651 वर्ष पुराना है पालगंज के बंशीधर मंदिर का इतिहास, जानें किस तरीके से यहां मनाया जाता है जन्माष्टमी

Updated at : 18 Aug 2022 2:50 PM (IST)
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651 वर्ष पुराना है पालगंज के बंशीधर मंदिर का इतिहास, जानें किस तरीके से यहां मनाया जाता है जन्माष्टमी

गिरिडीह उग्रवाद प्रभावित पीरटांड़ के पालगंज स्थित बंशीधर मंदिर का इतिहास 651 वर्ष पुराना है. यहां आज भी पौराणिक तरीके से लगातार चार दिनों तक वृंदावन की तर्ज पर जन्माष्टमी महोत्सव मनाया जाता है. ढोल-नगाड़े की थाप पर श्रद्धालु नृत्य करते हुए मंदिर प्रांगन पहुंचते है और जन्माष्टमी मनाते हैं.

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Giridih news: गिरिडीह उग्रवाद प्रभावित पीरटांड़ के पालगंज स्थित बंशीधर मंदिर का इतिहास 651 वर्ष पुराना है. यहां आज भी पौराणिक तरीके से लगातार चार दिनों तक वृंदावन की तर्ज पर जन्माष्टमी महोत्सव मनाया जाता है. ढोल-नगाड़े की थाप पर श्रद्धालु नृत्य करते हुए मंदिर प्रांगन पहुंचते है और जन्माष्टमी मनाते हैं. हालांकि पिछले दो सालों तक कोरोना के कारण यहां सादगी के साथ जन्माष्टमी का त्योहार मनाया गया. लेकिन इस बार ग्रामीणों व मंदिर के पुजारियों व पूजा समितियों के सदस्यों द्वारा धूमधाम के साथ जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जायेगा.

651 साल पहले हुआ था पालगंज में बंशीधर मंदिर का निर्माण

इस बार जन्माष्टमी का त्योहार 19 और 20 अगस्त को मनाया जा रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि यहां के पदमा राजा ने आज से तकरीबन 651 वर्ष पूर्व पालगंज में बंशीधर मंदिर का निर्माण कराया था. चार दिनों तक यहां भगवान कृष्ण का महोत्सव मनाया जाता है. इतना ही नहीं यहां पूजा करने के लिए किसी जाति-धर्म का बंधन नहीं है. यहां हर मजहब के लोग पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते है. इधर, पूजा के सफल आयोजन में पुजारी शिशिर कुमार भक्त, शरद कुमार भक्त, ग्रीष्म भक्त, प्राण भक्त, निकुंज केतन भक्त, चरित्र केतन भक्त, भागवत भक्त, अनूप भक्त, धीरज कुमार, पवन मंदिलवार, बप्पी लाहकार आदि जुटे हुए हैं.

इस मंदिर में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी आ चुके हैं

जंगलों के बीच बसे इस गांव के मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा शत्रुघ्न सिन्हा, जगरनाथ मिश्रा, आरिफ शेख, कैलाशपति मिश्रा, सुकदा पांडेय आदि आ चुके हैं. जन्माष्टमी के मौके पर रात के वक्त तो यहां भीड़ देखने लायक रहती है. हजारों की संख्या में आये भक्त भगवान के जन्म होते ही झूम उठते हैं. मान्यता है कि अष्टमी के दिन जो भी श्रद्धालु यहां पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है.

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कांशी में काला पहाड़ नामक राजा ने प्रतिमा को किया था खंड़ित

राजा के वशंज शरद भक्त ने बताया कि बंशीधर मंदिर का इतिहास काफी पुराना और रोचक है. कहा जाता है करीब 651 वर्ष पूर्व धनवार प्रदेश में एक ग्वाला खेमचंद भक्त को खेत जोतते वक्त भगवान बंशीधर मिले थे. ग्वाला के घर रात को रोज भजन गाया जाता था. सपने में इसकी जानकारी प्रदेश के राजा को लगी और उन्होंने ग्वाला के यहां आकर भगवान की मूर्ति को ले लिया. बाद में राजा को फिर से सपना आया जिसमें भगवान ने कहा कि मैं तो खेमचंद भक्त के लिए आया हूं. राजा ने भगवान की मूर्ति को खेमचंद भक्त को सुपुर्द कर दी. खेमंचद इस मूर्ति को लेकर सभी धाम घूमे. घूमने के क्रम में काशी में काला पहाड़ नामक एक राजा ने उसे रोका और मूर्ति को खंडित कर दिया. बाद में काला पहाड़ को भी मूर्ति में भगवान दिखा. उसने उक्त मूर्ति को खेमचंद को दे दिया. इसके बाद पालगंज में उक्त मूर्ति को स्थापित किया गया. तब से यहां पर भगवान बंशीधर की पूजा धूमधाम से की जा रही है.

मुस्लिम परिवार के लोग सिलाई करते हैं भगवान का वस्त्र

बताया जाता है कि बंशीधर से जुडी कई रोचक कहानियां है. पालगंज में जब से बंशीधर की पूजा हो रही है तभी एक मुस्लिम परिवार के लोग ही भगवान के कपडे सिलते आ रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी मुस्लिम समाज के लोग सिर्फ कपडे ही नहीं सिलते है बल्कि चार दिनों तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा भी बनते है और भगवान का प्रसाद ग्रहण करते हैं.

रिपोर्ट: मृणाल कुमार, गिरिडीह

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