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गहन होते भारत-फ्रांस द्विपक्षीय संबंध

Updated at : 29 Jan 2024 2:13 AM (IST)
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गहन होते भारत-फ्रांस द्विपक्षीय संबंध

निर्भरता और विश्वास पर आधारित ठोस संबंध कुछ ही देशों के साथ स्थापित हो सकता है. कई पश्चिमी देशों के साथ भरोसे को लेकर स्थिति सहज नहीं रहती है, पर फ्रांस के साथ ऐसा नहीं है.

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दुनिया में भारत के गिने-चुने गहरे मित्र राष्ट्र हैं, जिनमें एक फ्रांस है. फ्रांस के बारे में कहा जाता है कि यह यूरोप में हमारा ‘रूस’ है. इसका अर्थ है कि जिस प्रकार हम रूस पर भरोसा करते हैं, उसी प्रकार हम फ्रांस पर विश्वास करते हैं. भारत को लेकर फ्रांस की भी यही समझ है. इस पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा और गणतंत्र दिवस समारोह में उनका मुख्य अतिथि बनना एक महत्वपूर्ण अवसर है. वे तीसरी बार भारत आये और अब तक फ्रांस के राष्ट्रपति छह बार गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आ चुके हैं. यह दर्शाता है कि भारत फ्रांस को किस निगाह से देखता है और कितना महत्व देता है. भारत और फ्रांस के बीच व्यापक रणनीतिक सहयोग है. इस दौरे में भी दोनों देशों के बीच वायु क्षेत्र और अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सामुद्रिक क्षेत्र में परस्पर भागीदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई है. कुछ वर्ष पहले दोनों देशों ने 2047 तक विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर सहयोग का एक रोडमैप तैयार किया था, जिसे ‘होराइजन 2047’ का नाम दिया गया है. इस घोषणा में यह निर्धारित किया गया है कि दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों के 2047 में सौ वर्ष पूरे होने तक सहभागिता का स्वरूप क्या होगा. सौ वर्ष को लेकर ऐसी कोई हमारी घोषणा या समझ किसी अन्य देश के साथ नहीं है. उल्लेखनीय है कि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ समूचे देश ने लिया है.

फ्रांस ने रक्षा और नवोन्मेष के क्षेत्र में भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों को बहुत समर्थन दिया है. सामुद्रिक क्षेत्र में भी दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ता जा रहा है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में फ्रांस के भी हित हैं और वह एक स्थापित शक्ति है. इस क्षेत्र में भारत और फ्रांस की नीति में एका है तथा इस क्षेत्र को लेकर विभिन्न मंचों पर भी दोनों देश एक-दूसरे का सहयोग करते हैं. यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि राष्ट्रपति मैक्रों और प्रधानमंत्री मोदी के बीच में व्यक्तिगत स्तर पर बहुत निकटता है. जब नेतृत्व में ऐसा संबंध होता है, तो नीतियों पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन के बाद अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस की घोषणा प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रैंक्वा ओलां ने संयुक्त रूप से की थी. साल 2017 में मैक्रों के राष्ट्रपति बनने के बाद इस अलायंस के विस्तार में बड़ी तेजी आयी. आज सोलर अलायंस में 120 से अधिक देश शामिल हैं. यह समूह वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा के उत्पादन और उपभोग को बढ़ाने के लिए प्रयासरत है, ताकि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का मजबूती से सामना किया जा सके.

