जंगल का जायका
Updated at : 14 Oct 2018 5:28 AM (IST)
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देश की राजधानी में बीते दिनों एक अनोखे खान-पान महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें एक शाम जंगल के जायकों के नाम समर्पित रही. झारखंड में जन्मे शैफ निशांत चौबे ने सिर्फ ‘फोरेज्ड फूड्स’ से ही मेहमानों की भूख मिटायी. ‘फोरेज’ शब्द का मोटा अनुवाद है- जंगल से बटोरा खाना. ऐसे कुछ खाने के बारे […]
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देश की राजधानी में बीते दिनों एक अनोखे खान-पान महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें एक शाम जंगल के जायकों के नाम समर्पित रही. झारखंड में जन्मे शैफ निशांत चौबे ने सिर्फ ‘फोरेज्ड फूड्स’ से ही मेहमानों की भूख मिटायी. ‘फोरेज’ शब्द का मोटा अनुवाद है- जंगल से बटोरा खाना. ऐसे कुछ खाने के बारे में बता रहे हैं व्यंजनों के माहिर प्रोफेसर पुष्पेश पंत…
हमारे मिथकों-पुराणों में वनवास का वर्णन खासे विस्तार से मिलता है. अपने जीवन के पहले चरण में ब्रह्मचारी तरुण गुरुकुल में अध्ययन प्रशिक्षण के लिए अरण्यनिवास करते थे और गृहस्थाश्रमी राजपुरुष तथा उनके अनुचर आखेट-मृगया अथवा दुष्ट राक्षसों-दस्युओं के दमन के लिए वन में प्रवेश करते रहते थे. आश्रम व्यवस्था का तीसरा चरण तो कहलाता ही वानप्रस्थ था! तपस्वी मुनिजन जंगलों में ही स्थायी निवास करते थे.
उनके आश्रम-गुरुकुल शहरी कोलाहल से दूर जंगलों में ही रहते थे. संन्यासी का संसार भी यही था. यह सभी खाते क्या थे? उनके भोजन में पोषण और स्वाद का संतुलन कैसे होता था? यह मात्र कौतुहल का विषय नहीं है. जंगल के जायके के साथ जुड़े अहम मुद्दे हैं जैविक विविधता और दुर्लभ जड़ी-बूटियों तथा औषधीय वनस्पतियों के लुप्त होने के संकट के. बहरहाल यहां हम बात कर रहे हैं जायके की, सो विषयांतर से बचने की जरूरत है.
आम तौर पर हम यह मानकर चलते हैं कि अपने आदिम प्रागैतिहासिक पुरखों की तरह आज भी वन की संतानें आदिवासी कंद, मूल, फल ही खाते हैं.
इस गलतफहमी से मुक्त होने की जरूरत है. भारत के पूर्वोत्तरी सीमावर्ती राज्यों के दुर्गम प्रतिबंधित क्षेत्र तथा अंडमान निकोबार केंद्र शासित प्रदेश के जारवा जैसे समूह को छोड़ दें, तो वनवासी नाममात्र के ही शेष हैं और इन लोगों ने शहरी-आधुनिक खानपान-पहनावा अपना लिया है. पारंपरिक अनुष्ठानों तथा पर्वों का आहार भी बदल रहा है.
झारखंड में विश्व बैंक के सहयोग से संचालित और राजीव सेठी की एशियन हैरिटेज फाउंडेशन द्वारा लागू एक परियोजना वन उपज को वंचित गांववालों की जीविका से जोड़ने का प्रयास करती रही है. इसी के तत्वावधान में देश की राजधानी दिल्ली में अभी हाल में एक अनोखे तरह के खान-पान महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें एक शाम जंगल के जायकों के नाम समर्पित रही. उस आयोजन में झारखंड में जन्मे शैफ निशांत चौबे ने सिर्फ ‘फोरेज्ड फूड्स’ से ही मेहमानों की भूख मिटायी. ‘फोरेज’ शब्द का मोटा अनुवाद है- जंगल से बटोरा खाना.
झारखंड मशहूर है महुआ के लिए, रगड़ा, फुटका एवं खुखड़ी जैसे जंगली मशरूम के लिए और चकोड़, सुनसुनिया, बेंगा आदि सागों के लिए, जिन्हें कुछ ही बरस पहले तक लोग खरीदकर नहीं खाते थे- बटोरकर ही खाते थे. इसी सूची में आप शामिल कर सकते हैं मोरिंगा-सहजन को, कुंद्रुम को, बांस करील को. हरी पत्तियों को सुखा कर उनके चूरे का प्रयोग बेमौसम किया जाता रहा है.
फादर बनफूल बेल्जियम से आये थे और उनका जीवन (तत्कालीन बिहार के) इसी अंचल में बीता. उन्होंने मोरिंगा तथा अन्य जंगली वनस्पतियों का गहरा शोध किया. झारखंड में गुमला के ‘अराउज’ संस्थान ने इस विरासत को सहेज कर रखा है. हजारीबाग का कृषि विज्ञान संस्थान भी ईसाई मिशनरियों द्वारा ही संचालित है और वनउपज को लोकप्रिय बनाने में लगा है. अचार, चटनी, मुरब्बे बनाने का प्रशिक्षण इस अभियान के साथ जुड़ी गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा दिया जाता है.
दिलचस्प बात यह है कि ‘जंगली’ खाने के मामले में झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओड़िशा के व्यंजनों में असाधारण साम्य देखने-चखने को मिलता है. यह स्वाद शाकाहार-फलाहार तक सीमित नहीं.
सूखी मछलियों और चींटी आदि का जिक्र भी जरूरी है. आयुर्वेद में जिस हरड़, बहेड़ा और आंवला की महिमा का बखान किया गया है, उसका खजाना भी जंगल ही रहे हैं. क्लेश इस बात को लेकर है कि अंधाधुंध वन कटान, अनियोजित नगरीकरण तथा शहरी उपभोगवादी अपसंस्कृति के प्रसार ने जंगल के जायकों का अस्तित्व संकटग्रस्त कर दिया है.
रोचक तथ्य
‘फोरेज’ शब्द का मोटा अनुवाद है जंगल से बटोरा खाना.
झारखंड मशहूर है महुआ के लिए, रगड़ा, फुटका एवं खुखड़ी जैसे जंगली मशरूम के लिए और चकोड़, सुनसुनिया, बेंगा आदि सागों के लिए, जिन्हें कुछ ही बरस पहले तक लोग खरीदकर नहीं खाते थे- बटोरकर ही खाते थे.
‘जंगली’ खाने के मामले में झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओड़िशा के व्यंजनों में असाधारण साम्य देखने-चखने को मिलता है.
आयुर्वेद में जिस हरड़, बहेड़ा, आंवला की महिमा का बखान किया गया है, उसका खजाना भी जंगल ही रहे हैं.
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