'सिर्फ़ हिंदी भाषी राज्यों के लिए था निर्देश'

Updated at : 21 Jun 2014 1:51 PM (IST)
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'सिर्फ़ हिंदी भाषी राज्यों के लिए था निर्देश'

केंद्र सरकार के सोशल मीडिया पर हिंदी को बढ़ावा देने के कथित निर्देश पर बढ़ते विवाद के बीच सरकार ने सफ़ाई दी है. विवाद बढ़ने के बाद सरकार की ओर से कहा गया है कि ये निर्देश सिर्फ़ हिंदी भाषी राज्यों के लिए है. सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "भारत […]

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केंद्र सरकार के सोशल मीडिया पर हिंदी को बढ़ावा देने के कथित निर्देश पर बढ़ते विवाद के बीच सरकार ने सफ़ाई दी है.

विवाद बढ़ने के बाद सरकार की ओर से कहा गया है कि ये निर्देश सिर्फ़ हिंदी भाषी राज्यों के लिए है.

सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने 10 मार्च 2014 को जारी एक परिपत्र में कहा था कि हिंदी भाषी राज्यों को सोशल मीडिया पर हिंदी के इस्तेमाल को बराबर का महत्व देना चाहिए. निर्देशों में यह भी कहा गया था कि भारत सरकार के सोशल मीडिया खातों पर हिंदी और अंग्रेज़ी का इस्तेमाल होना चाहिए."

बयान में सफ़ाई देते हुए कहा गया है कि इसका आशय ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में संवाद के लिए हिंदी के इस्तेमाल को थोपना नहीं है. हिंदी भाषा का इस्तेमाल सिर्फ़ हिंदी भाषी राज्यों में ही ज़रूरी किया गया है.

बयान में कहा गया, "गृह मंत्रालय ने 27 मई को जारी परिपत्र में राजभाषा विभाग के इन्हीं निर्देशों को लागू करने के लिए कहा था. इसलिए यह न ही कोई नई नीति है और न ही ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी को थोपना है."

सहयोगी दल भी विरोध में

इससे पहले दक्षिण भारत के सियासी दलों समेत उत्तर भारत के नेताओं ने भी सरकार के इस निर्देश की आलोचना की.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने नरेंद्र मोदी को इस संबंध में पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज करवाया है.

इससे पहले तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि ने इसे हिंदी थोपे जाने की शुरुआत क़रार दिया है.

तमिलनाडु में भाजपा की सहयोगी पार्टी एमडीएमके के नेता वाइको ने भी केंद्र सरकार के इस कथित निर्देश का विरोध किया है. उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए भारत की एक़ता के लिए ख़तरा बताया है. उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु में हिंदी को थोपने पर ख़ून तक बह चुका है.

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी केंद्र सरकार के इस कथित आदेश का विरोध किया है. उन्होंने कहा, "हमारी रियासत में दो आधिकारिक भाषाएं हैं, उर्दू और अंग्रेज़ी, हम अपनी अधिकारिक भाषाओं का इस्तेमाल करते रहेंगे, जो हिंदी इस्तेमाल करना पसंद करते हैं वो करें, हमारा देश बहुत बड़ा है, यहाँ एक ज़बान, एक मज़हब लोगों पर थोपा नहीं जा सकता है."

‘आपत्तिजनक’

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सरकार सोशल मीडिया खातों पर पर सिर्फ़ हिंदी में संवाद के कथित आदेश को आपत्तिजनक क़रार दिया है.

पार्टी नेता वृंदा करात ने कहा, "सीपीआई (एम) सरकार के इस ताज़ा हस्तक्षेप के पूरी तरह ख़िलाफ़ है. आपत्तिजनक बात यह है कि सरकार ने सिर्फ़ हिंदी का ही इस्तेमाल करने के लिए कहा है. निश्चित तौर पर सरकारी वार्तालाप में हिंदी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए लेकिन हिंदी संवाद की सिर्फ़ एकमात्र भाषा नहीं हो सकती."

वहीं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू का कहना है कि इसे अन्य भाषाओं के अपमान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, "हमने ये कहा है कि हिंदी को राज्यभाषा होने के नाते बढ़ावा देना चाहिए. इसका मतलब यह नहीं है कि हम क्षेत्रीय भाषाओं की अनदेखी कर रहे हैं."

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता मुख़्तार अब्बास नक़वी ने सरकार के फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा, "ये राष्ट्रभाषा का सम्मान है, अंग्रेज़ी का अपमान नहीं है. अंग्रेजी का अपमान कहकर राजभाषा को रोका जाना ठीक नहीं है. महात्मा गाँधी से लेकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय समेत तमाम लोगों ने कहा है कि हमें राजभाषा को सम्मान देना चाहिए और यह देश भर में संवाद का साधन होना चाहिए. हिंदी हिंदुस्तानियत से जुड़ी हुई है."

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