भारत के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी मिशन में भी अनेक देशों के साथ-साथ फ्रांस सहयोग कर रहा है. दुनिया में सूचना तकनीक के क्षेत्र में भारत एक बड़ी शक्ति के रूप में देखा जाता है. डिजिटल उपयोगिता बढ़ाने और वैक्सीन मैत्री की जो भारत की नीति है, उसमें फ्रांस का सहयोग मिलता रहा है. निश्चित रूप से फ्रांस रक्षा, वायु और अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपना आर्थिक हित देख रहा है, पर हमें यह देखना है कि भारत के आत्मनिर्भर अभियान में उसका सहयोग कहां तक मिलता है. निवेश और व्यापार में बढ़ोतरी से सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं. दो देशों के संबंधों में जो सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है, वह है परस्पर विश्वास. मेरा मानना है कि निर्भरता और विश्वास पर आधारित ठोस संबंध कुछ ही देशों के साथ स्थापित हो सकता है. कई पश्चिमी देशों के साथ भरोसे को लेकर स्थिति सहज नहीं रहती है, पर फ्रांस के साथ ऐसा नहीं है. कई मामलों में, चाहे वह सुरक्षा परिषद का विस्तार हो और भारत को स्थायी सदस्यता देने का मसला हो, अफ्रीका में साथ-साथ काम करने की बात हो, कश्मीर और आतंकवाद पर भारत का समर्थन करना हो, फ्रांस ने हमेशा भारत का समर्थन किया है. जनवरी, 1998 से ही दोनों देशों की रणनीतिक भागीदारी का संबंध चला आ रहा है. उल्लेखनीय है कि वाजपेयी सरकार के दौर में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया था, तब अमेरिका समेत पश्चिम के कई देशों ने भारत की आलोचना की थी. उस माहौल में भी फ्रांस भारत के पक्ष में खड़ा हुआ था.

जयपुर में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति मैक्रों के साथ रोड शो करने और चाय पीने के साथ-साथ वहां के जंतर मंतर वेधशाला भी ले गये थे. यह एक महत्वपूर्ण संदेश है कि हम आज नहीं बन रहे हैं, बल्कि प्राचीन काल से ही भारत में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियां रही हैं. पुद्दुचेरी जैसे कुछ भारतीय क्षेत्रों में फ्रांस का उपनिवेश रहा था, पर उनका व्यवहार अन्य औपनिवेशिक शक्तियों से अलग रहा था. भले पश्चिम के अनेक देश विभिन्न मामलों में भारत का विरोध करते हों या खुल कर नहीं बोलते हैं, पर फ्रांस ने हमेशा स्पष्ट रूप से भारत का पक्ष लिया है. यूरोपीय संघ में भी भारत से जुड़े मसलों पर फ्रांस का समर्थन मिलता रहा है. ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम दौर में है. यूरोपीय संघ हमारा महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोगी है. उसके साथ भी व्यापार समझौते पर चर्चा चल रही है. उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ में फ्रांस समेत 27 देश हैं. हर देश के आयात, निर्यात और निवेश के स्वरूप अलग-अलग हैं. इस कारण वाणिज्यिक समझौते में देरी हो रही है. मैं समझता हूं कि इस पर भी दोनों नेताओं और प्रतिनिधिमंडलों की चर्चा हुई होगी. ब्रिटेन के साथ समझौता हो जाने पर भारत और यूरोपीय संघ के सामने एक मॉडल आ जायेगा. उसके बाद यूरोपीय संघ से भी समझौते पर मुहर लग जायेगी.

अभी दुनिया के सामने गाजा और लाल सागर के संकट हैं. इस पर राष्ट्रपति मैक्रों और प्रधानमंत्री मोदी की चर्चा हुई है. दोनों नेताओं ने गाजा में युद्धविराम की मांग की है, ताकि राहत और बचाव सामग्री भेजी जा सके. लाला सागर में व्यावसायिक जहाजों का सुरक्षित और निर्बाध परिचालन होना चाहिए, इस पर भी दोनों देशों की राय एक है. बहरहाल, विश्व व्यवस्था बड़े हलचलों से गुजर रही है और इसके स्वरूप में भी बदलाव आ रहा है. आज भारत और फ्रांस का द्विपक्षीय संबंध बेहतरी की ओर बढ़ रहा है और उसमें बहुत संभावनाएं है, पर बदलती विश्व व्यवस्था में इस संबंध पर क्या असर पड़ता है, यह देखना बाकी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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अनिल त्रिगुणायत

लेखक के बारे में

By अनिल त्रिगुणायत

अनिल त्रिगुणायत is a contributor at Prabhat Khabar.

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