कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाले बीजों का करें इस्तेमाल

Updated at : 12 Jun 2014 2:02 PM (IST)
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कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाले बीजों का करें इस्तेमाल

डॉ डीएन सिंह रांची के कांके स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में मुख्य वैज्ञानिक सह प्रमुख धान प्रजनक (प्रिंसिपल राइस ब्रिडर) हैं. धान की खेती पर उनका गहरा अध्ययन है. वे इसकी खेती की चुनौतियों व आवश्यकताओं की गहरी जानकारी रखते हैं. उनके सुझाव किसानों के साथ-साथ कृषि विभाग के लिए भी मददगार होते हैं. धान […]

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डॉ डीएन सिंह रांची के कांके स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में मुख्य वैज्ञानिक सह प्रमुख धान प्रजनक (प्रिंसिपल राइस ब्रिडर) हैं. धान की खेती पर उनका गहरा अध्ययन है. वे इसकी खेती की चुनौतियों व आवश्यकताओं की गहरी जानकारी रखते हैं. उनके सुझाव किसानों के साथ-साथ कृषि विभाग के लिए भी मददगार होते हैं. धान की खेती की चुनौतियां, हाइब्रीड बीजों की चुनौती, कीटनाशक व पानी से जुड़े मुद्दों पर उनसे पंचायतनामा के लिए शिकोह अलबदर ने विस्तृत बातचीत की. प्रस्तुत है प्रमुख अंश :

किसानों के सामने धान की खेती को लेकर क्या चुनौतियां हैं. इन चुनौतियां का सामना किसान कैसे करें?
किसानों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं. इनमें मिट्टी, बीज, खाद और कीटनाशक से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं. झारखंड में जिस तरह की भूमि पर खेती की जाती है, वह अम्लीय है. बिहार में मिट्टी क्षारीय है. अम्लीयता और क्षारीयता के कारण जरूरी पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता है. किसानों को जितनी उत्पादकता चाहिए वह नहीं मिल पाती है. जमीन को उर्वरायुक्त रखना किसानों के सामने एक चुनौती है.

पानी की समस्या दूसरी चुनौती है. धान को जितने पानी की जरूरत होती है, वह नहीं मिल पाता है. यहां वर्षा आधारित खेती होती है. राज्य के केवल 12 प्रतिशत क्षेत्र में ही पानी की सुविधा मिल पायी है. किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज नहीं मिल पाता है. इसके साथ खाद और रोग के लिए कीड़ा नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले कीटनाशकों की गुणवत्ता भी किसानों के सामने एक समस्या है. जो भी धान की खेती के लिए उपादान हैं वह एक चुनौती है. इसके अलावा उत्पाद का विपणन की एक समस्या है. भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से जो अनाज लिया जाता है, उसका मिनिमम सपोर्ट प्राइस नहीं मिल पाता है.

साथ ही किसानों को इस विषय में जानकारी भी नहीं होती है. जिससे किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पाता है. इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार को पहल करनी होगी. बाजार में कृषि उपादान यदि संतोषजनक मिले, गुणवत्तापूर्ण मिले तो वृहद स्तर पर उत्पादन हो सकता है. इसके साथ ही मिट्टी के सुधार का कार्यक्रम भी लाना होगा. झारखंड में सिंचाई के लिए वर्षा जल संचय तथा पुनर्चक्रण (रीसाइकिलिंग) को बढ़ावा देना आवश्यक है. साथ ही चेक डैम, तालाब तथा कुआं का निर्माण करना होगा. इन सभी चुनौतियों का समाधान होना जरूरी है. राज्य सरकार के माध्यम से धान के बीज उपलब्ध कराया जाता है. इन बीजों को समय पर उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाना जरूरी है. बीजों को किसानों तक मई के महीने तक पहुंच जाना चाहिए. साथ ही गुणवत्तापूर्ण उर्वरक तथा कीटनाशक आदि भी प्रखंड तथा पंचायत स्तर पर उपलब्ध समय से कराना जरूरी है.

परंपरागत बीजों को खत्म कर क्यों हाइब्रिड बीज का ही इस्तेमाल अधिक हो रहा है?
नहीं ऐसी बात नहीं है, परंपरागत बीजों को खत्म नहीं किया जा रहा है. किसान बड़े पैमाने पर परंपरागत बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं. परंपरागत बीजों को नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्स तथा प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटी एंड फारमर्स राइट ऑथोरिटी के माध्यम से संरक्षित किया जा रहा है. रहा सवाल हाइब्रिड बीजों के इस्तेमाल का तो खेती योग्य भूमि में कमी और जनसंख्या वृद्धि के कारण यह जरूरी है. वर्ष 2001 में झारखंड की जनसंख्या दो करोड़ उनहत्तर लाख थी, जो वर्ष 2011 में बढ़ गयी. इतनी बड़ी आबादी को 54 लाख टन खाद्यान्न की जरूरत है. इस मात्र में खाद्यान्न हाइब्रिड बीजों के बिना संभव नहीं है. इन बीजों में उत्पादन क्षमता अधिक होती है. खाद्यान्न मामले में आत्मनिर्भर होने के लिए यह अति आवश्यक है. राज्य में धान की खेती के लिए हाइब्रिड बीजों का 18 से 20 प्रतिशत ही उपयोग होता है.

