भयावह बाढ़ के आगोश में केरल तबाही से िनपटने को जारी कवायद

Updated at : 19 Aug 2018 5:23 AM (IST)
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भयावह बाढ़ के आगोश में केरल  तबाही से िनपटने को जारी कवायद

केरल में बाढ़ की तबाहियां बढ़ाते बड़े बांध ज्यादा बारिश की वजह से अभी केरल भयानक बाढ़ की चपेट में है. सेना, जल सेना, एनडीआरएफ के अलावा पड़ोसी राज्यों की मानव शक्ति भी संकट की इस घड़ी में केरल की मदद में जुटी है. भूस्खलन हो रहे हैं, घर के घर पानी के तीव्र बहाव […]

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केरल में बाढ़ की तबाहियां बढ़ाते बड़े बांध

ज्यादा बारिश की वजह से अभी केरल भयानक बाढ़ की चपेट में है. सेना, जल सेना, एनडीआरएफ के अलावा पड़ोसी राज्यों की मानव शक्ति भी संकट की इस घड़ी में केरल की मदद में जुटी है. भूस्खलन हो रहे हैं, घर के घर पानी के तीव्र बहाव में बहे जा रहे हैं, सैकड़ों की तादाद में लोग काल के गाल में समा चुके हैं. केरल सरकार की सारी शक्ति इस संकट से निपटने में लगी है.
मगर जो कुछ सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है, वह यह कि इसी वक्त केरल के दो सबसे बड़े डैम के अलावा लगभग दो दर्जन अन्य डैम भी अपने सरोवरों से अतिरिक्त जल छोड़ रहे हैं, जिससे बाढ़ की विभीषिका और भी बढ़ गयी. यहां यह सवाल स्वाभाविक है कि इडुकी और इडमलयार नामक केरल के ये दो बड़े डैम अभी ही अपने अतिरिक्त जल छोड़ने की मजबूरी के शिकार कैसे हो गये, जबकि इन दोनों की जल संग्रहण क्षमता एक अरब घनमीटर है? बताया जा रहा है कि दोनों डैम में उनकी क्षमता से ऊपर जल जमा हो रहा है और उनके सामने इसे छोड़े बगैर कोई दूसरा चारा नहीं है.
सवालों के कठघरे
जिस एक प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं, वह यह है कि आखिर वे जल छोड़ने को अपने सरोवरों के पूरी तरह भरने का इंतजार ही क्यों करते रहे, जिससे ऐन बाढ़ के वक्त उन्हें यह जल छोड़ना पड़ रहा है? विकल्पहीनता की ऐसी स्थिति तक पहुंच जाने तक सोये रहना सभी डैम संचालकों का एक सामान्य शगल है. जब केरल बाढ़ से नहीं जूझ रहा था, तभी इन दोनों डैम से जल की अतिरिक्त निकासी कर आसानी से ऐसी स्थिति आने देने से बचा जा सकता था. स्पष्ट है कि यह दूरदर्शिता नहीं दिखायी गयी. नतीजा यह है कि आज जब बाढ़ का संकट घिरा है, तभी ये दोनों डैम अपने फाटक खोल इस संकट की आग में घी उड़ेल रहे हैं.
सच तो यह है कि लगभग उन्नीस दिनों पूर्व 31 जुलाई, 2018 को ही मीडिया में ऐसी खबरें प्रमुखता से आयीं कि 2403 फीट के जल स्तर की पूर्ण क्षमता वाले इडुकी डैम में जल जमाव के 2395 फीट पार कर जाने की वजह से जल्द ही उससे जल छोड़ा जाना आरंभ होगा. यदि उन्होंने इस बीच की अपेक्षतया सूखी अवधि में ही जल छोड़ना आरंभ कर दिया होता, तो ठीक इस बाढ़ के वक्त विकल्पहीनता की वर्तमान स्थिति को टाला जा सकता था.
दरअसल, इडुकी डैम का बुनियादी उद्देश्य विद्युत उत्पादन था. इसमें 130 मेगावाट के छह टरबाइन लगे हैं. किसी को भी यह उम्मीद हो सकती थी कि इस वर्ष यहां विद्युत उत्पादन का पिछला रिकॉर्ड टूट जाएगा, क्योंकि इसके पूर्व कभी भी इस डैम में जल संग्रहण एवं जल का आगमन इतना अधिक न रहा. पर यदि केंद्रीय विद्युत प्राधिकार (सीइए) के राष्ट्रीय विद्युत पोर्टल पर प्रदर्शित विद्युत उत्पादन के दैनिक तथा मासिक आंकड़े देखे जाएं, तो यह पाकर अचरज होगा कि इस वर्ष जून से जुलाई तक इस डैम से मात्र 3250 लाख यूनिट विद्युत का उत्पादन हो सका, जो कई वर्षों से न्यूनतर था. वर्ष 2014 के इन्हीं दो महीनों के दौरान इस डैम से इस बार की अपेक्षा 50 प्रतिशत अधिक बिजली पैदा हुई थी. यदि इस वर्ष यहां से अधिक विद्युत उत्पादन होता, तो उससे भी इस डैम से और ज्यादा जल की निकासी सुनिश्चित होती और आज का यह संकट कम हुआ होता.
संकट के वक्त रखरखाव
