यूपी चुनाव 2022: यूपी में किसके सिर सजेगा सीएम का ताज ? यह तय करते हैं OBC मतदाता, पढ़ें पूरा जातीय समीकरण
Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 02 Sep 2021 3:08 PM
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जातीय वोटर काफी महत्व रखते है. ऐसे में अब सभी राजनीतिक दल अपने-अपने वोटरों को लुभाने में लग गए है.
उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव होने है. जिसको लेकर सभी पार्टियां जी तोड़ मेहनत कर रही है. एक तरफ जहां बीजेपी अपने जातीय वोटरों को लुभाने में लगी है, वहीं दूसरी पार्टियां भी अपने-अपने स्तर पर काम कर रही है.
प्रदेश में करीब 18 फीसदी मुसलमान, 12 फीसदी जाटव और 10 फीसदी यादव हैं. इसके अलावा बाकी जातियों में यानी 18% में सवर्ण दलित और दूसरी जातियां हैं. ऐसे में इन वोटरों में से मुस्लिम को छोड़कर बीजेपी 10 फीसद यादव पर भी अपना दावा मानकर चल रही है. यानी उनके पास ऐसी रणनीति है, जिसके आधार पर वह 10 प्रतिशत यादव वोट में भी सेंध लगाने की तैयारी कर रहे हैं. अगर साल 2017 के चुनाव में वोटों के प्रतिशत पर नजर डालें तो उन चुनाव में समाजवादी पार्टी को 22 फीसदी बहुजन समाज पार्टी को 18 फीसदी वोट मिले थे.
यूपी में इन दिनों सभी राजनीतिक दल छोटी-छोटी जातियों के वोटों को अपने पाले में लाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है. बीजेपी (BJP) ने साफ तौर पर दावा किया है कि पिछड़ी जातियों के 60 फीसदी वोट में से ज्यादातर वोट उनके पास ही आने है. यही दावा दूसरी राजनीतिक पार्टियां भी कर रही हैं कि पिछड़ी और दलित जातियों पर उनका जोर है.
अनुमान के मुताबिक यूपी में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग का है. लगभग 52 फीसदी पिछड़ा वोट बैंक में 43 फीसदी वोट बैंक गैर-यादव बिरादरी का है, जो कभी किसी पार्टी के साथ स्थाई रूप से नहीं खड़ा रहता है. यही नहीं पिछड़ा वर्ग के वोटर कभी सामूहिक तौर पर किसी पार्टी के पक्ष में भी वोटिंग नहीं करते हैं.
इस बार बीजेपी ने अपनी रणनीति के तहत यूपी में यादव समुदाय से तीन जगहों पर जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया है. सरकार ने भी यादव मंत्री हैं. सरकार आने वाले दिनों में यादवों की बड़ी रैली करने जा रही है. जिसका सीधा मतलब है कि बीजेपी यादवों के वोट में पैठ करने की बड़े स्तर पर तैयारी कर रही है. इसके अलावा अहम कड़ी जाटों को भी पार्टी संगठन में जगह दी गई है. जाट नेताओं को संगठन में उपाध्यक्ष बनाया गया है. इस तरह से यादव और जाटों को साधने की बीजेपी ने पुरजोर कोशिश की है.
जैसे देश की सत्ता में काबिज होने का रास्ता यूपी (लोकसभा की 80 सीटें) से होकर जाता है, ठीक उसी तरह यूपी की सत्ता (विधानसभा की 403 सीटें) में काबिज होने का रास्ता ओबीसी वोट बैंक पर निर्भर करता है. इस वोट बैंक के सपोर्ट के बिना कोई भी दल यूपी की सत्ता में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना सकता. केंद्र की सत्ता में भी काबिज होने के लिए किसी पार्टी के पक्ष में इस वोट बैंक के एक बड़े हिस्से का सपोर्ट होना अनिवार्य है. क्योंकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को मानें तो देश की कुल आबादी में ओबीसी का प्रतिनिधित्व 50 फीसदी से अधिक है.
