हिंदी से कौन और क्यों डरता है?

Updated at : 21 Jun 2014 1:51 PM (IST)
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हिंदी से कौन और क्यों डरता है?

प्रियदर्शन वरिष्ठ पत्रकार अगर राजभाषा विभाग को यह अंदाज़ा होता कि सोशल साइट्स पर अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी के भी इस्तेमाल की सलाह देने वाली उसकी एक चिट्ठी इस क़दर गुल खुलाएगी तो शायद यह चिट्ठी चलती ही नहीं. सच तो यह है कि सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करने का ख़याल या निर्देश […]

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अगर राजभाषा विभाग को यह अंदाज़ा होता कि सोशल साइट्स पर अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी के भी इस्तेमाल की सलाह देने वाली उसकी एक चिट्ठी इस क़दर गुल खुलाएगी तो शायद यह चिट्ठी चलती ही नहीं.

सच तो यह है कि सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करने का ख़याल या निर्देश भारत सरकार के मंत्रियों-अफ़सरों के लिए एक सरकारी औपचारिकता भर है, भाषा के प्रति लगाव या किसी वैज्ञानिक नज़रिए का नतीजा नहीं.

जहां तक इस चिट्ठी का सवाल है, वह भी पहली बार मार्च 2014 में चली- यानी यूपीए सरकार के समय, और फिर 27 मई को ऐसे समय दोबारा प्रकट हुई, जब तुरंत-तुरंत गृह मंत्री बनाए गए राजनाथ सिंह ने कम से कम हिंदी को लागू करने के बारे में नहीं सोचा होगा.

बहरहाल, असली सवाल यह है कि एक छोटे से महकमे से चली इस चिट्ठी से या इसकी मार्फ़त दिखने वाली हिंदी की वकालत से अंग्रेज़ी या दूसरी भारतीय भाषाओं के राजनीतिक नेतृत्व के पांव क्यों कांपने लगे? आख़िर जयललिता और करुणानिधि को तमिल अस्मिता और उमर अब्दुल्ला और अखिलेश यादव को उर्दू की इज़्ज़त का ख़्याल क्यों सताने लगा? क्या वाकई आज की तारीख़ में हिंदी भारत की ऐसी विशेषाधिकार संपन्न भाषा है जो बाकी भाषाओं के हित या उनका हिस्सा मार सके?

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इस सवाल पर ठीक से विचार करें तो पाते हैं कि दरअसल भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच झगड़ा खड़ा करने का काम अंग्रेज़ी कर रही है. जिस सर्कुलर को हिंदी के अख़बारों और टीवी चैनलों ने कुछ उपेक्षा के साथ देखा, उसे अंग्रेज़ी अख़बारों और चैनलों ने भरपूर जगह दी. कुछ ने इस तरह पेश किया जैसे हिंदी का इस्तेमाल करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दूसरे हिंदी प्रेमी मंत्रियों ने हिंदी को बढ़ावा देने के एजेंडे के तौर पर यह काम किया है.

हिंदी का वर्चस्व

उन्होंने यह भी ठीक से नहीं बताया कि दरअसल केंद्र सरकार का यह सर्कुलर बस केंद्रीय महकमों और उन राज्यों तक सीमित है जहां हिंदी बोली जाती है, उनका बाकी राज्यों के कामकाज से वास्ता नहीं है. इसी का नतीजा था कि दक्षिण भारतीय राज्यों को अचानक हिंदी के वर्चस्व का डर सताने लगा और वे फिर अंग्रेज़ी की छतरी लेकर खड़े हो गए.

सवाल है, अंग्रेज़ी यह खेल क्यों करती है? क्योंकि असल में अंग्रेज़ी इस देश में शोषण और विशेषाधिकार की भाषा है. इस देश की एक फ़ीसदी आबादी भी अंग्रेज़ी को अपनी मातृभाषा या मुख्य भाषा नहीं मानती, लेकिन देश के सारे साधनों-संसाधनों पर जैसे अंग्रेज़ी का कब्ज़ा है.

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अंग्रेज़ी की इस हैसियत के आगे हिंदी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाएं दोयम दर्जे की साबित होती हैं. इस लिहाज से देखें तो हिंदी नहीं, अंग्रेज़ी भारतीय भाषाओं की असली दुश्मन है. रोटी और रोजगार के सारे अवसर अंग्रेज़ी को सुलभ हैं, सरकारी और आर्थिक तंत्र अंग्रेज़ी के बूते चलता है, पढ़ाई-लिखाई का माध्यम अंग्रेज़ी हुई जा रही है.

