सेंसर बोर्ड को किस 'किस' से परहेज़ किस 'किस' से प्यार?

Updated at : 18 Jun 2014 10:58 AM (IST)
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सेंसर बोर्ड को किस 'किस' से परहेज़ किस 'किस' से प्यार?

वैभव दीवान बीबीसी संवाददाता ज़ीनत अमान की महीन साड़ी से लेकर अलिया भट्ट की ज़ोरदार ‘किस’ तक, भारतीय सिनेमा वाकई एक लंबा सफ़र तय कर चुका है. जहां एक दौर में दो फूलों के मिलन का मतलब रोमांस होता था वहीँ आज सिनेमा में होठों से होठों का मिलना आम बात है. भारतीय सिनेमा के […]

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ज़ीनत अमान की महीन साड़ी से लेकर अलिया भट्ट की ज़ोरदार ‘किस’ तक, भारतीय सिनेमा वाकई एक लंबा सफ़र तय कर चुका है.

जहां एक दौर में दो फूलों के मिलन का मतलब रोमांस होता था वहीँ आज सिनेमा में होठों से होठों का मिलना आम बात है.

भारतीय सिनेमा के इस चमत्कारी आधुनिकरण का श्रेय जाता है नई सोच वाले फ़िल्मकारों को और साथ ही फ़िल्मो की सुरक्षा कर रहे सेंसर बोर्ड को.

पर कभी-कभी ये सेंसर बोर्ड ऑफ़िस के बॉस, स्कूल के हेडमास्टर या कहें तो घर में बीवी के जैसे फ़िल्मकारों पर रोब डालने लगता है. सेंसर बोर्ड नई सोच को ढील तो देता है पर उसकी डोर अपने हाथो में ही रखता है.

इसी बात का ताज़ा उदाहरण है आने वाली दो फ़िल्में. करण जोहर द्वारा निर्मित ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ और टी-सीरीज़ द्वारा निर्मित ‘हेट स्टोरी 2’.

दोनों ही फ़िल्में अपने ट्रेलर की वजह से चर्चा में हैं. जहां एक ओर इन दोनों फ़िल्मों के ट्रेलर ने दर्शकों के ज़ेहन में उत्सुकता पैदा की है वहीँ दूसरी ओर सेंसर बोर्ड को नाराज़ भी किया है.

फ़िल्म के ट्रेलर के रिलीज़ होते ही सेंसर बोर्ड ने इन दोनों ट्रेलरों में से इनमें फ़िल्माई गई ‘किस’ यानि चुम्बन के सीन को काटने के लिए कहा. सेंसर बोर्ड के आदेश के मुताबिक फ़िल्म निर्माताओ को साफ़ सुथरा बिना किसी चुम्बन का एक नया ट्रेलर देने को कहा गया. और इसी किस्से से शुरु हुआ ये विवाद, कि क्या भारतीय सेंसर बोर्ड को ‘किस’ से परहेज़ है? क्या सोच है केसर बोर्ड की? और क्यों इतना गंभीर है ये सेंसर बोर्ड?

सेंसर के कारण अपनी फ़िल्म के सीन को काटने वाले ‘हेट स्टोरी 2’ के निर्देशक विशाल पंड्या मानते हैं कि ‘सेंसर नहीं बल्कि सेक्स हमारे देश में एक सेकंड हैण्ड नागरिक की तरह है. हमारे यहां आर्ट में अगर सेक्स हो तो उसे सबसे पहले टारगेट किया जाता है.’

इस फ़िल्म में 1988 की फ़िल्म दयावान के सुपरहिट गाने ‘आज फिर तुमपे प्यार आया है’ को नए रूप में पेश किया गया है.

88 में भी इस फ़िल्म के गाने में रोमांस ने सभी हदे पार की थीं (विनोद खन्ना और माधुरी दीक्षित) और अब 2014 में तो इस गीत के लिए फ़िल्माया गया विडियो अपने पिछले विडियो से 10 कदम आगे है.

फ़िल्म ‘हेट स्टोरी 2’ के निर्माता विनोद भानुशाली कहते हैं कि ‘गाने के बोल ही ऐसे हैं तो हम कैसे बिना रोमांस का विडियो बनायेंगे? सेंसर को हमारे इस विडियो पर इसीलिए आपत्ति हुई है क्योंकि ये प्रोमो का हिस्सा है जो थिएटर और टीवी पर चलेगा.

वो आगे कहते हैं, ‘पब्लिक में ऐसे बोल्ड और कामुक लगने वाले गीत सेंसर पास नहीं करता और इसीलिए हमने इसी गाने के दो विकल्प दिए हैं, एक टीवी पर जिसमें सीन कटा होगा और एक यूट्यूब के लिए जिसमें सब वैसा ही है जैसा गाने और फ़िल्म की डिमांड है’.

