पुरबिया जायके का आनंद

Updated at : 16 Sep 2018 9:10 AM (IST)
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पुरबिया जायके का आनंद

पुष्पेश पंत भारतीय खान-पान में जायके किसी एक प्रांत या सूबे के नहीं, बल्कि कई पड़ोसी जायकों के संगम से अपनी खास पहचान बनाते हैं. भारत में हर कहीं सामाजिक हैसियत से निर्धारित होनेवाले खान-पान के बारे में बता रहे हैं व्यंजनों के माहिर प्रोफेसर पुष्पेश पंत… कुछ ही दिन पहले दिल्ली के एक पांचतारा […]

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पुष्पेश पंत
भारतीय खान-पान में जायके किसी एक प्रांत या सूबे के नहीं, बल्कि कई पड़ोसी जायकों के संगम से अपनी खास पहचान बनाते हैं. भारत में हर कहीं सामाजिक हैसियत से निर्धारित होनेवाले खान-पान के बारे में बता रहे हैं व्यंजनों के माहिर प्रोफेसर पुष्पेश पंत…
कुछ ही दिन पहले दिल्ली के एक पांचतारा छाप होटल में बिहारी महाभोज का आयोजन किया गया था. वहां बिहार के विभिन्न जायकों से राजधानी के निवासियों का परिचय बढ़ाने का प्रयास बहुत समझदारी के साथ किया गया था. पहली बात तो यह थी कि इस ‘फूड फेस्टिवल’ का नामकरण बिहारी नहीं किया गया था, बल्कि इसे पूरबिया कहकर बड़े लाड से पुकारा गया. इसकी शुरुआत ही प्रांतों, भाषा-बोली, जात-पात और मजहब की सीमाओं को तोड़ हाथ खोलकर परोसी थाली का आनंद लेने के लिए की गयी थी.
हिंदुस्तान में आजादी के बाद राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया, जिससे क्षेत्रीयता और संकुचित उपराष्ट्रीयता की भावना को ही भड़काया जाता रहा है. चुनावी राजनीति ने आग में घी डालने का काम किया है.
जहां तक भारतीय खान-पान का सवाल है, उसके जायके किसी एक प्रांत या सूबे के नहीं, बल्कि कई पड़ोसी जायकों के संगम से अपनी खास पहचान बनाते हैं. पाठकों को यह बात याद दिलाने की नहीं होनी चाहिए कि बिहार में एक तरह का खान-पान नहीं होता. भोजपुर, मिथिलांचल, मगध और अंग के अलावा बंगाल की सरहद से जुड़े भू-भाग में अपने-अपने व्यंजन चाव से खाये-खिलाये जाते हैं. झारखंड के जन्म के बाद बिहार का विभाजन एक बार और हो गया. लेकिन, क्या इससे वहां का खाना अलग हो गया है?
यह गलतफहमी बिहार के बाहर रहनेवाले बहुत लोगों को है कि लिट्टी-चोखा या दही चूड़ा अथवा सत्तू के अलावा बिहार में कुछ खाया ही नहीं जाता. यह भी याद रखने की जरूरत है कि जाति और मजहबी निषेधों-प्रतिबंधों के अलावा दूसरी जगहों की तरह बिहार में भी खान-पान सामाजिक हैसियत से निर्धारित होता रहा है. मिथिला के ब्राह्मण कश्मीरी और सारस्वत ब्राह्मणों की तरह मांस-मछली से परहेज नहीं करते.
बंगाल शाक्त ब्राह्मण काली के उपासक और ओड़िशा के ब्राह्मण भी हमेशा पूर्णतः शाकाहारी नहीं होते. भूमिहार हो या राजपूत अथवा कायस्थ अथवा अन्य पिछड़ी कहलानेवाली जातियों के सदस्य, उनके खान-पान में वर्जनाएं इतनी सख्त नहीं होतीं और सभी अपने-अपने स्वाद और स्थानीय उपलब्ध मौसमी सामग्री के अनुसार मुंह में पानी ला देनेवाले व्यंजन बनाते हैं.
