अंटार्कटिका की पिघलती बर्फ के हैं अहम संदेश

।। डॉ एनके सिंह ।। विश्व पर्यावरण दिवस आज दुनिया की सरकारों द्वारा पिघलते बर्फ की दास्तान जो भले ही मानवता के ‘सरवाइवल’ से जुड़ी है, नकार दी गयी है. शायद इसीलिए विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2014) का जो थीम है, वह आम नागरिकों को आगाह करने पर केंद्रित है. ‘रेज योर वॉइस, नॉट […]
।। डॉ एनके सिंह ।।
विश्व पर्यावरण दिवस आज
दुनिया की सरकारों द्वारा पिघलते बर्फ की दास्तान जो भले ही मानवता के ‘सरवाइवल’ से जुड़ी है, नकार दी गयी है. शायद इसीलिए विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2014) का जो थीम है, वह आम नागरिकों को आगाह करने पर केंद्रित है. ‘रेज योर वॉइस, नॉट द सी-लेवल’ यानी हम आवाज उठायें, हम अपना आचरण बदलें, ताकि ग्लोबल वार्मिग कम हो और समुद्र का जलस्तर का बढ़ना बंद हो.
मई 2014 में दुनिया के दो प्रतिष्ठित जर्नलों ‘साइंस’ एवं ‘जियोलॉजिकल रिसर्च लेटर्स’ में छपे दो शोधों ने हमारी धरती के बेहद खराब स्वास्थ्य को उजागर किया है. पश्चिम अंटार्कटिका के विशालकाय बर्फ के ग्लेशियर धीरे-धीरे टूट रहे हैं. इस टूट की कराह में जो हलचल हो रही है, उससे हम अब भी अनजान हैं. हमें बहुत ही कम पता है कि कितनी कार्बन डाई-ऑक्साइड उत्सजिर्त होकर वातावरण में प्रवेश कर रही है.
मानवता के इतिहास के पिछले 25 साल विज्ञान की तरक्की के स्वर्णकाल दिख रहे हैं, मगर वस्तु-स्थिति कालिदास के जीवन की उस घटना की तरह है जिसमें वह उसी पेड़ की डाल को काट रहे थे, जिस पर वह बैठे थे.
विज्ञान की उन्नति और पर्यावरण संतुलन को एक साथ जोड़े रखना संभव था, मगर हमारी बेवकूफियों ने उस पर पानी फेर दिया है. हम दुनिया के देशों को देखें, तो जिस अमेरिका का हाथ ग्लोबल वार्मिग करने में 75 फीसदी से ज्यादा है, उसने कार्बन डाई-ऑक्साइड उत्सजर्न 50} कम करने की समय-सीमा वर्ष 2050 तक बांध रखी है.
अब प्रगति की धुंध में चीन वातावरण को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रहा है और भारत भी बहुत पीछे नहीं है. हम सोच रहे हैं कि समय सीमा में कार्बन डाई-ऑक्साइड का उत्सजर्न बांध कर अपना दायित्व पूरा कर लेंगे, मगर आधुनिकतम शोधों ने जो आंकड़े पेश किये हैं, वे यह बता रहे हैं कि समय की डोर हमारे हाथ से छूट चुकी है. हम धीरे-धीरे विनाश की उस कगार पर पहुंचने जा रहे हैं, जहां से अब पीछे लौटना संभव नहीं होगा.
इस विनाश की रफ्तार अब उतनी तेज दिख रही है, जितना मात्र तीन साल पहले नहीं दिख रही थी. इस समय पलक झपकते मीलों-मील तक अंटार्कटिका के ग्लेशियर पिघल जा रहे हैं.
इसी शताब्दी के अंत तक समुद्र का जलस्तर दस फीट से ज्यादा बढ़ जायेगा. दुनिया के सैकड़ों चमचमाते शहर अतीत में खो जायेंगे. मई 2014 के शोधों के आने के बाद ‘नासा’ के थॉमस वैगनर (जो ‘ध्रुवीय बर्फ’ के अध्ययन से जुड़े हैं) ने कहा है कि लोगों को इस बात को बताना जरूरी है कि अंटार्कटिका के विशाल ग्लेशियर हमारे जीवन के लिए कितने अहम हैं. ‘प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न’ अब हकीकत बन चुका है, मगर लोग व्यक्तिगत तौर पर सजग हो जायें तो शायद ग्लेशियरों के टूटने की रफ्तार को कम किया जा सकता है.
कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक पीटर वैडहेम अंटार्कटिका के पिघलते ग्लेशियरों की इस विनाश-गाथा को मानवता का अंतिम पड़ाव मान रहे हैं. उनको हैरानी होती है कि दिनों-दिन ग्रीनहाउस गैसों (खास कर कार्बन डाई-ऑक्साइड, मीथेन एवं नाइट्रस ऑक्साइड) के उत्सजर्न की दर कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही है. अगर केवल 2010 से 2013 के बीच क्रायोसैट-2 सैटेलाइट द्वारा प्रेषित आंकड़ों को देखें तो प्रतिवर्ष अंटार्कटिका की बर्फ 160 बिलियन मीट्रिक टन की रफ्तार से अब पिघलने लगी है. इतनी बर्फ तो 2005 से 2010 तक नहीं पिघलती थी. इस रफ्तार से पिघलती बर्फ करीब समुद्र के जल स्तर को 0.1 इंच प्रतिवर्ष के हिसाब से बढ़ाने लगी है.
यह तो स्पष्ट है कि दुनिया की सरकारों द्वारा पिघलते बर्फ की दास्तान जो भले ही मानवता के ‘सरवाइवल’ से जुड़ी है, नकार दी गयी है. शायद इसीलिए विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2014) का जो थीम है, वह आम नागरिकों को आगाह करने पर केंद्रित है. ‘रेज योर वॉइस, नॉट द सी-लेवल’ यानी हम आवाज उठायें, हम अपना आचरण बदलें ताकि ग्लोबल वार्मिग कम हो और समुद्र का जलस्तर का बढ़ना रुके. यह संदेश बहुत ही अहम है.मैं अपने मुहल्ले में भी देखता हूं कि किस तरह लोग वातावरण को बरबाद करने पर आमादा हैं.
पानी की टंकी के भर जाने के बाद पानी घंटों बरबाद होता रहता है, मगर मोटर को बंद करने की हमें सुध नहीं रहती. बिजली आ जाने के बाद भी घंटों जेनरेटर धड़धड़ाते रहते हैं. मोबाइल को चाजर्र में डाल कर हम आराम से से सो जाते हैं. कमरे में कोई नहीं रहता तब भी पंखा, एसी और टीवी चलते रहते हैं. मुहल्ले की सड़क पर कचरा फेंक रहे अपने पड़ोसी से मैंने पूछा कि पर्यावरण को दूषित करनेवाला काम क्यों कर रहे हैं, तो उन्होंने पहले कहा कि किसी के बाप की सड़क थोड़े ही है और फिर बोले- मोदी जी साफ करवा देंगे, चिंता मत कीजिये. शायद यह वाकया मामूली ही हो, मगर यह हमारे चरित्र और माइंडसेट को उजागर करने के लिए काफी है जिसके कारण पश्चिम अंटार्कटिका की दुखती रग से हम संवेदनशील नहीं हो पा रहे हैं. यह दुखती रग जो हमारे परिवेश और अस्तित्व को ही विराम गाथा की ओर घसीट रही है.
(लेखक डायबिटीज विशेषज्ञ एवं दाग (धनबाद एक्शन ग्रुप) के संयोजक हैं)
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