Jharkhand : साढ़े तीन सौ साल से आयोजित हो रही खरसावां में प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा

खरसावां में प्रभु जगन्नाथ के रथ यात्रा की तैयारी चल रही है. एक जुलाई को प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र वे देवी सुभद्रा तथ पर सवार हो कर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिये रवाना होंगे. मान्यता है कि यहां की रथ यात्रा करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी है. 17 वीं सदी के अंतिम वर्षों में रथ यात्रा की शुरुआत हुई थी.
Saraikela Kharsawan News: खरसावां में प्रभु जगन्नाथ के रथ यात्रा की तैयारी जोरों से चल रही है. एक जुलाई को प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र वे देवी सुभद्रा तथ पर सवार हो कर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिये रवाना होंगे. कहा जाता है कि यहां की रथ यात्रा करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी है. स्थानीय लोगों के अनुसार 17 वीं सदी के अंतिम वर्षों में खरसावां में रथ यात्रा की शुरुआत हुई थी.
स्वप्नादेश के बाद खरसावां के दाश परिवार को खरसावां राजमहल के पीछे बह रही सोना नदी के तट पर जगन्नाथ के शक्ल की लकड़ी मिली थी. इसी लकड़ी से महाप्रभु की प्रतिमा बना कर राज पंडित गोविंद दाश के परिवार ने महाप्रभु की पूजा अर्चना शुरु की थी. बताया जाता है कि पं गोविंद दाश के घर पर महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा पूजे जाते थे. बाद में प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा की प्रतिमाओं को दाश परिवार के यहां से खरसावां के राजमहल में लाया गया. राजमहल परिसर में ही प्रभु जगन्नाथ के मंदिर भी बनाया कर पूजा अर्चना शुरु किया गया. यहां पूरे पारंपरिक ढंग से रथ यात्रा का आयोजन होता है. अब राजमहल परिसर स्थित मंदिर में ही प्रभु जगन्नाथ की पूजा अर्चना होती है.
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खरसावां में रथ यात्रा का आयोजन ओडिशा के पुरी की तर्ज पर किया जाता है. खरसावां के राजा गोपाल सिंहदेव के द्वारा छेरा पोहरा नामक रश्म अदायगी के बाद यहां प्रभु जगन्नाथ का रथ निकलता है. राजा सड़क पर चंदन छिड़क कर झाडू लगाते हैं. इसके बाद ही प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा की प्रतिमा मंदिर से बाहर सड़क पर निकाला जाता है. बीच सड़क में तीनों ही प्रतिमाओं को रख कर पूजा अर्चना करने के बाद रथ पर चढ़ा कर मौसीबाडी के लिये ले जाया जाता है.
खरसावां में रथ यात्रा का आयोजन स्थानीय लोगों के सहयोग से सरकारी स्तर पर होता है. रथ यात्रा पर खर्च होने वाली राशि का वहन राज्य सरकार करती है. इस वर्ष रथ यात्रा में सरकारी फंड से 55 हजार की राशि खर्च होगी. रियासत काल में रथ यात्रा में होने वाले सभी खर्च राजपरिवार उठाता था. देश की आजादी के पश्चात तमाम देशी रियासतों के भारत गणराज्य में बिलय के दौरान खरसावां के तत्कालिन राजा श्रीराम चंद्र सिंहदेव व सरकार के बीच मर्जर एग्रीमेंट हुआ था. उस एग्रीमेंट के अनुसार रियासत काल में राजा के द्वारा की जाने वाली राथ यात्रा समेत करीब एक दर्जन धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन सरकार को करना है. इसके बाद से ही खरसावां के रथ यात्रा का आयोजन सरकारी खर्च पर होने लगा. रथ यात्रा के आयोजन में स्थानीय राजपरिवार के साथ साथ स्थानीय लोगों का भी काफी सहयोग रहता है.
खरसावां में 2012 में भव्य रथ बनाया गया था. तत्कालिन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने निजी स्तर से खरसावां के लिये नया रथ बनवाया है. ओडिशा से आये कारिगरों ने इस रथ का निर्माण किया है. रथ को आकर्षक स्वरुप दिया गया है. वर्ष 2020 व 2021 में वैश्विक महामारी कोरोना के रथ यात्रा नहीं हुई थी. सिर्फ रश्मों को निभाया गया था. दो वर्ष बाद इस बार प्रभु की रथ यात्रा निकलेगी. इसको लेकर श्रद्धालुओं में भी उत्साह देखा जा रहा है.
इस वर्ष रथ यात्रा के दौरान खरसावां के राजवाड़ी परिसर में अलग अलग तीन दिन ओड़िया संस्कृति से जुड़े हुए कार्यक्रम आयोजित होंगे. एक जुलाई को भजन संख्या, पांच जुलाई को ओड़िशी नृत्य व नौ जुलाई को बाहुड़ा रथ यात्रा के मौके पर ओड़िशा के कलाकारों द्वारा ओड़िया संस्कृति से जुड़े बादी पाला आयोजित की जायेगा. ये सभी कार्यक्रम ओड़िशा सरकार से भाषा, साहित्य व संस्कृति विभाग द्वारा किया जायेगा.
रिपोर्ट: शचिंद्र कुमार दाश
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