तो फिर क्यों ऐसा हुआ कि इतने अधिक जल संग्रहण के बाद भी इडुकी ने इतना कम विद्युत उत्पादन किया? राष्ट्रीय विद्युत पोर्टल से ही इसका भी जवाब मिलता है. दरअसल इडुकी में विद्युत उत्पादन की छह इकाइयों में से एक अपने पुनरोद्धार/आधुनिकीकरण हेतु 1 अगस्त, 2017 से ही बंद है, जबकि एक और इकाई वार्षिक रखरखाव हेतु 26 जून, 2018 से निष्क्रिय पड़ी है. यह एक रहस्य ही है कि ठीक मानसून के वक्त ही एक इकाई का रखरखाव क्यों किया जा रहा है, जबकि इसे सूखे मौसम में भी किया जा सकता था. नतीजा यह हुआ कि इडुकी डैम से न सिर्फ विद्युत उत्पादन कम हुआ, बल्कि इससे केरल में बाढ़ की तबाही में बढ़ोतरी हो गयी.
तथ्य यह बताते हैं कि इस वर्ष 31 मई को जब दक्षिण-पूर्व मानसून केरल पहुंचा, उसके पहले ही इडुकी डैम की जल संग्रहण क्षमता का 25 प्रतिशत पूरा हो चुका था, जो सामान्य से अथवा पिछले दस वर्षों के जल संग्रहण औसत से अधिक था. यह भी एक कारण है कि इस वर्ष यह डैम इतनी जल्दी भर गया. डैम प्रबंधकों को इसका जवाब देना चाहिए कि मानसून आने के पूर्व ही क्यों इतना अधिक जल संग्रहण होने दिया गया?
सीडब्लूसी की लापरवाही
केरल में इस अभूतपूर्व बारिश तथा डैम से जल निकासी के इन चिंताजनक तथ्यों के बीच केंद्रीय जल आयोग (सीडब्लूसी) द्वारा बाढ़ के पूर्वानुमान तथा बचाव की अग्रिम कार्रवाइयों के संदर्भ में भी सवाल खड़े होते हैं. यदि सीडब्लूसी के वेबसाइट को देखा जाए, तो यह जानना विस्मयभरा होगा कि केरल में न तो भूतल बाढ़ पूर्वानुमान और न ही बहकर आनेवाले पानी से पैदा बाढ़ पूर्वानुमान के ही कोई केंद्र हैं. यहां सीडब्लूसी ने केवल बाढ़ मॉनिटरिंग स्थल स्थापित कर रखे हैं और उनमें से भी एक अभी निष्क्रिय है. यही सही वक्त है कि वह शीघ्र ही इडुकी एवं इडामलयार जैसे कुछ मुख्य डैमों के साथ ही केरल के कुछ अन्य प्रमुख स्थलों को भी अपने बाढ़ पूर्वानुमान की गणना में शामिल करे.
इन सभी मुद्दों को संबोधित करने हेतु उचित कार्रवाइयों की जरूरत है. जब बाढ़ की विभीषिका तथा उससे राहत पहुंचाने की व्यस्तता का वर्तमान दौर थम जाये, तो केरल सरकार द्वारा किये जानेवाले प्रथम कार्यों में संभवतः यह भी शामिल होना चाहिए कि वह इन सभी बिंदुओं पर एक स्वतंत्र जांच गठित करे, ताकि ऐसी स्थिति फिर कभी न आये कि डैम बाढ़ की मुसीबतें कम करने की बजाय उन्हें बढ़ाने की वजह बन जाएं.(अनुवाद: विजय नंदन)
वर्ष 2018 का जल-प्रलय
बीते जून से मध्य अगस्त तक राज्य में 37.5 प्रतिशत से अधिक बारिश होने से कई हिस्सों में स्थितियां अनियंत्रित हो गयी हैं.
अमूमन, जून से सितंबर माह के बीच केरल के उत्तरी हिस्से में तेज बारिश की आशंका रहती है, जबकि उत्तर-पूर्व मानसून के कारण अक्तूबर से दिसंबर के बीच दक्षिण केरल में भारी बारिश होती है.
केरल राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड के 58 बांधों और जल संसाधन विभाग के 22 बांधों पर निर्धारित क्षमता से अधिक जल संग्रहीत हो चुका है. अतिरिक्त जल निकासी के लिए सभी बांधों के गेट को खोल दिया गया है, जिससे बाढ़ का संकट और भी विकराल हो गया है.
बीते कुछ दिनों से एशिया के सबसे बड़े आर्क डैम इडुक्की डैम से प्रति सेकेंड औसतन 10 से 15 लाख लीटर पानी छोड़ा जा रहा है.
वर्ष 2013 में भी केरल ने बाढ़ की विभीषिका झेली थी, लेकिन उस वक्त बांधों की क्षमता से अधिक पानी एकत्रित नहीं हो पाया था, जिससे बाढ़ की समस्या इतनी विकराल नहीं थी.
मानव निर्मित हैं ये आपदाएं
साल 2014 में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा सन् 1900 से तैयार किये गये वर्षा आंकड़ों के अध्ययन से निष्कर्ष निकाला गया था कि मानसूनी वर्षा की तीव्रता बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है. बीते वर्ष 2017 में आईआईटी बांबे के अध्ययन में भी दावा किया गया था कि मानसूनी वर्षा की तीव्रता और बारंबारता के पीछे एक बड़ा कारण जंगलों का अंधाधुंध कटान भी है.
जब बाढ़ की विभीषिका तथा उससे राहत पहुंचाने की व्यस्तता का वर्तमान दौर थम जाये, तो केरल सरकार द्वारा किये जानेवाले प्रथम कार्यों में संभवतः यह भी शामिल होना चाहिए कि वह इन सभी बिंदुओं पर एक स्वतंत्र जांच गठित करे, ताकि ऐसी स्थिति फिर कभी न आये.
हिमांशु ठक्कर
पर्यावरणविद्
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