बहुत सारे हिंदीवालों को यह गुमान है कि हिंदी अब इंटरनेट में पसर गई है, कई देशों में पढ़ाई जाती है, टीवी चैनलों और अख़बारों में नज़र आती है और अब तो इसमें हॉलीवुड की बड़ी-बड़ी फ़िल्में भी डब करके दिखाई जाती हैं. इससे उन्हें लगता है कि हिंदी का संसार फैल रहा है.

शायद दूसरी भाषाओं को भी यही लगता हो. लेकिन सच्चाई यह है कि यह हिंदी बस एक बोली की तरह बची हुई है जिसका बाज़ार इस्तेमाल करता है. तीन-चार दशक पहले बच्चे घर पर मगही, भोजपुरी, मैथिली या राजस्थानी बोलते थे, स्कूल में हिंदी. आज बच्चे घर पर हिंदी बोलते हैं स्कूल में अंग्रेज़ी.

ज्ञान-विज्ञान की भाषा के तौर पर हिंदी लगातार कमज़ोर होती जा रही है. कहने की ज़रूरत नहीं कि यही स्थिति उर्दू, तमिल या तेलुगू की है. इन भाषाओं के लेखक-पत्रकार या तो सरकारी मदद पर चलते हैं या अंग्रेज़ी संस्थानों से निकलने वाले भाषाई अख़बारों या चैनलों में काम करते हैं.

प्रतिक्रियावादी डर

सवाल है, इस स्थिति का सामना कैसे किया जाए? यह लोकप्रिय तर्क है कि अंग्रेज़ी हमें दुनिया से भी जोड़ रही है, बाज़ार से भी, प्रौद्योगिकी से भी और उच्च शिक्षा से भी. ऐसे में हिंदी या भारतीय भाषाओं की बात करना पिछड़ेपन की बात करना है- आइआइएम और आइआइटी की चकाचौंध भरी दुनिया के मुक़ाबले किसी देहाती संसार की कल्पना करना है.

लेकिन एक दूसरी हक़ीक़त और भी है. अंग्रेज़ी ने भारत को दो हिस्सों में बांट डाला है. एक खाता-पीता, इक्कीसवीं सदी के साथ क़दम बढाता 30-35 करोड़ का भारत है जो अंग्रेज़ी जानता है या जानना चाहता है और भारत पर राज करता है या राज करना चाहता है.

दूसरी तरफ 80 करोड़ का वह गंदा-बजबजाता भारत है जो हिंदी, तमिल, तेलुगू या कन्नड़ बोलता है, 18वीं सदी के अभाव में जीता है और बाकी भारत का उपनिवेश बना हुआ है. वह गांवों से भाग कर शहर आता है, महानगरों के सबसे ज़रूरी काम सबसे सस्ते दाम पर निबटाता है और सबसे कम साधनों में जीता है. इस लिहाज से देखें तो इस ग़रीब भारत की संपर्क भाषा हिंदी ही है, अंग्रेज़ी भले अमीर भारत की संपर्क भाषा हो.

मुश्किल यह है कि भाषा जैसे संवेदनशील मसले पर हमारी राजनीति की कोई दृष्टि ही नहीं है. कभी जनसंघ हिंदी-हिंदू हिंदुस्तान का नारा दिया करता था जो आज की खाती-पीती बीजेपी के कुछ नेताओं के अवचेतन में बसा है. लेकिन उनकी कल्पना संस्कृत जैसी एक ऐसी हिंदी को स्थापित करने की है जो उनके प्रभुत्व को एक जातिगत स्मृति देती हो. अन्यथा उसके तीन-तीन कैबिनेट मंत्री संस्कृत में शपथ लेते दिखाई नहीं पड़ते.

भाषा के मसले पर कभी राम मनोहर लोहिया ने भरपूर विचार किया था. उनका मानना था कि बात सिर्फ हिंदी की नहीं सभी भारतीय भाषाओं की होनी चाहिए और इनके बीच अंग्रेज़ी को एजेंट का काम करना छोड़ देना चाहिए. यही नहीं, जब तक ये भाषाएं सरकारी कामकाज और रोज़गार की भाषाएं नहीं बनाई जातीं, इनकी कोई पूछ नहीं रहेगी. लेकिन हमारा पूरा शासन-प्रशासन तंत्र अंग्रेज़ी में ही चलता है और एक छोटे से समुदाय की हसरतों के हिसाब से चलता है.

इसी समुदाय को हिंदी के खड़े होने में एक प्रतिक्रियावादी डर दिखाई पड़ता है और वह एक मामूली से सर्कुलर को बोतल में बंद जिन्न की तरह देखता है जिसे बोतल में ही रहना चाहिए.

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