ब्रह्मांड के रहस्य जानने के मिशन

Updated at : 12 Jun 2014 5:47 AM (IST)
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ब्रह्मांड के रहस्य जानने के मिशन

-ब्रह्मानंद मिश्र अंतरिक्ष रहस्यों से भरा है. किस्से, कहानियों में एलियन और उड़नतश्तरियों का जिक्र होता है. दुनियाभर की अंतरिक्ष एजेंसियां अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने-समझने के लिए अंतरिक्षयान एवं अन्य वैज्ञानिक उपकरण विकसित कर रही हैं. अंतरिक्ष वैज्ञानिक अलग-अलग ग्रहों पर न केवल जीवन की संभावनाओं को तलाश रहे हैं, बल्कि वहां के वातावरण […]

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-ब्रह्मानंद मिश्र

अंतरिक्ष रहस्यों से भरा है. किस्से, कहानियों में एलियन और उड़नतश्तरियों का जिक्र होता है. दुनियाभर की अंतरिक्ष एजेंसियां अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने-समझने के लिए अंतरिक्षयान एवं अन्य वैज्ञानिक उपकरण विकसित कर रही हैं. अंतरिक्ष वैज्ञानिक अलग-अलग ग्रहों पर न केवल जीवन की संभावनाओं को तलाश रहे हैं, बल्कि वहां के वातावरण के अध्ययन के जरिये अंतरिक्ष की संरचना को भी बेहतर तरीके से समझने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि धरती पर मानवता को अधिक-से-अधिक लाभ पहुंचाया जा सके. विभिन्न देशों के कुछ खास अंतरिक्षयान एवं अंतरिक्ष अभियानों पर नजर डाल रहा है आज का नॉलेज.

ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने के लिए मानव सदियों से निरंतर प्रयासरत है. इस कड़ी में पहली तकनीकी कामयाबी चार अक्तूबर, 1957 को मिली, जब पहले अंतरिक्षयान ‘स्पुतनिक’ को सफलतापूर्वक लांच किया गया था. इसके बाद शुरू हुआ अंतरिक्षयान भेजने का सिलसिला आज भी दुनियाभर में जारी है. कई देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने सौर मंडल और ग्रहों की स्थिति के विस्तृत अध्ययन के लिए दर्जनों अंतरिक्ष यान भेजे हैं. इनमें से कुछ अभियान फेल हो गये, तो कुछ अंतरिक्ष विज्ञान के लिए मील का पत्थर साबित हुए हैं. कुछ अंतरिक्षयान वर्षो से महत्वपूर्ण आंकड़े इकट्ठा कर धरती पर भेज रहे हैं, तो कुछ अभी अपने रास्ते में हैं और पूरी दुनिया के लिए जिज्ञासा का विषय बने हुए हैं.

मैसेंजर अंतरिक्षयान (बुध ग्रह)

सौर मंडल के सबसे छोटे और सूर्य के सबसे निकट ग्रह बुध की कक्षा में पहुंचनेवाला ‘मैसेंजर’ विशिष्ट अंतरिक्षयान है. इसके बुध की कक्षा में स्थापित होने के बाद अगस्त, 2011 से बुध ग्रह की सतह, थलीय-रसायन और परिवेश आदि से जुड़ी कई जानकारियां हासिल हुई हैं. 507.9 किलोग्राम द्रव्यमान के इस अंतरिक्षयान को बुध की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित करने में नासा को 18 मार्च, 2011 को कामयाबी मिली. सौर मंडल के सबसे छोटे ग्रह की कक्षा में पहुंचने के बाद मैसेंजर ने तस्वीरों और आंकड़ों को भेजना शुरू किया. बुध की कक्षा में स्थापित होने से पहले अंतरिक्षयान को 7.9 बिलियन किलोमीटर की यात्र करनी पड़ी और प्रतिस्थापित होने से पहले सूर्य के 15 चक्कर लगाने पड़े. इस अंतरिक्षयान को बुध ग्रह से जुड़ी तमाम जानकारियों को इकट्ठा करने के लिए मरकरी डय़ुल इमेजिंग सिस्टम, गामा-रे और न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर, एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर, मैग्नेटोमीटर, मरकरी लेजर अल्टीमीटर, मरकरी एटमॉस्फेरिक एंड सरफेस कंपोजिशन स्पेक्ट्रोमीटर और इनज्रेटिक पार्टिकल एंड प्लाज्मा स्पेक्ट्रोमीटर जैसे उपकरणों से लैस किया गया था.

