श्रावणी मेला 2018 में नहीं है इतिहास की कौंध

Updated at : 06 Aug 2018 7:18 AM (IST)
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श्रावणी मेला 2018 में नहीं है इतिहास की कौंध

देवघर : राजकीय श्रावणी मेला 2018 में स्थानीय इतिहास का कोई अक्स नहीं है. जिला प्रशासन ने लाखों रुपये खर्च कर चार धाम सहित 12 ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृतियां तो बनवायी, पर मेले की आपाधापी में यहां का इतिहास उकेरना भूल गया.श्रावणी मेले का रूप कभी भी एकांगी नहीं होता है. यदि इसमें जलाभिषेक को आतुर […]

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देवघर : राजकीय श्रावणी मेला 2018 में स्थानीय इतिहास का कोई अक्स नहीं है. जिला प्रशासन ने लाखों रुपये खर्च कर चार धाम सहित 12 ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृतियां तो बनवायी, पर मेले की आपाधापी में यहां का इतिहास उकेरना भूल गया.श्रावणी मेले का रूप कभी भी एकांगी नहीं होता है. यदि इसमें जलाभिषेक को आतुर श्रद्धालु आते हैं तो इतिहास के प्रेमी भी. पिछले कई वर्षों से एक स्थानीय इतिहासकार के सहयोग से जिला प्रशासन सूचना जनसंपर्क विभाग के पंडालों में देवघर के कई क्रांतिकारी, सांस्कृतिक और पुरातात्विक वैभव से जुड़ी शानदार तस्वीरें लगता था. जिसे देखने के लिए कांवरियों के साथ स्थानीय लोग भी उमड़ पड़ते थे.
इस बार न तो आरमित्रा प्लस टू स्कूल कैंपस में न ही मदरसा मैदान में इतिहास की कोई कौंध दिखती है. यह सब प्रशासन की संवादहीनता और उपेक्षा का नतीजा है. जिला प्रशासन के सालाना पंडाल में देवघर के जाने माने क्षेत्रीय इतिहासकार उमेश कुमार अपनी दुर्लभ स्थानीय इतिहास विषय के चित्र लगाते थे. इस आयोजन के लिए उमेश कुमार जिला प्रशासन से कोई पैसा नहीं लेते थे.
अपने खर्च पर वो प्रशासन द्वारा आवंटित जगह पर चित्र दीर्घा (देवघर इतिहास दर्शन) लगाते और सावन की रिमझिम में इतिहास की सुरभि बिखेरते थे. इस बार प्रशासन ने उमेश कुमार से कोई संपर्क नहीं किया. इस वजह से मदरसा मैदान में भी अपनी दीर्घा नहीं सहेज सके. उमेश कुमार ने बताया कि संवादहीनता व प्रस्तुति स्थल की जानकारी नहीं मिलने के कारण वे अपनी दीर्घा नहीं लगा सकें. बहुत शोध व पैसा खर्च कर तीन गुणा छह साइज की तकरीबन 50 तस्वीरें बनवायी है. इनमें से ज्यादातर शीशे से मढ़ी हुई है. जो हर वर्ष दर्शकों या अन्य किसी के द्वारा क्षतिग्रस्त भी होती रही है. यह नुकसान भी वो इतिहास के लिए सहते रहे हैं.
इनके संग्रह में 1872-73 में बैंगलोर द्वारा ली गयी वैद्यनाथ मंदिर की कई तस्वीरें, 1782 में विलियम हॉग द्वारा बनायी पेंटिंग्स, 1820-80 के मध्य चित्रित शिवलाल की पेंटिंग, 10वीं शताब्दी के वीणाधर शिव, भूमिस्पर्श मुद्रा के बुद्ध, पद्यमपाणि अवलोकितेश्वर, पालि भाषा का सूत्र, चाला शैली की विरासत, राजामान सिंह की धरोहर, 1857 की कब्रगाह, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष, ठाकुर रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, राजनारायण बसु, गुरुदेव रवींद्रनाथ, भगत सिंह, जैसे महापुरुषों के देवघर प्रवास से संबंधित चित्र है. जो एक युग संदर्भ की प्रामाणिक व्याख्या करते हैं.
कौन हैं स्थानीय इतिहासकार उमेश कुमार
स्व नारायण सिंह एवं पार्वती देवी के घर में वर्ष 1971 में जन्मे उमेश कुमार ने स्नातकोत्तर की शिक्षा (गांधी विचार, भागलपुर विश्वविद्यालय) हासिल की. स्वतंत्र लेखक के साथ झारखंड शोध संस्थान के सचिव हैं. विश्वविद्यालय के छात्रों को शोध कार्य में नि:शुल्क मार्गदर्शन करते हैं. इन्होंने देवघर के इतिहास-संस्कृति पर अबतक 12 पुस्तकों का प्रकाशन/संपादन/संयोजन किया है. ‘वतनपरस्त’ श्रृंखला की पांच चर्चित पुस्तकों का लेखन किया है. इन्होंने पुरस्कार के साथ शोधवृति कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग झारखंड सरकार रांची, गांधी शांति प्रतिष्ठान नयी दिल्ली, केंद्रीय हिंदी निदेशालय नयी दिल्ली, जनमत शोध संस्थान दुमका, जुड़ाव, मधुपुर, संवाद, मधुपुर, रांची से हासिल किया है.
पिछले तीन वर्ष से लगाते आ रहे थे प्रदर्शनी
शोधार्थी उमेश कुमार पिछले तीन वर्षों से श्रावणी मेले के दौरान प्रदर्शनी लगाते आ रहे थे. इसे देखने प्रतिदिन करीब एक हजार लोग आते थे. इस वर्ष प्रदर्शनी नहीं लगने से लोगों में मायूसी भी देखी जा रही है.
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