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चुनावों में अपने असली स्वरूप में आ जाते हैं अनेक नेता

Updated at : 03 May 2019 5:59 AM (IST)
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चुनावों में अपने असली स्वरूप में आ जाते हैं अनेक नेता

सुरेंद्र किशोर राजनीतिक विश्लेषक चुनाव प्रचार जितने अधिक असत्य व अर्ध सत्य के सहारे चल रहा है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया चुनाव प्रचार की गर्मी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल सौदे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कुछ बोल दिया. जो बोला, वह सत्य नहीं था. हवाला देना भी […]

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सुरेंद्र किशोर

राजनीतिक विश्लेषक

चुनाव प्रचार जितने अधिक असत्य व अर्ध सत्य के सहारे चल रहा है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया

चुनाव प्रचार की गर्मी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल सौदे के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कुछ बोल दिया. जो बोला, वह सत्य नहीं था. हवाला देना भी असत्य था. पर, इस मामले में राहुल गांधी कोई अकेले नेता नहीं हैं.

यह पूरा चुनाव प्रचार जितने अधिक असत्य और अर्ध सत्य के सहारे चल रहा है, वैसा इससे पहले कभी नहीं देखा गया. समय के साथ जिस तरह अन्य क्षेत्रों में गिरवट आ रही है, उसी तरह चुनाव प्रचार के स्तर में भी. बल्कि कुछ अधिक ही. चुनावों के समय एक साथ कई लोगों की परीक्षा हो जाती है. नेताओं की तो अधिक. यह अच्छा ही है. हालांकि, इस भीषण गर्मी मेें भी कुछ थोड़े से नेताओं ने अपने मिजाज की ठंडी बनाये रखी है.

पर, अधिकतर नेताओं ने मर्यादा का ध्यान नहीं रखा. एक बड़े नेता ने कहा कि फलां की सरकार बन जायेगी तो आरक्षण समाप्त हो जायेगा. दूसरे ने कहा कि संविधान ही खत्म हो जायेगा? क्या ऐसा करना किसी दल या नेता के लिए संभव है? कत्तई नहीं. पर असत्य बोलने से तो कोई रोकने वाला है नहीं. इस चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को यह भी पता चला कि मिट्टी के भी रसगुल्ले बनते हैं जिनमें पत्थर भरे होते हैं.

एक नेता ने यह कहा तो दूसरे ने कहा कि वे भी मेरे लिए प्रसाद की तरह होंगे. चुनाव आयोग किसी मुख्यमंत्री से कहे कि आप इतने घंटे तक प्रचार नहीं करेंगे और उन्होंने नहीं किया. संभवतः ऐसा पहली बार हुआ. मुख्यमंत्री के

अलावा भी कई नेताओं को खास-खास अवधि तक के लिए चुनाव प्रचार से रोका गया. यह भी एक रिकाॅर्ड ही रहा. इसके बावजूद असत्य, अशालीन और अशिष्ट शब्दावलियों का इस्तेमाल जारी रहा.

भूली-बिसरी याद : 1989 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले की बात है. हर बार की तरह नेतागण अपने राजनीतिक भविष्य जानने के लिए ज्योतिषियों के यहां दौड़ लगा रहे थे. अक्तूबर, 1989 में एक हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका ने ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों को कवर स्टोरी बना दी.

अब उनकी भविष्यवाणियां पढ़िये. ‘वीपी सिंह अगले चुनाव में प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे. इसलिए नहीं कि उनके ग्रह राजीव गांधी से कमजोर हैं, बल्कि इसलिए कि उनकी पार्टी और सहयोगी कमजोर हैं.’

‘ग्रहों की चाल को परखने से ज्ञात होता है कि राजीव गांधी फिर प्रधानमंत्री बनेंगे.’ चंद्रशेखर के बारे में ज्योतिषियों की भविष्यवाणी थी कि ‘आगामी चुनाव में चंद्रशेखर विजयी होंगे और उनका महत्व बढ़ेगा, किन्तु प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य उन्हें नहीं मिलेगा.’ याद रहे कि 1989 के चुनाव के बाद पहले वीपी सिंह और उनके बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने. उन दिनों के सबसे बड़ी अंग्रेजी साप्तहिक पत्रिका ने दस शीर्ष ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां छापी थीं.

उनमें से नौ ने कहा कि राजीव गांधी फिर प्रधानमंत्री बनेंगे. सिर्फ एक ने भविष्यवाणी की कि वीपी सिंह प्रधानमंत्री बनेंगे. बल्कि चुनाव से पहले जनमत जानने के काम में लगे पेशवेर संगठनों की भविष्यवाणियां तब भी सत्य के अधिक करीब थी. फिर चुनाव हो रहे हैं. भविष्य वक्ताओं के यहां अनेक नेता जा रहे हैं. कुछ ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां भी छपेंगी. देखिए ज्योतिषी इस बार सही होते हैं या नहीं.

और अंत में : जेल में सड़ने से बचने के लिए विजय माल्या अब कह रहा है कि ‘मैं बैंकों का पूरा पैसा लौटाने को तैयार हूं.’ इस बेबस स्वर से लगा कि यदि आर्थिक घोटालेबाजों के लिए फांसी का प्रावधान होता तो माल्या घोटाला ही नहीं करता. पर इस चुनाव में यह कोई मुद्दा ही नहीं कि देश के खजाने को लूटने वालों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो. सुप्रीम कोर्ट ने हाल में इस बात पर अफसोस जाहिर किया है कि हम भ्रष्टाचार के लिए मृत्युदंड नहीं देसकते.

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