मैसेंजर बुध ग्रह पर भेजा जानेवाला दूसरा अंतरिक्षयान था. इससे पहले ‘मॉरिनर-10’ ने 1975 में अपने अभियान को पूरा किया था.

अकासुकी अंतरिक्षयान (शुक्र ग्रह)

जापान द्वारा भेजे गये अकासुकी अंतरिक्षयान को शुक्र ग्रह की कक्षा में स्थापित कर पाने में 2010 में कामयाबी नहीं मिली थी, लेकिन उम्मीद जतायी जा रही है कि इस अंतरिक्षयान को वर्ष 2015 तक शुक्र की कक्षा में प्रतिस्थापित कर दिया जायेगा. धरती से 25 मिलियन मील की दूरी पर स्थित शुक्र ग्रह को धरती का ‘सिस्टर प्लेनेट’ भी कहा जाता है. शुक्र ग्रह के ऊपरी परिमंडल के अध्ययन के लिए जापानी स्पेस एजेंसी (जेएएक्सए) द्वारा अकासुकी को डिजाइन किया गया था. इसके जरिये शुक्र के परिमंडल के तापमान और ज्वालामुखी आदि के बारे में जानकारियां इकट्ठा की जायेंगी. इसको अल्ट्रावायलेट इमेजर, लॉन्ग वेव इन्फ्रेड कैमरा, 1-एमएम कैमरा, 2-एमएम कैमरा और रेडियो साइंस जैसे तकनीकी उपकरणों से लैस किया गया है. अकासुकी 20 मई, 2010 को एच-आइआइए रॉके ट द्वारा प्रक्षेपित किया गया था.

वीनस एक्सप्रेस अंतरिक्ष यान

शुक्र ग्रह की कक्षा में यूरोपियन स्पेस एजेंसी (इएसए) द्वारा पहला अंतरिक्षयान भेजा गया था. 2800 पाउंड वजन का यह अंतरिक्षयान सात साल तक शुक्र की कक्षा में परिक्रमा कर चुका है. खासकर शुक्र की सतह पर गुबार के आवरण के अध्ययन के लिए इसे भेजा गया था.

न्यू हॉरिजंस अंतरिक्षयान

न्यू हॉरिजंस प्लूटो-कीपर बेल्ट मिशन जनवरी, 2006 में लांच किया गया. यह अंतरिक्षयान प्लूटो ग्रह की कक्षा में 2015 तक प्रतिस्थापित हो जायेगा. इस अभियान की रूपरेखा सौर मंडल की हिमाच्छादित दुनिया के अध्ययन के लिए तैयार की गयी थी. प्लूटो के अलावा अभियान एक या अधिक कीपर बेल्ट तक पहुंचेगा. प्लूटो के क्षेत्र में गुरुत्वीय प्रभाव के अध्ययन के लिए न्यू हॉरिजंस फरवरी, 2007 में जुपिटर के समीप से गुजरा. इस दौरान कई अहम जानकारियां मिलीं. इसने 200 मील ऊंचे सक्रिय ज्वालामुखी चट्टानों के चित्र भेजे. न्यू हॉरिजंस ग्रहीय तंत्र के बारे में अध्ययन के लिए तैयार किया गया पहला अंतरिक्ष अभियान है. इससे सौरमंडल से जुड़ी कई अहम जानकारियों के मिलने की उम्मीदें हैं. यह वर्ष 2015 में प्लूटो/ कारोन/ निक्स/ हाइड्रा तंत्र के संपर्क में पहुंच जायेगा.

