निर्देशक अतुल कुमार की नाटक प्रस्तुतियाें में रंगभाषा को लेकर दिखते हैं नये प्रयोग

Updated at : 12 Aug 2018 5:19 AM (IST)
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निर्देशक अतुल कुमार की नाटक प्रस्तुतियाें में रंगभाषा को लेकर दिखते हैं नये प्रयोग

अतुल कुमार के नाटक सरल प्रक्रिया में तैयार नहीं होते हैं. एक तरफ अतुल नुआर सिनेमा के वैभव को पेश करते हैं, ठीक उसी समय में उसके नकलीपन और मेलोड्रामा को भी उभारते हैं और वर्तमान का दृष्टिकोण भी डालते हैं. लेकिन, जटिलताएं दर्शकों के लिए नहीं हैं. दर्शक एक बहुत ही सरल दृश्यभाषा में […]

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अतुल कुमार के नाटक सरल प्रक्रिया में तैयार नहीं होते हैं. एक तरफ अतुल नुआर सिनेमा के वैभव को पेश करते हैं, ठीक उसी समय में उसके नकलीपन और मेलोड्रामा को भी उभारते हैं और वर्तमान का दृष्टिकोण भी डालते हैं. लेकिन, जटिलताएं दर्शकों के लिए नहीं हैं. दर्शक एक बहुत ही सरल दृश्यभाषा में गढ़ी गयी प्रस्तुति देखता है.

आद्यम कंपनी हर साल कुछ निर्देशकों का चयन करके उन्हें नाटक निर्देशित करने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है और दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे महानगरों में उनकी प्रस्तुतियां भी करवाती है. साल 2018 के आद्यम की प्रस्तुतियों की शुरुआत अतुल कुमार निर्देशित नाटक ‘डिटेक्टिव 9-2-11’ से हुई. अतुल कुमार ने अल्फ्रेड हिचकॉक के फिल्म ‘39 स्टेप्स’ पर आधारित ’39 का आंकड़ा’ नाम से एनएसडी के छात्रों के साथ एक प्रस्तुति की थी. थियेटर में सिनेमा की नुआर शैली के सेटिंग, तकनीक और अभिनय को स्पूफ की तरह प्रस्तुत करने का वह रोचक प्रयोग था. इसी को थोड़ा विस्तार और पेशेवर अभिनेताओं के साथ नये नाम ‘डिटेक्टिव 9-2-11’ से प्रस्तुत किया है,

लेकिन विस्तार के क्रम में सबटेक्स्ट का विस्तार नहीं हुआ. प्रस्तुति में ‘देश की सुरक्षा’ का संवाद जो बार-बार दोहराया जाता है, उसके इर्द-गिर्द सबटेक्स्ट रचा जा सकता था, लेकिन निर्देशक ने यह मौका गंवा दिया. प्रस्तुति में मनोरंजक मसालों को बढ़ा दिया गया है. सबसे उल्लेखनीय पक्ष था लाइव जैज संगीत, जिसने प्रस्तुति में घटनाओं-परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव और मनोभावों को रोचक बनाकर पेश करने में मदद की. अभिनेताओं ने मेलोड्रामेटिक व ओवरएक्टिंग वाला अभिनय करके प्रस्तुति की लय को दुरुस्त रखा. कमानी के प्रोसेनियम मंच पर दृश्य सज्जा और प्रकाश की परिकल्पना में भी नवाचार था.

इस प्रस्तुति के टिकट की दर काफी ऊंची थी फिर भी कमानी सभागार हाउसफुल था. ‘पिया बहुरुपिया’, ‘न्वाॅयजेज ऑफ’, ‘ख्वाब सा’ के बाद अतुल कुमार की लगातार चौथी प्रस्तुति में दर्शकों की भीड़ ने यह साबित कर दिया कि अतुल ने अपने नाटकों के लिए दर्शकों का एक वर्ग तैयार किया है, और जिसकी क्रय क्षमता भी अधिक है. अतुल मूलतः अभिनेता हैं, लेकिन इधर वे लगातार निर्देशन में सक्रिय हैं और कामशेत में अपने समूह कंपनी थियेटर का एक स्पेस भी बनाया है, जहां नयी रंगभाषा को लेकर प्रयोग भी होता है और प्रस्तुतियां भी होती हैं.

अतुल कुमार ने ग्लोब थियेटर के आमंत्रण पर शेक्सपियर के नाटक ‘ट्वेल्फ्थ नाइट’ को हिंदी में ‘पिया बहरुपिया’ के नाम से प्रस्तुत किया. इस बीच भारत में किसी नाटक को इतने शोज, इतने शहर और इतने दर्शक हासिल नहीं हुए, जो इस नाटक को हुए. प्रस्तुति कई देशों का दौरा भी कर चुकी है. बेहतरीन अभिनेता, हास्य का भरपूर इस्तेमाल, संगीत, मंचीय जटिलताओं का अभाव, आख्यान का रैखिक ढांचा इत्यादि अतुल की प्रस्तुतियों की एक साझी विशेषता तो है ही, इनका प्रोडक्शन भी बहुत चुस्त होता है. पटकथा में अभिनेता के लिए इम्प्रोवाइजेशन के स्पेस बने होते हैं, ताकि अभिनेता रियल टाइम में दर्शकों से कनेक्ट कर सके. और यही वे मौके होते हैं, जो दर्शकों को रिझाते हैं. अतुल अपनी प्रस्तुतियों को एकरस नहीं होने देते और ब्रेख्तियन तकनीक का कुशलता से उपयोग करते हुए आख्यान को बीच-बीच में तोड़ते हैं, जिससे दर्शकों को यह एहसास दिलाया जाता है कि वे एक प्रदर्शन को देखने के लिए बैठे हैं. आख्यान के टूटने से प्रस्तुति में दर्शकों की भागीदारी भी बढ़ती है.

अतुल कुमार के नाटक सरल प्रक्रिया में तैयार नहीं होते हैं. जैसे ‘डिटेक्टिव 9-2-11’ में एक सिनेमा का नाटक में रूपांतरण, फिर उस दौर के सिनेमाई भाषा की झलक दृश्य में परिकल्पित करना, इस सबके बीच ऐसे अभिनय को रखना जो प्रहसन जैसा लगे, फिर तकनीकी पहलू, यानी कई जटिलताएं हैं. एक तरफ अतुल नुआर सिनेमा के वैभव को पेश करते हैं, ठीक उसी समय में उसके नकलीपन और मेलोड्रामा को भी उभारते हैं और वर्तमान का दृष्टिकोण भी डालते हैं. लेकिन, जटिलताएं दर्शकों के लिए नहीं हैं. दर्शक एक बहुत ही सरल दृश्यभाषा में गढ़ी गयी प्रस्तुति देखता है. ऐसे दर्शक बहुत हैं, जिन्हें ऐसी नाट्य प्रस्तुति चाहिए, जिसमें फुहड़ हुए बिना दर्शकों को थोड़ा हंसाने की क्षमता हो, इसलिए ये लोग अतुल का नाटक देखने आते हैं. लेकिन, ऐसे दर्शक हासिल करने की कवायद में अतुल के नाटकों में कथ्य की गहराई और प्रासंगिकता बरकरार नहीं रहती.

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