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श्रीलंका : राजपक्षे के समर्थनवाले संयुक्त विपक्ष ने प्रधानमंत्री के खिलाफ लाया अविश्वास प्रस्ताव

Updated at : 17 Mar 2018 6:15 PM (IST)
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श्रीलंका : राजपक्षे के समर्थनवाले संयुक्त विपक्ष ने प्रधानमंत्री के खिलाफ लाया अविश्वास प्रस्ताव

कोलंबो : श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के समर्थनवाले संयुक्त विपक्ष प्रधानमंत्री रानील विक्रमसिंघे के खिलाफ अश्विास प्रस्ताव लेकर आया है. हाल ही में विक्रमसिंघे को मध्य कैंडी जिले में हिंसा भड़कने के बाद कानून एवं विधि मंत्री के पद से हटा दिया गया था. संयुक्त विपक्ष (जेओ) के सांसद रंजीत सोयसा ने कहा […]

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कोलंबो : श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के समर्थनवाले संयुक्त विपक्ष प्रधानमंत्री रानील विक्रमसिंघे के खिलाफ अश्विास प्रस्ताव लेकर आया है. हाल ही में विक्रमसिंघे को मध्य कैंडी जिले में हिंसा भड़कने के बाद कानून एवं विधि मंत्री के पद से हटा दिया गया था.

संयुक्त विपक्ष (जेओ) के सांसद रंजीत सोयसा ने कहा कि 68 वर्षीय विक्रमसिंघे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव अगले सप्ताह सदन की कार्यवाही शुरू होने के बाद संसद के अध्यक्ष को सौंपा जायेगा. राजपक्षे ने संवाददाताओं से शुक्रवार को कहा था कि वह सरकार गिराने के करीब हैं. जेओ ने बताया कि अविश्वास प्रस्ताव में विक्रमसिंघे के खिलाफ पिछले तीन वर्ष में किये गये आर्थिक कुप्रबंध का आरोप भी शामिल है. जेओ ने बताया कि विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के कुछ सदस्य भी अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करेंगे. सोनयसा ने बताया कि विक्रमसिंघे के खिलाफ लगे आरोपों में सेंट्रल बैंक बांड मामले में साल 2015 और 2016 में हुआ भ्रष्टाचार भी शामिल है.

राजपक्षे की नयी पार्टी श्रीलंका पीपल्स पार्टी (एसएलपीपी) को 10 फरवरी को मिले व्यापक जीत के बाद विक्रमसिंघे इस्तीफे की मांग का सामना कर रहे हैं. राजपक्षे के विश्वासपात्र और राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के पास अविश्वास प्रस्ताव में जीत हासिल करने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है. यूएनपी के सदस्य जब तक बड़ी संख्या में विक्रमसिंघे के खिलाफ नहीं आते हैं तब तक अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम है. सिरीसेना ने विक्रमसिंघे को कानून एवं विधि मंत्री के पद से बहुसंख्यक सिंघली बौद्ध और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के बीच कैंडी जिले में भड़की हिंसा के बाद आठ मार्च को कानून एवं विधि मंत्री से हटा दिया था.

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