प्लूटो ही क्यों?- हमारा सौरमंडल तीन जोनों में बंटा हुआ है. आंतरिक चट्टानी ग्रह (पृथ्वी, वीनस, मरकरी, मार्स), गैसीय बृहद ग्रह (जुपिटर, सैटर्न, यूरेनस और नेप्चून) और कीपर बेल्ट (हिमाच्छादित बौने ग्रह). प्लूटो बर्फ से ढंका हुआ ग्रह है, जिसे हम तीसरे जोन के अंतर्गत मानते हैं. इन बौने ग्रहों के बारे में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस, यूएसए का मानना है कि बिना इनके अध्ययन के पूरे सौरमंडल का अध्ययन असंभव है. इसीलिए इन्हीं ग्रहों के अध्ययन के लिए न्यू हॉरिजंस मिशन की बुनियाद रखी गयी. इन बौने ग्रहों का शुरुआती विकास नहीं हो सका. इसीलिए आंतरिक सौरमंडल में पूर्णरूप से विकसित ग्रहों और गैसीय ग्रहों की तुलना में ये बहुत ही छोटे हैं. बौने ग्रह पुराने अवशेष के रूप में हैं, इनका निर्माण तकरीबन चार बिलियन वर्ष पूर्व हुआ है.

युग्मीय ग्रह: प्लूटो का सबसे बड़ा चंद्रमा कारोन प्लूटो का लगभग आधा है. दोनों का गुरुत्वीय संतुलन बिंदु मध्य में होने से दोनों मिलकर बाइनरी प्लेनेट (युग्मीय ग्रह) बनाते हैं. न्यू हॉरिजंस युग्मीय पिंड के अध्ययन के लिए तैयार किया गया पहला अंतरिक्ष अभियान है.

सबसे प्रभावी अभियान : पृथ्वी पर धूमकेतुओं के प्रभाव का स्नेत कीपर बेल्ट ही है. माना जाता है कि इन प्रभावों की वजह से ही डायनासोर विलुप्त हो गये. न्यू हॉरिजंस कीपर बेल्ट पर पिंडों, चंद्रमाओं और प्लूटो ग्रह के अध्ययन में मील का पत्थर साबित होगा. प्लूटो और कीपर बेल्ट कार्बनिक अणुओं और हिमों से अच्छादित माना जाता है. प्लूटो का परिमंडल आकाश में धूमकेतुओं के लिए प्रतिरोधी होता है. माना जाता है कि इसी प्रकार से धरती पर मौजूद हाइड्रोजन/हीलियम का वातावरण आकाश में लुप्त हो गया. इसलिए प्लूटो के अध्ययन से पृथ्वी के परिमंडलीय क्षेत्रों के अध्ययन में काफी मदद मिलेगी.

मंगलयान और मॉवेन अंतरिक्षयान (मंगल ग्रह)

मंगल ग्रह दुनियाभर के खगोल वैज्ञानिकों के लिए सबसे अधिक जिज्ञासा का विषय रहा है. इसलिए यहां सबसे ज्यादा अंतरिक्षयान भेजे गये हैं. कई देशों ने मंगल ग्रह की जानकारी जुटाने के लिए दर्जनों अंतरिक्ष अभियानों पर काम किया है, हालांकि अधिकतर में कामयाबी नहीं मिल पायी है. मंगल पर अंतरिक्षयान भेजने की शुरुआत 1960 में सोवियत यूनियन के अभियान के साथ हुई थी. इस समय मंगल की कक्षा में तीन अंतरिक्षयान परिक्रमा कर रहे हैं, जबकि इस वर्ष के अंत तक दो अन्य के इसमें शामिल होने की संभावना है.

भारत द्वारा पांच वर्ष पहले चंद्रयान-1 को लांच किया था. अब ‘मंगलयान’ भारत का पहला अंतर ग्रहीय अंतरिक्षयान है. अनुमानत: मंगल की कक्षा में मंगलयान 24 सितंबर, 2014 तक प्रतिस्थापित हो जायेगा. अगर सफलता मिलती है तो मंगल अभियान में कामयाब होनेवाला भारत पहला एशियाई देश होगा. इससे पहले 2003 में जापान का नोजोमी और 2011 चीन का यिंघुओ-1 मंगल अभियान फेल हो चुका है.