कम पानी में धान की बेहतर पैदावार करने के विषय में राय दें?
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय तथा धान से जुड़े अन्य शोध संस्थानों में धान की ऐसी प्रजातियों को विकसित किया गया है, जो कम पानी में भी अच्छी उपज देते हैं. 2011 में सहभागी धान, 2014 में आइआर 64 ड्राउट 1 प्रजाति को विकसित किया गया, जिनकी खेती ज्यादा पानी वाले धान बीज की अपेक्षा कम पानी में होता है. इस दिशा में राज्य तथा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध किये जा रहे हैं, जिसमें कम पानी में भी अच्छी धान की खेती की जा सके.

धान की खेती में कीटनाशकों और उर्वरक के संतुलित उपयोग किसान कैसे करें? आप अपनी सलाह दें.
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा धान के अधिकतम उत्पादन लेने के लिए पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश) आदि के लिए उर्वरक के इस्तेमाल की अनुशंसा की गयी है, जिसका उपयोग कर किसान उत्पादन बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा धान में लगने वाले कीड़ों तथा रोगों के लिए भी रसायन के नाम तथा उसकी मात्र की सलाह भी समय-समय पर वैज्ञानिकों द्वारा दी जाती है. इसका प्रयोग कर किसान रोगों का नियंत्रण कर सकते हैं.

धान के बीज में किसानों को क्या सतर्कता बरतनी चाहिए?
किसान अपनी खेती के लायक जमीन के अनुसार बीज का चयन कर सकते हैं. किसानों को जमीन के वर्गीकरण के आधार पर जैसे दोन 3, दोन 2 तथा दोन 1 के हिसाब से बीजों का चयन करना चाहिए. टांड जमीन के लिए बिरसा धान 108, बिरसा विकास धान 109, 110, 111 वंदना का उपयोग करने की अनुशंसा की गयी है. दोन 3 के लिए अंजलि, सहगामी, दोन 2 के लिए आइआर 64, नवीन, बिरसा विकास सुगंध, बिरसा विकास धान 203, बिरसा अभिषेक तथा सबसे निचली जमीन यानी दोन 1 के लिए एमटीयू 7029, बीटी 5204 तथा आइएनटी 5656 आदि का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. किसान बीज जब भी लें तो बिरसा कृषि विश्वविद्यालय या क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय बीज निगम तथा कृषि अनुसंधान केंद्र से लें.

धान के प्रमुख रोग कौन-कौन से हैं. इसके निदान के लिए क्या करें?
बलास्ट, चुरसा, ब्राउन, ब्राउन स्माट, फॉल्स स्माट आदि मुख्य प्रकार के धान के रोग हैं. बलास्ट और ब्राउन स्पॉट के नियंत्रण के लिए सैफ रसायन का प्रयोग कर सकते हैं. फॉल्स स्माट के लिए टिल्ट का इस्तेमाल करना चाहिए. इन रसायन के इस्तेमाल अनुशंसित तरीके से किया जाना चाहिए.

धान की बेहतर खेती के लिए वर्तमान में क्या नये प्रयोग हो रहे हैं. बिरसा विश्वविद्यालय में किस तरह के नये प्रयोग हुए हैं?
एयरोबिक राइस कल्टीवेशन, डायरेक्ट सीडेड राइस, श्रीविधि तकनीक, क्लटीवेशन ऑफ एरोमेटिक ऑफ नॉन सिलेंडर एरोमेटिक वेराइटी तकनीक से धान की खेती की जा रही है. पैकेज प्रणाली को भी विकसित किया गया है. बिरसा विश्वविद्यालय के धान अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित किये गये हैं. इनके प्रसार की आवश्यकता है.

श्रीविधि तकनीक से चावल उत्पादन में कितनी प्रतिशत की वृद्धि हुई है. किसान किस दूसरी विधि का धान की खेती के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं?
चावल उत्पादन के लिए श्रीविधि तकनीक सबसे उत्कृष्ट तकनीक के रूप में सामने आयी है. इस तकनीक के इस्तेमाल में लगातार वृद्धि हो रही है. किसान यदि इस तकनीक का इस्तेमाल कर लें तो वह इस तकनीक को नहीं छोड़ते हैं. धान के मामले में चूंकि राज्य आत्मनिर्भर है, इस आत्मनिर्भरता का कारण श्रीविधि तकनीक ही है. इसके साथ किसान परंपरागत तरीके से भी धान की खेती कर रहे हैं. उनकी पैदावार में बढ़ोतरी हुई है.

डॉ डीएन सिंह

मुख्य वैज्ञानिक (धान), बीएयू, रांची

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