ब्राज़ील के वो लोग जो फ़ुटबॉल से कोसों दूर हैं

Updated at : 21 Jun 2014 1:51 PM (IST)
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ब्राज़ील के वो लोग जो फ़ुटबॉल से कोसों दूर हैं

मरियाना डेला बारबा बीबीसी ब्राज़ील ब्राज़ील में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें फुटबॉल में दिलचस्पी नहीं है. ये उन लोगों में शामिल नहीं हैं जो सड़कों पर उतरकर ब्राज़ील में फ़ुटबॉल विश्वकप आयोजन का विरोध कर रहे हैं. ये वो लोग हैं जो टीवी के सामने बैठकर या स्टेडियम जाकर फ़ुटबॉल मैच देखने […]

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ब्राज़ील में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें फुटबॉल में दिलचस्पी नहीं है.

ये उन लोगों में शामिल नहीं हैं जो सड़कों पर उतरकर ब्राज़ील में फ़ुटबॉल विश्वकप आयोजन का विरोध कर रहे हैं.

ये वो लोग हैं जो टीवी के सामने बैठकर या स्टेडियम जाकर फ़ुटबॉल मैच देखने में 90 मिनट बर्बाद करना पसंद नहीं करते हैं.

ये वो लोग हैं जो इसके बजाए केक बनाना, समंदर की लहरों पर मचलना, अपने कुत्ते को टहलाना, पसंदीदा फ़िल्म देखना और कुछ नहीं तो सोना पसंद करते हैं.

यहां हम आपकी मुलाक़ात पांच ऐसे लोगों से करा रहे हैं जो इस धारणा को तोड़ रहे हैं कि ब्राज़ील में हर कोई फ़ुटबॉल का दीवाना है.

विक्टर पवान

विक्टर एक छात्र हैं. उनकी उम्र 18 वर्ष है और वे साओ पाअलो में रहते हैं.

वे कहते हैं, ”ये कोई राजनीतिक चीज नहीं हैं. फ़ुटबॉल मुझे ज़रा भी पसंद नहीं है. जब में छोटा था, मैंने खेलने की कोशिश की थी. लेकिन मैं इसमें अच्छा नहीं था. अब मैं लोगों से कहता हूं कि मुझे फ़ुटबॉल पसंद नहीं है.”

विक्टर का मानना है कि चूंकि वे पुरुष हैं, इसलिए हर किसी को लगता है कि उन्हें फ़ुटबॉल में दिलचस्पी होगी.

वे कहते हैं, ”मुझे इसकी परवाह नहीं है. मैं तो किसी स्थानीय टीम को सपोर्ट भी नहीं करता हूं. हां मेरी गर्लफ्रेंड को फ़ुटबॉल से प्यार है. वो विश्वकप का हर मुक़ाबला देखती है लेकिन मैं घर में बैठकर पढ़ना या फ़िल्म देखना पसंद करता हूं.”

लुकास केन्यो

साओ पाअलो स्टेट में रहने वाले 39 वर्षीय लुकास पेशे से एक आर्किटेक्ट हैं.

वे कहते हैं, ”इस विश्व कप के दौरान मैंने एक भी मैच नहीं देखा और मैं कोई मैच देखूंगा भी नहीं. सोमवार को जब एक बार फिर ब्राज़ील का मैच होगा, मैं हर दिन की तरह काम पर जाऊंगा.”

लेकिन ब्राज़ील में फ़ुटबॉल विश्वकप के ख़ुमार से बचना आसान नहीं है.

वे कहते हैं, ”मैं यदि कैब लेता हूं तो उसका ड्राइवर रेडियो पर किसी मैच की कमेंट्री सुन रहा होता है. इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि ब्राज़ील खेल रहा है या नहीं. किसी कैफ़े या रेस्तरां में जाओ तो वहां भी यही नज़ारा होता है.”

रॉबर्ट मिलाज़ो

42 वर्षीय रॉबर्ट पेशे से प्रबंधक हैं और रियो दि जनेरो में रहते हैं.

फ़ुटबॉल के बारे में उनकी राय है, ”जब ब्राज़ील खेलता है, मैं लहरों का लुत्फ़ उठाने समंदर किनारे चला जाता हूं.”

रॉबर्ट कहते हैं कि पिछले फ़ुटबॉल विश्वकप के दौरान भी उन्होंने ऐसा ही किया था.

वे कहते हैं, ”इस समय बीच लगभग खाली होते हैं. समंदर में कोई नहीं होता. ब्राज़ील में फ़ुटबॉल पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है लेकिन बाकी खेलों पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया जाता है. यह बात मुझे बहुत निराश करती है. इस देश में कई चीज़ें बेहतर करने की ज़रूरत है. फ़ुटबॉल उनमें से एक नहीं है.”

एलिज़ा नज़ारिएन

एलिज़ा पेश से लेखक हैं. उनकी उम्र 65 साल है और वे भी साओ पाअलो स्टेट में रहती हैं.

वे कहती हैं, ” मुझे अच्छा लगता है जब खिलाड़ी मैदान में आते हैं, राष्ट्रगीत की धुन बजती है लेकिन जैसे ही मैच शुरू होता है, मैं टीवी बंद कर देती हूं. फ़ुटबॉल मुझे ज़रा भी पसंद नहीं है.”

एलिज़ा ने आख़िरी बार वर्ष 1970 में विश्वकप के मुक़ाबले देखे थे और इसके बाद उनकी दिलचस्पी जाती रही. उन्हें लगता है कि यह खेल अब धन-दौलत तक सीमित होकर रह गया है.

वे कहती हैं, ”इस विश्वकप में ब्राज़ील के पहले दो मैचों के दौरान मैंने अपने कुत्ते को टहलाना पसंद किया. विश्वकप के शोर-शराबे से कुत्ते भी तनाव में आ जाते हैं.”

एलिज़ा ने इससे पहले के विश्वकप आयोजनों के दौरान अपने अनुभवों के आधार पर एक लघुकथा भी लिखी है.

लिज़ा गेलवाओ

साओ जोस डोस कैम्पोस में रहने वाली लिज़ा कहती हैं, ”ब्राज़ील के पिछले मैच में जब मेरा पूरा परिवार मुक़ाबले का आनंद उठा रहा था, मैं केक बनाने में व्यस्त थी और मुझे इसमें मज़ा आया.”

लिज़ा कहती हैं कि उन्हें अपने सात साल के बेटे को समझाना पड़ा कि क्यों वह ब्राज़ील की टीम को सपोर्ट नहीं करती हैं.

वे इसकी वजह बताती हैं, ”पहली वजह तो राजनीतिक है. मुझे पूरा भरोसा है कि यदि ब्राज़ील विश्वकप जीत जाता है तो सत्तारूढ़ पीटी पार्टी इसका राजनीतिक फ़ायदा उठाएगी. इस साल चुनाव जो होने हैं.”

लिज़ा को यह बात भी अच्छी नहीं लगती है कि ब्राज़ील में फ़ुटबॉल और अन्य खेलों के बीच फ़ासला बहुत अधिक है. उनका मानना है कि देश में कई प्रतिभावान खिलाड़ी हैं लेकिन उन्हें किसी तरह की मदद नहीं मिलती है.

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