मंगल ग्रह अभियान की रूपरेखा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने तैयार की है. इसरो के मुताबिक इसरो का मार्स ऑर्बिटर मिशन और नासा का मॉवेन (मार्स एटमॉस्फियर एंड वोलाटाइल इवोल्यूशन), दोनों एक-दूसरे के पूरक अभियान है. मॉवेन नासा का दूसरा मंगल अभियान है. यह अभियान मूलत: क्लाइमेटिक चेंज के अध्ययन के लिए डिजाइन किया गया है. मॉवेन में आठ उपकरणों- न्यूट्रल गैस एंड आयन मास स्पेक्ट्रोमीटर, इमेजिंग अल्ट्रावायलेट स्पेक्ट्रोग्राफ, मैग्नेटोमीटर, सोलर वाइंट इलेक्ट्रॉन एनलाइजर, सुपर थर्मल एंड थर्मल आयन कंपोजिशन, लैंग्मायर प्रोब एंड वेब एंटिना, सोलर एनरजेटिक पार्टिकल्स एंड सोलर वाइंड एनलाइजर से सुसज्जित किया गया है.

अन्य मंगल अंतरिक्ष यान

: मंगलयान और मॉवेन के अतिरिक्त तीन अंतरिक्षयान मंगल की कक्षा में प्रतिस्थापित हैं. मार्स ऑडिस्से (2001 में प्रतिस्थापित), मार्स एक्सप्रेस (2004 में प्रतिस्थापित) और मार्स रिकॉनाइसेंस ऑर्बिटर (2006 में प्रतिस्थापित) सफलतापूर्वक मंगल की कक्ष में पहुंच चुके हैं.

डॉन अंतरिक्षयान

डॉन अंतरिक्षयान अभियान की शुरुआत लगभग एक दशक पूर्व हुई थी. एस्ट्रायड वेस्टा (क्षुद्रग्रह) और सेरेस (बौना ग्रह) खगोलीय पिंडों के अध्ययन के लिए अभियान को डिजाइन किया गया. अनुमान के मुताबिक खगोलीय पिंडों का इतिहास सौर मंडल के इतिहास से जुड़ा है. इस अभियान के माध्यम से सौरमंडल के शुरुआती निर्माण प्रक्रिया की जानकारियां इकट्ठी की जायेंगी. दोनों की शुरुआती प्रक्रिया और सौरमंडल के निर्माण से जुड़े होने के कारण जिज्ञासा का विषय बने हुए हैं. दोनों का विकास अलग-अलग संघटकों से हुआ है. वेस्टा सूखा पिंड है और चट्टानों जैसी संरचना है. इसके उलट सेरेस पानी में पाये जाने वाले खनिजों से निर्मित है. दोनों पिंडों के एक ही उपकरण द्वारा अध्ययन किये जाने से जानकारियों के साथ-साथ अंतर को समझने में मदद मिलेगी. डॉन अंतरिक्षयान में कैमरा, इनफ्रेर्ड मैपिंग स्पेक्ट्रोमीटर और गामा-रे एंड न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर से लैस किया गया है. मिशन की शुरुआत 27 सितंबर, 2007 से शुरू हुई और जुलाई, 2015 तक प्राथमिक अभियान पूरा होगा. वेस्टा पर अंतरिक्ष यान जुलाई, 2011 में पहुंचने के बाद फरवरी, 2015 तक सेरेस की कक्षा में प्रतिस्थापित हो जायेगा.

जूनो अभियान (बृहस्पति )

बृहस्पति ग्रह है खास : सौरमंडल में मौजूद सभी ग्रहों में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है. इसके दर्जनों उपग्रह और मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है. बृहस्पति छोटे सोलर सिस्टम का निर्माण करता है. घटकों में कई तारे हैं जो बढ़ नहीं सकते, जिसकी वजह से वे चमकते नहीं हैं.

कहा जाता है कि अगर सूर्य का आकार फ्रंट डोर जैसा है तो पृथ्वी का आकार निक्कल की तरह है और इसकी तुलना में बृहस्पति बास्केटबॉल जैसा होगा. बृहस्पति सूर्य से 778 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर स्थित पांचवां ग्रह है. बृहस्पति सूर्य का एक चक्कर लगाने में पृथ्वी के 12 साल के बराबर का समय लगाता है. इस ग्रह पर गैसें ज्यादा होने के कारण इसकी सतह ठोस नहीं है. माना जाता है कि धरती के आकार जैसा बृहस्पति का आंतरिक हिस्सा कुछ ठोस है. इसके वातावरण में हीलियम व हाइड्रोजन गैसों की अधिकता है.