जातिगत आधार पर देखें तो ओबीसी में सबसे बड़ी कुर्मी समुदाय की है. सूबे के सोलह जिलों में कुर्मी और पटेल वोट बैंक छह से 12 फीसदी तक है. इनमें मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती जिले प्रमुख हैं.
ओबीसी की मौर्या-शाक्य-सैनी और कुशवाहा जाति की आबादी वोट बैंक 7 से 10 फीसदी है. इन जिलों में फिरोजाबाद, एटा, मिर्जापुर, प्रयागराज, मैनपुरी, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, बदायूं, कन्नौज, कानपुर देहात, जालौन, झांसी, ललितपुर और हमीरपुर हैं. इसके अलावा सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद में सैनी समाज निर्णायक है.
मल्लाह समुदाय 6 फीसदी है, जो सूबे में निषाद, बिंद, कश्यप और केवल जैसी उपजातियों से नाम से जानी जाती है. यह फतेहपुर, चंदौली, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया, वाराणसी, गोरखपुर, भदोही, प्रयागराज, अयोध्या, जौनपुर, औरैया सहित जिले में है. मछली मारने और नाव चलाने में इनका जीवन बीत जाता है.
ओबीसी में एक और बड़ा वोट बैंक लोध जाति का है, जो बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है. यूपी के कई जिलों में लोध वोटरों का दबदबा है, जिनमें रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामायानगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा ऐसे जिले हैं, जहां लोध वोट बैंक पांच से 10 फीसदी तक है.
पूर्वांचल के कई जिलों में इन्हें स्थानीय भाषा में नोनिया के नाम से जाना जाता है. विशेषकर मऊ, गाजीपुर बलिया, देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़, महराजगंज, चंदौली, बहराइच और जौनपुर के अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में इनकी संख्या अच्छी खासी है. पूर्वांचल की सियासत में सपा और बीजेपी दोनों ही इन समुदाय को साधकर अपने राजनीतिक हित साधना चाहते हैं.
पूर्वांचल के गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, चंदौली, भदोही, वाराणसी व मिर्जापुर में इस बिरादरी अच्छी खासी है. इस बिरादरी के नेता के तौर पर ओम प्रकाश राजभर ने पहचान बनाई है. राजभर वोटों के लिए सपा और बीजेपी ही नहीं बल्कि बसपा की नजर है.
उत्तर प्रदेश की ओबीसी समुदाय में पाल समाज अतिपिछड़ी जातियों में आता है, जिसे गड़रिया और बघेल जातियों के नाम से जाना जाता है. बृज और रुहेलखंड के जिलों में पाल समुदाय काफी अहम माने जाते हैं. यह वोट बैंक बदायूं से लेकर बरेली, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, हाथरस जैसे जिलों में काफी महत्व रखते हैं. इसके अलावा अवध के फतेहपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़ और बुंदेलखड के तमाम जिलों में 5 से 10 हजार की संख्या में रहते हैं.
उत्तर प्रदेश की सियासत में लोहार और कुम्हार दोनों ही समुदाय ओबीसी की अति पिछड़ी जातियों में आती है, लोहार जाति के लोग खुद को विश्वकर्मा और शर्मा जाति लिखते हैं तो जबकि कुम्हार समुदाय को लोग खुद को प्रजापति लिखते है. अवध और पूर्वांचल के इलाकों में इन दोनों समुदाय अकेले दम जीतने की ताकत नहीं रखते हैं, लेकिन दूसरे दलों के खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं.
बता दें कि उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव के बाद 2019 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने 2018 में करीब 1 से डेढ़ महीने तक पिछड़ी जनजाति, पिछड़ी जातियों के सम्मेलन किए थे, जिनमें मौर्य, कुशवाहा ,कुर्मी ,यादव ,निषाद समेत कई पिछड़ी जातियों को शामिल कर यह सम्मेलन लगभग डेढ़ महीने तक लगातार कराए गए थे. बीजेपी को इसका सियासी फायदा भी चुनाव में मिला था. इसी फॉर्मूले को एक बार फिर से 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी प्रयोग करने के मूड में हैं.
Posted By Ashish Lata
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