मनरेगा में गडबडझाला : जॉब कार्ड दो, पांच प्रतिशत लो; बिना काम के ही मिलता है दाम

जॉब कार्ड दो, पांच प्रतिशत लो, यह हाल है धनबाद जिले के अधिकांश पंचायतों में चह रहे महात्मा गांधी राष्ट्रीय गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का. यहां मजदूरों को काम भले ही न मिले, लेकिन जॉब कार्ड बिचाैलियों को देने पर कुल मजदूरी की पांच फीसदी राशि जरूर मिल जाती है.
संजीव झा, धनबाद : जॉब कार्ड दो, पांच प्रतिशत लो, यह हाल है धनबाद जिले के अधिकांश पंचायतों में चह रहे महात्मा गांधी राष्ट्रीय गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का. यहां मजदूरों को काम भले ही न मिले, लेकिन जॉब कार्ड बिचाैलियों को देने पर कुल मजदूरी की पांच फीसदी राशि जरूर मिल जाती है. वह भी बैंक या डाक घर में खोले गये बचत खाता में. यह हाल तब है, जब राज्य सरकार की योजना अधिक से अधिक संख्या में लाेगाें काे मनरेगा के तहत राेजगार उपलब्ध कराने की है.
अभी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर भी आये हैं. उन्हें भी राेजगार दिलाना सरकार की प्राथमिकता सूची है. प्रभात खबर की टीम ने मनरेगा याेजनाओं की हकीकत जानने के लिए जिले के कुछ पंचायतों का दाैरा किया. पढ़िये गोविंदपुर प्रखंड के उदयपुर पंचायत के एक गांव बेलटांड़ की कहानी.
बेलटांड़ में 30-40 मनरेगा मजदूर निबंधित हैं. यहां पर कई मजदूरों ने प्रभात खबर काे बताया कि उनलोगों में से अधिकांश का जॉब कार्ड क्षेत्र में सक्रिय दलाल या ठेकेदार के पास रहता है. बदले में उन लोगों को मजदूरी के रूप में मिलनेवाली राशि का पांच फीसदी राशि मिलता है. जो मजदूर अपना जॉब कार्ड नहीं देते हैं, उन्हें न तो काम मिलता है और न ही राशि.
मजदूर भी इसलिए जॉब कार्ड दे देते हैं कि बिना काम के कुछ तो राशि मिल जाती है. ग्रामीणों के अनुसार मनरेगा में आज भी खुदाई का अधिकांश काम जेसीबी व दूसरे मशीनों से ही होता है. केवल सड़कों पर मिट्टी-मोरम बिछाने या पौधरोपण का काम मजदूरों से कराया जाता है.
मजदूराें काे पैसा पीएफएमएस प्रणाली से उनके बैंक या पाेस्टऑफिस के खाते में ही जाता है. खाते आधार लिंक हाेते हैं. बिचाैलिये मजदूर के पास पॉस मशीन लेकर जाते हैं. पैसा निकाल कर पांच फीसदी मजदूर काे देते हैं. शेष खुद रख लेते हैं.
मनरेगा के जानकार इसे फर्जी मस्टर रॉल क्रिएशन का मामला भी बता रहे हैं, क्याेंकि मजदूर कम पैसे मिलने पर विरोध नहीं कर रहा. पांच फीसदी लेकर ही संतुष्ट हाे जा रहा. जानकाराें का मानना है कि मजदूराें-बिचाैलिये की मिलीभगत से ही यह संभव है.
बेटलांड़ गांव में लगभग दो वर्षों से मनरेगा से कोई काम नहीं हुआ है. लॉकडाउन के दौरान भी यहां के लिए कोई योजना स्वीकृत नहीं हुई है, जबकि उपायुक्त का आदेश है कि हर गांव में मनरेगा से कम से कम पांच योजनाएं ली जाये. मजदूरों को दूसरे स्थान पर जा कर काम करना पड़ता है. ग्रामीण सुजीत बाउरी ने बताया कि इस गांव में मनरेगा या दूसरी योजना से भी कोई काम नहीं हो रहा है. इसके चलते यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय है.