चौकीदार है सेंसर बोर्ड

एक जगह तो सेंसर बोर्ड काफ़ी मॉडर्न होता दिखता है दूसरी ओर फ़िल्मकारों की कल्पनाओं और उनकी सोच पर कैंची चला देता है.

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कई फ़िल्में होती हैं जो सेंसर बोर्ड बिना कुछ कहे पास कर देता है और कई ऐसी भी होती हैं जिनमें फ़िल्मकारों को सेंसर बोर्ड से जूझना पड़ता है अपनी फ़िल्मों के लिए अपील करनी पड़ती है.

फ़िल्म लेखक और सेंसर बोर्ड के मेम्बर रहे अंजुम राजबली कहतें हैं कि ‘सेंसर बोर्ड के पास दिशा-निर्देश हैं पर वो काफ़ी विस्तार में हैं, जो ज़रूरी है. फलस्वरूप इसकी वजह से फ़िल्मकार और सेंसर के बीच विवाद होता है. सबके फ़िल्म देखने का नज़रिया अलग है.’

उन्होंने कहा, ‘अब सेंसर बोर्ड का एक नया उसूल है, अगर आपको शंका है तो फ़िल्म को क्लियर कर दो. पहले सेंसर बोर्ड डरता था पर अब मॉडर्न और सकारात्मक फ़ैसले लेता है.’

पर कैसे आंके मार-धाड़, या रोमांस को – क्योकि इनका कोई मापदंड तो नहीं है. अंजुम कहते हैं, ‘मैं पिछले तीन साल से चाह रहा हूं कि एक सामान नियम और कायदे हों. सेंसर बोर्ड एक चौकीदार है सिनेमा और समाज के बीच. उसे सबके हित और सामान्यदृष्टि से फ़िल्मों को आंकना होगा.’

सेंसर बोर्ड पर क्या है नई सरकार दबाव

सेंसर बोर्ड के एकदम से दो फ़िल्मों के ट्रेलर को कटवाने की वजह से मीडिया में ये बात भी सामने आई कि नई सरकार के कारण सेंसर बोर्ड अब अपने फ़ैसले काफ़ी सोच समझ के ले रहा है.

बीजेपी को हिन्दू नेशनलिस्ट पार्टी के रूप में जाना जाता है जो हिंदुत्व के करीब और पाश्चात्य संस्कृति से फ़ासला बनाए रखने में विश्वास रखती है. शायद फ़िल्मों में आए इन बदलावों को वो झेल ना पायें.

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फ़िल्मकार महेश भट्ट ने बीजेपी और सेंसर के साथ अपने रिश्तों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी को बताया, ‘1998 में आई उनकी फ़िल्म ‘ज़ख्म’ को सियासी तौर पर काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था. इस फ़िल्म को पास करने के लिए भट्ट को सेंसर ही नहीं बल्कि उस समय होम मिनिस्ट्री (एनडीए सरकार) से भी आज्ञा लेनी पड़ी.’

फ़िल्म की कहानी बाबरी मस्जिद और उसी के बेकड्राप पर आधारित एक परिवार की कहानी थी.

महेश भट्ट कहते हैं कि ‘इस नई सरकार के आने से फ़िल्मकारों में डर है, उनके अतीत की वजह से. पर वो 1998 था और ये 2014 हैं. सब डिजिटल हो गया है. भारतीय सिनेमा के पास हक़ है अपनी बात रखने का, एक स्वतंत्र सोच इख़्तियार करने का. अगर अब इस सरकार ने फ़िल्मकारों की सोच को ताला लगाने की कोशिश की तो वो भारत के सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वाले इस उद्योग से हाथ धो बैठेंगे’.

भारत में कोई भी फ़िल्म बिना इनके ठप्पे के रिलीज़ नहीं की जा सकती. सेंसर बोर्ड फ़िल्मों को उनकी सूक्ष्मता और उसके मूल विषय को समझते हुए उन्हें अलग अलग प्रमाण देता है. जैसे अगर फ़िल्म में सेक्स और वायलंस है तो फ़िल्म को एडल्ट करार किया जाता है और अगर फ़िल्म पारिवारिक है तो ‘यू’ यूनिवर्सल और अगर फ़िल्मों में थोड़ा थोड़ा सब कुछ हो तो उसे ‘यू.ए’ यानी यूनिवर्सल एडल्ट करार किया जाता है.

पर ये सर्टिफिकेट किस तर्ज और किन नियमो से दिए जाते हैं उसकी गुत्थी अभी भी उलझी है.

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