रंगमंच में अदा हो रहीं एलजीबीटीक्यूआई समुदाय के प्रति संवेदनशील भूमिकाएं

Updated at : 30 Sep 2018 8:38 AM (IST)
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रंगमंच में अदा हो रहीं एलजीबीटीक्यूआई समुदाय के प्रति संवेदनशील भूमिकाएं

अमितेश, रंगकर्म समीक्षक धारा 377 को रद्द करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने शेक्सपीयर का प्रसिद्ध संवाद ‘नाम में क्या रखा है?’ को उद्धृत किया. उद्धरण से ध्यान गया कि एलजीबीटीक्यूआई समुदाय (समलैंगिकों) की सामाजिक स्वीकार्यता के लिए लड़ी गयी लड़ाई को या इनके जीवन को रंगमंच ने पिछले कुछ वर्षों में किस तरह […]

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अमितेश, रंगकर्म समीक्षक
धारा 377 को रद्द करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने शेक्सपीयर का प्रसिद्ध संवाद ‘नाम में क्या रखा है?’ को उद्धृत किया. उद्धरण से ध्यान गया कि एलजीबीटीक्यूआई समुदाय (समलैंगिकों) की सामाजिक स्वीकार्यता के लिए लड़ी गयी लड़ाई को या इनके जीवन को रंगमंच ने पिछले कुछ वर्षों में किस तरह से समझा, उससे संवाद किया और दर्शकों तक पहुंचाया. वैसे एक याचिकाकर्ता नवतेज जौहर का संबंध नृत्य और रंगमंच की दुनिया से भी है.
सुनील शानबाग निर्देशित ‘ड्रीम्स ऑफ तालीम’ निर्देशक चेतन दातार के आत्मकथात्मक आलेख पर आधारित था, जिसमें चेतन ने अपने को केंद्र में रखकर एक समलैंगिक नाट्य निर्देशक के घर और रंगमंच पर उसके संघर्ष को पेश किया था. चेतन ने एनएसडी रंगमंडल के साथ ‘राम नाम सत्य है’ किया था, जिसमें इस मुद्दे का स्पर्श था. नाटक एड्स मरीजों पर था.
सुनील ने इस नाटक को ऐसी महिला अभिनेत्री के नजरिये से पेश किया था, जो वर्षों बाद मंच पर वापसी करती है और उसे ऐसी मां की भूमिका करनी है, जिसे पता चलता है कि उसका बेटा समलैंगिक है. नाटक के भीतर नाटक के शिल्प और मंच व जीवन के यथार्थ के विरोधाभाष को दिखाते हुए प्रस्तुति इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि सबको अपने तरीके से जीने का हक है.
पूजा सरूप और शीना खालिद ने ‘इला’ के मिथक को, जिसमें एक शापग्रस्त राजा दो यौनिकता को जीने को विवश है, मुंबई के परिवेश में रखा था. और अभिनेताओं के इंप्रोवाइजेशन के सहारे एक शरीर के भीतर दो यौनिकताओं की आवाजाही और जी रहे व्यक्ति के अंदर के परिवर्तनों, समाज में व्याप्त लैंगिक व्यवहारों, उनके बीच के संबंध और संबंध की निरंतर जटिल होती जा रही सरंचना को पेश किया था.
प्रस्तुति कुछ स्टिरियोटाइप्स पर रोचक अंदाज में प्रहार करती है और उन पर से आवरण हटा देती है कि बतौर दर्शक हम अपने पूर्वाग्रहों को पहचानें. फाजेह जलाली ने ‘शिखंडी’ की प्रस्तुति में महाभारत के पात्र ‘शिखंडी’ की जटिल और दयनीय स्थिति को पेश किया था, जो पूर्वजन्म में और इस जन्म में स्त्री होने के बावजूद पुरुष के रूप में परवरिश पाता है, इससे उसका सहज यौनिक बोध समाप्त हो जाता है. प्रस्तुति की विशेषता थी कि अभिनेता अपने जेंडर के हिसाब से भूमिका में नहीं थे.
दिल्ली में हैप्पी रणजीत ने ‘स्ट्रेट प्रपोजल’ में समलैंगिक पुरुषों के जीवन को पेश किया था और उस द्वंद्व को भी, जिसे वे भारतीय समाज में झेलते हैं.
रणजीत इससे पहले त्रिपुरारी शर्मा निर्देशित ‘रूप अरूप’ में ऐसे अभिनेता की भूमिका निभा चुके थे, जो नौटंकी में स्त्री भूमिका निभाता है. इन प्रस्तुतियों में यह उल्लेखनीय है कि नये तरह के कथ्य को संवेदनशील ढंग से पेश करने के लिए निर्देशक मिथक, वर्तमान और कलारूपों की तरफ तो गये ही, आपने नाट्य भाषा को भी बदला. कथ्य को सामाजिक परिवेश में स्थित किया और व्यक्ति के भीतर के संघर्ष को भी उभारा.
कुछ नाटककारों ने इस विषय को ध्यान में रखकर नाटक भी लिखा. नंदकिशोर आचार्य ने अपने नाटक ‘ जिल्ले सुब्हानी’ में इतिहास में ऐसे चरित्रों की मौजूदगी दिखायी, खासकर मध्य युग में जब ये चरित्र आज की तरह हाशिये पर नहीं थे और शक्ति सरंचना में शामिल थे, दरबार से लेकर हरम तक में इनकी उपस्थिति थी, फिर भी सामाजिक रवैये में वर्तमान से अधिक अंतर नहीं था.
हिजड़ों के जीवन को केंद्र में रखकर मछिंदर मोरे ने ‘जानेमन’ नाटक लिखा था, जिसका मंचन वामन केंद्रे ने एनएसडी रंगमंडल के साथ किया था. विजय तेंदुलकर ने भी ‘मीता’ नाटक लिखा, जो समलैंगिक स्त्री के जीवन पर था.
धारा 377 के समाप्त होने मात्र से समाज में एलजीबीटीक्यूआई समुदाय को स्वीकृति नहीं मिलेगी. क्योंकि इनके बारे में बहुत सी भ्रांतियां हैं और समाज की जड़ता भी है, जो यथास्थिति को टूटते नहीं देख सकती. ऐसे में इनके प्रति संवेदनशील रवैया निर्मित करने में रंगमंच अहम भूमिका निभा सकता है.
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