केंद्र एवं राज्य सरकार की प्राथमिकतावाली योजनाओं में से एक है मनरेगा. खास कर कोरोना के बाद देश में लागू लॉकडाउन के दौरान सरकार ने मजदूरों को उनके घर (पैतृक स्थल) पर ही काम दिलाने के लिए खासी राशि आवंटित की है. पहले से जिन मजदूरों का जॉब कार्ड बना है. उनके अलावा बाहर से लौटे प्रवासी मजदूरों को भी मनरेगा से ही काम देने के लिए युद्ध स्तर पर जॉब कार्ड बनवाये जा रहे हैं. उसके बावजूद धरातल पर बहुत कम ही मजदूरों को काम मिल रहा है.
राज्य सरकार एवं जिला प्रशासन ने मनरेगा के काम में जेसीबी एवं किसी भी तरह के मशीन को दंडनीय अपराध करार दिया है. जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के तरफ से प्रकाशित विज्ञापन में कहा गया है कि मनरेगा में मशीन का उपयोग दंडनीय अपराध माना जायेगा. ऐसे लोगों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी.
मेरा जॉब कार्ड नंबर जेएच 21-352322 है. मुझसे भी ठेकेदारों ने जॉब कार्ड मांगा था. मैंने नहीं दिया. नतीजा पिछले कई वर्ष से मुझे काम नहीं दिया गया. मुझे कोई राशि भी नहीं मिलती. पूरा जॉब कार्ड ब्लैंक है. इसकी शिकायत कई बार पंचायत स्तर पर भी की. लेकिन, कोई लाभ नहीं मिला. इलाके में अधिकांश काम मशीन से ही हो रहा है. लॉकडाउन में भी घर के आस-पास काम नहीं मिल रहा है. कभी कोई अधिकारी देखने नहीं आता.
धीरेन बाउरी, मनरेगा मजदूर, बेलटांड़ गांव,
मैं पढ़ लिख कर भी बेरोजगार बैठा हूं. मेरे जैसे गांव के कई युवा ऐसे हैं, जिनका मनरेगा में जॉब कार्ड तो बना, लेकिन पिछले दो वर्ष से कोई काम नहीं मिला है. कई बार काम के लिए प्रयास किया. बताया गया कि गांव की तरफ कोई काम आयेगा, तो मिलेगा. पहले भी जो काम मिला था. उसकी राशि भी ठेकेदार ने अपनी मर्जी से ही दी. स्वरोजगार के लिए भी किसी तरह की योजना में काम नहीं मिल रहा है. ट्यूशन पढ़ा कर पेट चला रहे हैं.
शुभम बाउरी, बेलटांड़, उदयपुर.
बेलटांड़ के मनरेगा मजदूर नंदलाल बाउरी का कहना है : मेरा जॉब कार्ड वर्ष 2018 से ही ठेकेदार के पास है. किस पंचायत में क्या काम चल रहा है, किस योजना में मेरे जॉब कार्ड का इस्तेमाल हो रहा है, यह मुझे नहीं पता. एक या दो हफ्ते में ठेकेदार जॉब कार्ड व पास बुक ले कर आता है. अंगूठा लगवाता है. मशीन से मजदूरी की निकासी होती है. अगर एक सप्ताह के काम का हो, तो एक हजार से कुछ ज्यादा रुपया होता है. बदले में पचास रुपये मुझे पकड़ा देता है. अगर दो सप्ताह की मजदूरी का भुगतान एक साथ हो, तो ठेकेदार द्वारा एक सौ रुपये तक दिया जाता है. हमें कहीं नहीं जाना पड़ता.
Posted by : Pritish Sahay
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