अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज

प्रभात कुमार लेखक अरावली पर्वतावलियों की तलहटी में सन् 1113 के आसपास बसना शुरू हुआ अजमेर. हम वहां गरीब नवाज से मिलने गये थे. हम जिस होटल में रुके थे, वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती यानी गरीब नवाज की मजार के पास में ही था. रिसेप्शन पर बताया गया- आप के साथ खादिम (सेवक) भेजेंगे. आप […]
प्रभात कुमार
लेखक
अरावली पर्वतावलियों की तलहटी में सन् 1113 के आसपास बसना शुरू हुआ अजमेर. हम वहां गरीब नवाज से मिलने गये थे. हम जिस होटल में रुके थे, वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती यानी गरीब नवाज की मजार के पास में ही था. रिसेप्शन पर बताया गया- आप के साथ खादिम (सेवक) भेजेंगे. आप कैमरा नहीं ले जा सकते. खादिम हमारे साथ जा रहे थे. बाजार तंग, सामान बाहर तक रखे हुए थे. हम गरीब नवाज की गलियों में घूम रहे थे.
यहां की खास मिठाई सोहन हलवा कई स्वादों में है. लोबान और उसकी अगरबती कई खुशबुओं में मिलती है. वहां की हर छोटी-बड़ी बात को खादिम बताते रहे. प्रसिद्ध धर्मस्थल की तरह श्रद्धालुओं की कतार लगी हुई थी.
दुकानों पर गुलाब व चमेली के लाखों फूल सजे थे. हमने कहा और टोकरी में गुलाब व चादर हाजिर हो गयी. बेटे व दामाद ने अपने सिर पर सजाया और मजार की ओर बढ़ गये. दुकान वाले का बंदा साथ में चलता है, जो मोबाइल और कैमरे से बेहतर भूमिका निभाता है. छोटी राजस्थानी रंगीन पगड़ियां खूब दिखीं. मजार से आ चुके श्रद्धालु वहीं फर्श पर बैठे थे और जानेवाले उत्सुक थे. दायीं तरफ नमाज अदा की जा रही थी. इतर व गुलाब की सुगंध ने वातावरण को महका रखा था. आयतें लिखी पीतल की कटोरियां यहां बहुत महंगी मिलती हैं.
सफेद संगमरमर की गुंबद के नीचे मजार के पास हम पहुंच गये. अलौकिक कहिये, अनूठी, विरल भावना दिल में उमड़ रही थी. चांदी की एेतिहासिक, कलात्मक चारदिवारी के बीच गुलाब की पंखुड़ियों में गरीब नवाज हैं. हमने आदर से चादर पेश किये, हमारी अर्पित गुलाब की पंखुड़ियां वहां बिछी तमाम पंखुड़ियों का हिस्सा हो गयीं. उस अद्भुत जगह की सौम्य दिव्यता, रोम-रोम में तन्मयता से लिपटी सिहरन उगा देती है. संतुष्टि ने दिल में घर कर लिया और मुकद्दर की मरम्म्त हो गयी. हमने सिर झुकाकर शुक्रिया अदा किया और मन्नतें मांगी.
चांदी पर उत्कृष्ट कारीगरी के साथ यहां दीवारों पर खुशनुमा रंगों में आकर्षक चित्रकारी भी लाजवाब है. मुगलिया वास्तुशैली में निर्मित विशाल प्रांगण में कव्वाली होती रहती है.
वह जियारत हमें अमीर खुसरो की याद दिला रही थी. चिश्ती दरगाहों में प्रमुख इस दरगाह में हिंदू, मुस्लिम व सिख कलाकार पूरे अदब के साथ सज्दा करते हैं. शहनाई, तबला, हारमोनियम व ढोलक सुर में बंधकर पंचमस्वर में गाये जा रहे कलाम का साथ देकर भक्ति रस का माहौल रच रहे थे. गायक व साथी फर्श पर बैठकर हारमोनियम पर उंगलियां चलाते स्वर साधते हैं और ढोलकी चंद लम्हों में ही समां बांध देती है. यहां पेश हो रहे कलाम गरीब नवाज की बड़ाई और खुदाई मस्ती से माहौल को लबरेज कर देते हैं. यहां जो लोग भी पवित्र श्रद्धा और साफ दिल से दुआएं करते हैं, मुझे यकीन है उनकी मुरादें जरूर पूरी होती होंगी.
कव्वाली गायी जा रही थी- ‘मची है धूम आलम में तुम्हारे आने की, बना करती हैं यहां तकदीरें जमाने की.’ उसके बाद फिर- ‘शहर-ए-अजमेर पर रहमत की घटा छायी है.’ हजरत अमीर खुसरो की मशहूर रचना ‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलइके…’ सुनने के बाद तो होंठ बार-बार इसे गुनगुनाते हैं और मन बार-बार सुनता रहता है.
इनसान की खिदमत को अपनी मंजिल माननेवाले सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दुनिया के शांतिदूत हैं. अजमेर में कभी ऑफ सीजन नहीं होता. दुनियाभर से गरीब-अमीर, छोटे-बड़े और धन कुबेर सब ‘गरीब’ बनकर पहुंचते हैं. अपनी शांति, समृद्धि व खुशी के लिए दुआएं मांगते हैं. मुगलों के समय से स्थित एेतिहासिक विशाल आकार की दो देगों (विशाल बर्तन) में चावल, घी, मेवे, केसर डालकर खीर का नियाज (प्रसाद) बनता है, जिसे हजारों-लाखों श्रद्धालु ग्रहण करते हैं.
लेकिन, गंदी नालियों से उगती दुर्गंध बताती है कि हम विख्यात धार्मिक जगहों की सफाई व रखरखाव के बारे में कितने जागरूक हैं. काश गरीब नवाज से प्रेरणा लेकर हम मानवता के लिए ही ये काम करते. हर धार्मिक स्थल की तरह, नकद दान लेकर पुण्य दिलानेवाले बंदे यहां भी हैं. पानी की मशक के लिए, साल में दो बार जन्नती दरवाजे के सामने या गरीब नवाज की बीवी की मजार पर, हर जग बंदे मौजूद हैं.
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