भारत-पाक दोस्ती अब भी दूर की कौड़ी?

Updated at : 27 Jun 2014 11:41 AM (IST)
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भारत-पाक दोस्ती अब भी दूर की कौड़ी?

एंड्र्यू नॉर्थ बीबीसी, दक्षिण एशिया संवाददाता हाथ मिलाने से शुरुआत हुई, फिर दोनों की माँओं के उपहारों का आदान-प्रदान हुआ. नरेंद्र मोदी की माँ की तरफ़ से शाल भेंट की गई तो इसके बदले नवाज़ शरीफ़ की माँ की ओर से साड़ी दी गई. इसके बाद सोशल मीडिया और ख़तों के माध्यम से दोनों प्रधानमंत्रियों […]

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हाथ मिलाने से शुरुआत हुई, फिर दोनों की माँओं के उपहारों का आदान-प्रदान हुआ. नरेंद्र मोदी की माँ की तरफ़ से शाल भेंट की गई तो इसके बदले नवाज़ शरीफ़ की माँ की ओर से साड़ी दी गई.

इसके बाद सोशल मीडिया और ख़तों के माध्यम से दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच गर्मजोशी वाले शब्दों का आदान-प्रदान हुआ.

एक भारतीय अख़बार ने पूछा कि क्या ‘माँओं का प्यार’ दो प्रतिद्वंद्वी पड़ोसियों के बीच नए संबंध का आधार बनेगा?

नवाज़ शरीफ़ की भारत यात्रा में अधूरी रह गई वो ख़्वाहिश

भारत के नए प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के पद ग्रहण करने से पहले ही किसी ने कहा था कि उनके पास वफ़ादार राष्ट्रवादी हिंदू समर्थकों का आधार है जो पाकिस्तान के साथ किसी समझौते की उनकी राह को आसान बनाएगा.

लेकिन, शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए मोदी के आमंत्रण को नवाज़ शरीफ़ द्वारा स्वीकार किए एक महीना हो चुका है और लगता है कि इन माताओं को अब भी बहुत कुछ करना है.

दोनों पक्ष कहते हैं कि उनके कूटनीतिज्ञ बातचीत कर रहे हैं लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों की सहमति के बावजूद विदेश सचिवों की बैठक जैसा एक साधारण सा अगला क़दम उठाया जाना बाकी है.

रमज़ान का महीना शुरू होने वाला है और इसका मतलब है और देरी.

चल रही है गुप्त बातचीत?

एक पाकिस्तानी अख़बार ने ख़बर दी है कि इस्लामाबाद और दिल्ली के बीच ‘पर्दे के पीछे से बातचीत’ को फिर से शुरू करने की कोशिशों को दोनों पक्षों द्वारा ख़ारिज कर दिया गया.

वास्तव में, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि गुप्त रूप से बातचीत जारी है.

आधिकारिक स्थिति जो भी हो, इसमें कोई संशय नहीं है कि दोनों तरफ़ से अच्छे संबंध को लेकर एक उत्सुकता है.

मोदी-शरीफ़ की मुलाक़ात में उठा आतंकवाद का मुद्दा

पाकिस्तानी अपने पड़ोसी से काफ़ी प्रभावित हैं और इनमें से ज़्यादातर वहां कभी नहीं जा पाएंगे. वे विदेशी पर्यटकों से बड़े ख़तरनाक़ सवाल पूछते हैं, जैसे, ”किसका आम सबसे स्वादिष्ट है, भारत का या पाकिस्तान का?”

जब दिल्ली के प्रेस क्लब ने एक शाम पाकिस्तानी व्यंजन और संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया तो ग्रिल में लगा मसालेदार गोश्त देखते-देखते गायब हो गया. इस कार्यक्रम में भारतीय पत्रकार अपने परिवार के साथ आए थे और साथ में टिफिन भी लाए थे ताकि अगर कुछ बचे तो उसे घर भी ले जा सकें.

ये व्यंजन बनाने इस्लामाबाद से खानसामे बुलाए गए थे.

नज़रिया अलग-अलग

शायद बेहतर खाने ने ही पिछले हफ़्ते थाईलैंड में पाकिस्तानी और भारतीय अधिकारियों के बीच अनौपचारिक बहस का माहौल बनाया.

लेकिन उसके बाद जारी उनके बयानों से बड़ी मुश्किल से लगा कि कोई प्रगति हुई है.

एक प्रवक्ता ने कहा, ”दिल्ली का मानना है कि गुप्त रूप से या प्रत्यक्ष, किसी नई बातचीत की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि आर्थिक संबंधों जैसे आसान मुद्दों को आगे बढ़ाने पर हमारे पास पहले से एक रोड मैप मौजूद है, जिस पर दो वर्ष पहले दोनों पक्षों ने सहमति दी थी.”

पाकिस्तान पर मोदी की पहल, क्या होंगे नतीजे?

उन्होंने कहा कि यह पाकिस्तान पर है कि वो वाघा सीमा से ज़्यादा सामानों के आवागमन की इजाज़त देने पर अगला क़दम क्या उठाता है. इसके जवाब में ही भारत कोई प्रतिक्रिया देगा.

इस्लामाबाद में इसे लेकर नज़रिया विभाजित है लेकिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय इन मुद्दों पर सकारात्मकता का मुल्लमा चढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ”वाघा के मसले पर हम काम कर रहे हैं.” हालांकि उन्होंने रोड मैप को विदेश सचिवों की बैठक का एक मुख्य हिस्सा बताया.

पाकिस्तान की शक्तिशाली सेना अब भी नई मोदी सरकार के अगले क़दम पर सतर्कता बरत रही है.

कश्मीर और चरमपंथ

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सेना के बारे में ख़बरें आम थीं कि वो शरीफ़ के दिल्ली दौरे के ख़िलाफ़ थी.

एक सुरक्षा सूत्र ने मुस्कराते हुए कहा, ”अभी तक यह नकारात्मक नहीं हुआ है.”

उन्होंने कहा, ”हमें भारत की तरफ़ से भी पारस्परिक जवाब की ज़रूरत है. कश्मीर पर कोई समझौता नहीं हो सकता.”

पाकिस्तान को देर क्यों लगी निमंत्रण कबूलने में?

दोनों के बीच ब्रिटेन से आज़ादी हासिल करने के समय से ही यह मतभेद का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है.

अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय मिशन पर हालिया हमले के लिए जिस पाकिस्तानी चरमपंथी ग्रुप के हाथ होने का दावा किया जा रहा है, उस पर अमरीका द्वारा लगाए गए नए प्रतिबंध ने चरमपंथ के ज़ख़्म को और छेड़ दिया है.

संस्कृति और उर्दू एवं हिंदी भाषाओं में बारीक़ एकरूपता इस बात को लगातार याद दिलाती है कि भारत और पाकिस्तान सहोदर हैं. लेकिन दोनों के बीच मित्रता अब भी दूर की कौड़ी लगती है.

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