जिनके लिए लड़ रहे थे, उन्होंने ही की गद्दारी

-बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर विशेष- ।। अनुज कुमार सिन्हा।। सईल रकब की लड़ाई (9 जनवरी 1900) में बिरसा मुंडा के कई सहयोगी और अनुयायी मारे गये थे, लेकिन अंगरेज बिरसा को पकड़ नहीं सके थे. अंगरेजों ने रणनीति बदली. इसमें वैसे लोगों को खोजा गया, जिन्हें वे अपने खेमे में कर सकते थे. […]
-बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर विशेष-
।। अनुज कुमार सिन्हा।।
सईल रकब की लड़ाई (9 जनवरी 1900) में बिरसा मुंडा के कई सहयोगी और अनुयायी मारे गये थे, लेकिन अंगरेज बिरसा को पकड़ नहीं सके थे. अंगरेजों ने रणनीति बदली. इसमें वैसे लोगों को खोजा गया, जिन्हें वे अपने खेमे में कर सकते थे. बिरसा की गिरफ्तारी के लिए पांच सौ रुपये के इनाम की घोषणा की गयी, ताकि पैसे के लोभ में बिरसा की सूचना मिल सके. विद्रोहियों के परिजनों को गिरफ्तार कर दबाव बनाया गया, उनके परिवार का खाना-पानी रोक दिया गया, ताकि दबाव में विद्रोही समर्पण कर दें. अंगरेजों की रणनीति सफल रही. छोटे-छोटे लोभ में फंस कर लोगों ने गद्दारी की और बिरसा को गिरफ्तार करवाने में अंगरेजों की सहायता की. बिरसा मुंडा की मौत के 114 साल बाद भी स्थिति बहुत नहीं बदली है.
बिरसा को पकड़ने के लिए तमाड़, खूंटी, बंदगांव, पोड़ाहाट (सिंहभूम) के क्षेत्रों में पुलिस तैनात कर दी गयी थी. सिंहभूम के डिप्टी कमिश्नर 8 जनवरी से ही बंदगांव में कैंप किये हुए थे. एक जमींदार थे जगमोहन सिंह. वे बिरसा के पुराने विरोधी और सरकार के समर्थक थे. उन्होंने विद्रोहिया की सूची डिप्टी कमिश्नर को दे दी थी. करेका, तुकाडीह, चतुमा, सिंको, कोडाडीह और कटमकेल में छापामारी कर बिरसा के अनुयायियों को पकड़ा गया. इस बीच कमिश्नर भी आ गये. बिरसा के समर्थक मुंडाओं और मानकियों के खिलाफ कार्रवाई की जाने लगी. कई मुंडाओं को हटा दिया गया. जो नये मुंडा नियुक्त किये जा रहे थे, वे अंगरेजों के पक्ष के थे. पोड़ाहाट के कुमार नरपत सिंह तो खुल कर बिरसा के विरोध में अंगरेजों का साथ दे रहे थे. सरकार ने घोषणा कर दी थी कि जो भी मानकी-मुंडा बिरसा को गिरफ्तार करवायेगा, उसे पूरे जीवन के लिए लगानमुक्त पट्टा दिया जायेगा. अंगरेजों ने यह बड़ा लोभ दिया था.
इस बीच राजाओं में अंगरेजों के प्रति वफादारी दिखाने के लिए होड़ थी. सरायकेला के राजा ने बिरसा की गिरफ्तारी में सहयोग के लिए 25 पुलिसकर्मियों को भेजा था, लेकिन अंगरेजों ने उसे धन्यवाद देकर वापस कर दिया था.
कमिश्नर थामसन खुद अभियान में लग गये थे. पुलिस ने आंदोलन के केंद्र रहे सेंतरा, कोटागारा अ़ौर रेजोटो में छापा मारा. सेंतरा से बिरसा मुंडा के साले पकड़े गये. बाद में पुलिस ने बिरसा के प्रमुख अनुयायियों अमुक मुंडा, टीका मुंडा और मलकू मुंडा को गिरफ्तार किया. पांच मुंडाओं को बरखास्त कर यह संदेश दिया गया कि जो साथ नहीं देगा, उसका यही हाल होगा. फिर अंगरेजों ने बुध मुंडा को गिरफ्तार कर लिया जिसकी बेटी से तीन माह पहले ही बिरसा की शादी हुई थी. स्पष्ट था कि परिजनों को गिरफ्तार कर बिरसा तक पहुंचने का अंगरेज प्रयास कर रहे थे. कई की संपत्ति भी कुर्क की जा रही थी. फिर भी बिरसा के अलावा बड़े सहयोगी डोंका माङिाया और गया मुंडा के पुत्र फरार थे. इसके बाद बौखलाये अंगरेजों ने आतंक फैलाया. लोगों को पीटा गया, प्रताड़ित किया गया ताकि वे बिरसा के बारे में जानकारी दे सकें. अंगरेजों का दबाव काम आया. संपत्ति कुर्क होने के भय से डोंका माङिाया ने 32 विद्रोहियों के साथ 28 जनवरी को आत्मसमर्पण कर दिया. बिरसा के अनुयायियों को गिरफ्तार करवाने के लिए खूंटी के 33 और तमाड़ के 17 मुंडाओं को पुरस्कृत किया गया. गुट्टहातू के सिंगराई मुंडा ने विद्रोहियों को पकड़वाने में मदद की जिन्हें सौ रुपये का पुरस्कार मिला.
अपने सहयोगियों की गिरफ्तारी और लगातार भाग-दौड़ से बिरसा थक गये थे. वे सेंतरा के पश्चिम में स्थित जंगल में आराम कर रहे थे. उनके साथ उनकी पत्नी भी थी, जो खाना बना रही थी. बिरसा पर जो भारी इनाम रखा गया था, उसके लोभ में मानमारू और जरीकेल के सात लोग पड़ गये थे. वे लगातार बिरसा की खोज में घूम रहे थे. उन्हें पता चल चुका था कि बिरसा कहां हैं. जब बिरसा, उनकी पत्नी सभी गहरी नींद में थे, तभी सात लोगों ने उन पर हमला कर कब्जे में ले लिया. बिरसा को संभलने का मौका भी नहीं दिया. इसके बाद बिरसा को बंदगांव कैंप में डिप्टी कमिश्नर को सौंप दिया गया. वहां से उन्हें रांची लाया गया. रांची जेल में डायरिया से 9 जून 1900 को उनकी मौत हो गयी.
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