवाले और देवताओं का राजा कहलाये जानेवाले व्यक्ति को ‘इंद्र’ ही कहते हैं.
इंद्र पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक अपनी रोचकता को बरकरार रखे हुए हैं. अंग्रेजी और हिंदी भाषा में समान गति रखनेवाले आशुतोष गर्ग ने इसे रोचक शैली में लिखा है. उनका मानना है कि वर्तमान समय में महर्षि कश्यप और अदिति के बारह पुत्रों में से एक इंद्र देवलोक की राजधानी अमरावती में पुरंदर नाम से राज-सिंहासन पर विराजमान हैं.
पौराणिक कथाओं के मूल ढांचे को छेड़े बिना कई लेखकों ने इन्हें अपने शब्दों में अपने ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की है. इस पुस्तक में आशुतोष गर्ग की प्रांजल भाषा ने देवलोक के वर्तमान राजा पुरंदर की पौराणिक कथाओं को पाठकों के लिए और भी सुबोध और सहजग्राह्य बनाया है. इस तरह के लेखन को आधुनिक पाठकों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है. मनोज मोहन
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