Jharkhand: कभी नक्सलियों का गढ़ था कोडरमा का लक्ष्मीपुर गांव, स्वावलंबन से गांव में आयी समृद्धि

Updated at : 21 Feb 2023 6:34 PM (IST)
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Jharkhand: कभी नक्सलियों का गढ़ था कोडरमा का लक्ष्मीपुर गांव, स्वावलंबन से गांव में आयी समृद्धि

उपायुक्त आदित्य रंजन और ‘स्वावलंबी गांव’ की परिकल्पना पर काम करनेवाली टीम ने 14 महीने पहले लक्ष्मीपुर गांव में पहली बार मीटिंग की थी. यहां के सरकारी स्कूल में बिना किसी पारिश्रमिक के शिक्षा दे रहीं इंटर पास यशोदा देवी कहती हैं कि शुरू में कुछ समझ में नहीं आया.

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कोडरमा, विकास. झारखंड के कोडरमा जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर स्थित डोमचांच प्रखंड की धरगांव पंचायत का लक्ष्मीपुर गांव इन दिनों सामूहिक एकता और स्वावलंबन की मिसाल बन गया है. दो दशक पूर्व इस इलाके में नक्सलियों की तूती बोलती थी, लेकिन जिला प्रशासन की पहल और ग्रामीणों के श्रमदान से गांव की तस्वीर बदल चुकी है. ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा का भेद मिटाने के लिए ग्रामीणों ने सभी घरों, स्कूल, शौचालयों को हल्के नीले रंग से रंग दिया है. साफ-सफाई और पर्यावरण व जल संरक्षण को लेकर भी सराहनीय कार्य हुए हैं.

14 महीने पहले गांव में हुई पहली मीटिंग

उपायुक्त आदित्य रंजन और ‘स्वावलंबी गांव’ की परिकल्पना पर काम करनेवाली टीम ने 14 महीने पहले लक्ष्मीपुर गांव में पहली बार मीटिंग की थी. यहां के सरकारी स्कूल में नि:शुल्क शिक्षा दे रहीं इंटर पास यशोदा देवी कहती हैं कि शुरू में कुछ समझ में नहीं आया. बाद में जब हमने रोजाना ‘रात्रि चौपाल’ करते हुए सामूहिक कार्य शुरू किया, तो इसके परिणाम दिखने शुरू हो गये.

‘चंचालिनी ग्राम विकास समिति’ के नाम से हो रहे सब काम

स्थानीय निवासी नीतीश कुमार सिंह बताते हैं कि अब गांव के सभी कार्य ‘चंचालिनी ग्राम विकास समिति’ के नाम से हो रहे हैं. करीब 1100 आबादी वाले गांव में हर महीने 85 घरों से 30 रुपये ग्राम कोष में जमा किये जाते हैं. इस पैसे से गांव की हर छोटी-मोटी जरूरी काम किये जाते हैं.

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बनाया श्रम एकता चौक, मशरूम उत्पादन से लेकर सिलाई-कढ़ाई भी

लक्ष्मीपुर के ग्रामीणों ने गांव में ‘श्रम एकता चौक’ बनाया है, जहां एकता को प्रदर्शित करते हुए विशेष सजावट की गयी है. प्रशासन के सहयोग से यहां भगवान बिरसा मुंडा की छोटी प्रतिमा भी स्थापित की गयी है. गांव के एक मकान में स्थानीय युवाओं ने हाल में मशरूम का उत्पादन शुरू किया है. जबकि, दूसरे मकान में करीब 19 महिलाएं सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण ले रही हैं. वहीं, गांव को सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिला प्रशासन ग्रामीणों को प्रशिक्षण दे रहा है.

गांव में कहीं नहीं दिखती गंदगी, सड़क के दोनों किनारे लगे हैं पेड़

गांव में कहीं भी कचरे का ढेर, गंदगी और सड़क पर पानी बहता हुआ दिखायी नहीं देता है. मुख्य जगहों पर ग्रामीणों ने खुद टीन व अन्य डब्बों को डस्टबीन का रूप दे पेड़ या पोल पर टांग रखा है. गांव की भीतरी सड़क के दोनों ओर 1345 फलदार (ज्यादातर आम के) पौधे लगाये गये हैं. इनकी सुरक्षा के लिए बांस से उनकी घेरा बंदी की गयी है. गांव में जल संरक्षण को लेकर 2500 टीसीबी, 1200 मेड़बंदी और तीन लूज बोल्डर चेक डैम बनाये गये हैं. जिला प्रशासन ने यहां एक बड़े तालाब के निर्माण को भी स्वीकृति दी है.

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‘स्वावलंबी गांव’ की परिकल्पना के तहत शुरू हुआ है काम

कोडरमा के उपायुक्त आदित्य रंजन ने बताया कि जब भी गांवों के दौरे पर निकलता, ग्रामीण अपनी-अपनी समस्याएं लेकर मेरे पास पहुंच जाते. इस परंपरा को बदलने के लिए ही डेढ़ साल पहले ‘स्वावलंबी गांव’ की परिकल्पना के तहत काम शुरू किया गया है. जिले के दो दर्जन से अधिक गांवों को स्वावलंबी बनाया जा रहा है. इस बीच लक्ष्मीपुर के ग्रामीणों ने अपनी एकजुटता से अलग मिसाल पेश की है.

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