हॉलीडेइन में इस समय जो सैफ रसोई की जिम्मेदारी संभाले है, वह भागलपुर के रहनेवाले हैं. उनकी सहायता के लिए दिल्ली के कई मशहूर होटलों में काम करनेवाले अन्य सैफ सहर्ष स्वयंसेवक के रूप में प्रकट थे. इनमें कोई भोजपुर का था, तो कोई पूर्णिया का. साधुओं की तरह इस पात में जात पूछने का सवाल ही नहीं उठता, सब अपने घर का जैसा खाना खिलाने को व्याकुल थे.
कुछ इस तरह का काम पूजा साहू कई बरसों से कर रही हैं पॉटबैली नामक अपने रेस्तरां में, जिसकी एक शाखा बिहार भवन में भी है, पर यहां हमें विषयांतर में भटकने का लोभसंवरण करना चाहिए. यहां झालमूड़ी भी थी और तीन तरह के चोखे भी. सत्तू का शरबत था तो घुघनी चूड़ा भी. परवल और आलू की भुजिया भी थी. अब आप ही सोचिए, क्या इनमें बहुत सारी चीजें चखने को और लार टपकाने को आपको उत्तर प्रदेश के पूर्वांचली जिलों में, बहार में या बंगाल में नहीं मिलतीं?
झालमूड़ी को लेकर तो रसगुल्ले जैसी जंग छिड़ सकती है कि यह बिहारी है या बंगाली. गनीमत है कि मौसम चतुरमास का है और हरी सब्जियों का चलन जरा कम होता है. अन्यथा सिरफुटव्वल की नौबत साग को लेकर भी उड़ती और यह जंग झारखंड, छत्तीसगढ़ और बिहार के भोजनभटों के बीच छिड़ सकती थी.
इस मौके पर सैफ मिश्रा का हाथ बटा रहे थे फूड ब्लॉगर मनीष श्रीवास्तव, जिनके परिवार का नाता दरभंगा से रहा है और जो अपने डॉक्टर-पिता के साथ तबादलों पर पूरे सूबे में खाते-खिलाते भटकते रहे हैं. अवधी और हैदराबादी कोरमे, कलिये का घमंड चूर-चूर करते उन्होंने नायाब मोतिहारी मटन करी खिलायी और सरसों वाली मछली भी. शाकाहारी मेहमानों के लिए रिकौंज की तरी वाली सब्जी तो भूनी कलेजी से होड़ ले रही थी. वहीं उतनी ही वजनदार बेसन की बूटा कलेजी भी थी.
पर एक बार फिर सोचिए कि क्या पतौड़े और पातरा हिंदुस्तान के दूसरे सूबों में लगभग बिल्कुल ऐसे ही नहीं बनाये जाते? हमारे परम मित्र शंकर्षण ठाकुर ने तत्काल हमें याद दिलायी कि रिकौंज को अंक्रौज भी कहते हैं और बनारस में कलामर्मग्य आनंद कृष्णदास जी ने हमें समझाया था कि मूल व्यंजन अलीक मत्स्य है अर्थात मछली की शल्क में सब्जी.
मिष्ठान के नाम पर मखाने की खीर थी. ठेकुवा, चंद्रकला और लवंग लतिका और परवल की मिठाई. सार-संक्षेप यह है कि बिहार में भले ही यह तमाम चीजें दुनिया की किसी और जगह से बेहतर बनायी जाती हो, इनकी पहुंच सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं. दाल-पूरी पर एक फिल्म प्रवासी भारतीय और प्रवासी चीनियों की शंकर-संतान रिचर्ड फंुग ने कनाडा में बनायी है. खान-पान में कट्टरता और सांप्रदायिक हठ पालना दंडनीय अपराध समझा जाना चाहिए.
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