..तो बृहद ग्रह से जुड़ेगा सौरमंडल का इतिहास: जूनो अभियान का प्राथमिक उद्देश्य ग्रह के उद्भव और विकास से जुड़ी जानकारियों को इकट्ठा करना है. घने बादलों का आवरण आंतरिक मौलिक प्रक्रियाओं को संरक्षित करता है और यही बादलों के आवरण सौर मंडल निर्माण के दौरान परिस्थितियों को व्यवस्थित करते थे. सौर मंडल के उद्भव से जुड़े तमाम सिद्धांतों में माना जाता है कि बादलों और गैसों के भयंकर पिंडों के टकराव से शुरुआत हुई.

बृहस्पति हाइड्रोजन और हीलियम से भरा हुआ है, अत: इसका निर्माण शुरू में ही हुआ होगा. तारों की उत्पत्ति के बाद ज्यादातर पदार्थो को गुरुत्वीय बल से अपनी ओर खींच लिया होगा. यह कैसे हुआ, जानना अभी बाकी है. ग्रहीय द्रव्यमान का निर्माण पहले हुआ और गुरुत्वाकर्षण से सभी गैसों को खींच लिया या नेबुला (निहारिका) में अस्थायी क्षेत्र में संकुचित होकर ग्रह का निर्माण हुआ? इन तथ्यों पर खोज अभी जारी है. जूनो के माध्यम से यह जानकारी इकट्ठा की जायेगी कि बृहस्पति के परिमंडल में जल और अमोनिया की मात्र कितनी है? ग्रह के गुरुत्वीय और चुंबकीय क्षेत्र के मैपिंग से आंतरिक संरचना और द्रव्यमान की जानकारियां इकट्ठा की जायेंगी.

ऐसे शुरू हुआ अभियान : ग्रीक और रोमन में मान्यता है कि बृहस्पति ने अपनी बुराइयों को छिपाने के लिए खुद को घने बादलों से ढंक लिया था. बृहस्पति (जुपिटर) की पत्नी जूना ही इन बादलों के बीच से उसकी वास्तविक प्रकृति को देख सकती थी. जूनो अंतरिक्षयान भी बादलों के बीच से ग्रह की वास्तविकता को जानने के लिए निर्मित किया गया है. इससे ग्रह की बुराइयों को नहीं, बल्कि ग्रह संरचना और ऐतिहासिक तथ्यों को जानने के लिए तैयार किया गया है.

अभियान की रूपरेखा : जूनो अंतरिक्षयान को 5 अगस्त, 2011 को लांच किया गया था. अंतरिक्षयान जुलाई, 2016 में बृहस्पति की कक्षा में स्थापित होगा. यह एक साल तक ग्रह की परिक्रमा (33 चक्कर) करेगा. अभियान अक्तूबर, 2017 संपन्न होगा. नासा के न्यू फ्रंटियर प्रोग्राम के तहत जूनो दूसरा अंतरिक्ष अभियान है. इस प्रोग्राम के तहत नासा का पहला अंतरिक्ष अभियान प्लूटो न्यू हॉरिजंस मिशन था, जो जनवरी, 2006 में लांच किया गया था. यह अंतरिक्षयान प्लूटो के चंद्रमा कारोन की कक्षा में 2015 तक प्रतिस्थापित होगा.

जूनो अभियान से उम्मीदें: 1-बृहस्पति के परिमंडल में कितना जल है, यह पता चलने पर यह जानने में मदद मिलेगी कि ग्रहों के निर्माण का कौन सा सिद्धांत सही है.

2-बृहस्पति के परिमंडल का घटक , तापमान, क्लाउड मोशन अन्य जानकारियां जुटाना.

3-चुंबकीय व गुरुत्वीय क्षेत्र का मानचित्रण, जिससे आंतरिक संरचना को जानने में मदद मिलेगी.

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