आजादी का अमृत महोत्सव : शिक्षा को मैकाले के प्रभावों से मुक्त करने की कवायद

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 15 Aug 2023 3:40 PM

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हमारे नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में शुरू से ही विश्वविद्यालयी शिक्षा व उच्च तकनीकी शिक्षा रहे. इसे ही देश की तरक्की के लिए अनिवार्य शर्त के रूप में देखा गया, लेकिन अब नयी शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा के संदर्भ में बुनियादी साक्षरता व संख्या ज्ञान के महत्व को समझा गया है.

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तारेंद्र किशोर

ह मने एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर पिछले 76 सालों में जो कुछ भी हासिल किया है, उसमें निश्चित तौर पर हमारी शिक्षा व्यवस्था की महत्ती भूमिका रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि एक देश के तौर पर हमारी जो भी उपलब्धियां रही हैं, उनमें हमारी शिक्षा व्यवस्था ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर अहम भूमिका निभायी है. हम अमूमन शिक्षा का मूल्यांकन इस प्रकार से ही अन्य उपलब्धियों को हासिल करने में उसकी भूमिका के संदर्भ में ही करते हैं, लेकिन इतने बड़े देश की शिक्षा व्यवस्था की खुद की उपलब्धियां और चुनौतियां भी कम नहीं रही हैं. आज जब हम आजादी के 77वें साल में प्रवेश कर रहे हैं और नयी शिक्षा नीति 2020 भी लागू हो गयी है, तो इस विशाल भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दशा व दिशा के समग्र आकलन का भी यह वक्त है.

आजादी के बाद हमने जो शिक्षा व्यवस्था अपनायी, उस पर निश्चित तौर पर औपनिवेशिक काल का असर दिखायी पड़ता रहा है. एक दौर था, जब आमतौर पर यह कहकर भारतीय शिक्षा व्यवस्था की कटु आलोचना की जाती थी कि यह लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीतियों से प्रेरित है और इसका उद्देश्य महज क्लर्क पैदा करना है. लॉर्ड मैकाले मानते थे कि भारतीय भाषाएं अविकसित हैं और उनमें साहित्यिक तथा वैज्ञानिक शब्दकोश का अभाव है. इसलिए उन्होंने अपनी शिक्षा संबंधी अनुशंसाओं में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की वकालत की. उनकी अनुशंसा थी कि कानून के ज्ञान के लिए संस्कृत, अरबी, फारसी के महाविद्यालयों पर पैसा खर्च करना मूर्खता है, इसलिए उन्हें बंद करके सरकार को अंग्रेजी में कानून संहिताबद्ध करनी चाहिए. साथ ही मैकाले ने इस बात की भी सिफारिश की थी कि सरकार कई प्राथमिक विद्यालयों को खोलने की जगह कुछ ही स्कूल एवं कॉलेज खोले. मैकाले की इन सभी अनुशंसाओं को मान लिया गया था.

इन सभी अनुशंसाओं से साफ पता चलता है कि मैकाले सिर्फ मुठ्ठी भर अभिजात्य वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा के हिमायती थे. इसके अलावा वह भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने के खिलाफ थे. इसका असर यह हुआ कि लंबे समय तक भारत में शिक्षा का चरित्र समावेशी नहीं रहा. आजादी के बाद इस दिशा में निश्चित तौर पर निरंतर प्रयास हुए, लेकिन कमोबेश शिक्षा व्यवस्था के मूल चरित्र पर मैकाले की नीतियों की ही प्रतिछाया दिखायी पड़ती रही. पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 के अंतर्गत संस्कृत समेत दूसरी भारतीय भाषाओं के शिक्षण को प्रोत्साहित करने की बात कही गयी, लेकिन शिक्षा का माध्यम देशी भाषाओं को बनाने को लेकर कोई गंभीर प्रयास नहीं किये गये.

नतीजतन, आप देखेंगे कि देश में व्यापक तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनी रही. विशेष तौर पर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उसका दबदबा बना रहा. किसी भी अवाम को शिक्षित करने का यह तरीका बुनियादी तौर पर गलत है कि उसे उस भाषा में सिखाने की कोशिश की जाये, जो उसके परिवेश की भाषा नहीं है. विभिन्न शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि हमेशा सीखने व सिखाने की भाषा वही कारगर साबित होती है, जो उस परिवेश की भाषा हो.

दुर्भाग्य से हाल ही में लागू हुई नयी शिक्षा नीति- 2020 से पहले तक इस शिक्षाशास्त्रीय तथ्य की अनदेखी की जाती रही है. यहां तक कि जब शिक्षा को समावेशी बनाने की बात शुरू हुई, तब भी इस अतिमहत्वपूर्ण शिक्षाशास्त्रीय पहलू को एक अनिवार्य पूर्व शर्त के तौर पर नहीं देखा गया. जबकि, जब तक हम बच्चों को उनके परिवेश की भाषा या मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने व अन्य भाषाओं को सिखाने की प्रक्रिया नहीं अपनायेंगे, तब तक उनका सीखना-सिखाना बाधित होता रहेगा और वो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से जुड़ाव नहीं महसूस करेंगे.

यही वजह है कि बड़ी संख्या में बच्चे स्कूली शिक्षा को एक बोझ की तरह लेते हैं और शिक्षकों के लाख प्रयास के बावजूद उससे दूर भागते हैं. सामाजिक-आर्थिक वजहों के अलावा स्कूल ड्रॉप आउट की तीसरी सबसे बड़ी वजह भी यही रही है कि बच्चे प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई को बोझ की तरह लेने लगते हैं और आगे की कक्षाओं में पढ़ाई नहीं समझ में आने के कारण उन्हें पढ़ने-लिखने से विरक्ति हो जाती है. हमें इस तथ्य की ओर भी ध्यान देना चाहिए कि फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका, चीन व स्कैंडिनेवियाई देशों समेत दुनिया के तमाम विकसित देश प्राथमिक स्तर पर अपनी मातृभाषा या परिवेश की भाषा में ही शिक्षा देने पर जोर देते हैं.

सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में इससे निश्चित तौर पर लाभ तो मिलता ही है. साथ ही इन देशों की पीढ़ी एक मजबूत सांस्कृतिक-भाषाई पहचान के साथ विकसित होती है, जो अपनी भाषा एवं संस्कृति को लेकर किसी हीन भाव के शिकार नहीं होते. देर से ही सही वर्तमान नयी शिक्षा नीति -2020 के अंतर्गत अब इस महत्वपूर्ण शिक्षाशास्त्रीय पहलू को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है और इस बात पर जोर दिया गया है कि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा की मदद से ही सिखाने की कोशिश की जाये.

नयी शिक्षा नीति के अंतर्गत एक अन्य बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर विशेष जोर दिया गया है, वो है प्राथमिक स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता. यहां पर भी नयी शिक्षा नीति में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को मैकाले के प्रभावों से मुक्त करने की कोशिश दिखायी पड़ती है. जैसा कि हमने यहां पूर्व में जिक्र किया है कि मैकाले बड़े पैमाने पर प्राथमिक विद्यालयों को खोलने की बजाय कुछ चुनिंदा स्कूल-कॉलेज खोलने के हिमायती थे. हालांकि, पूर्व में आयी दो राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1968 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 में भी इस दिशा में प्रयास हुए. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अंतर्गत तो प्राथमिक स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए ‘ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड’ भी शुरू किया गया, लेकिन इन दोनों ही राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों के केंद्र में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा का मुद्दा ही प्रमुखता से मौजूद रहा.

नतीजा यह निकला कि हमारे नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में शुरू से ही विश्वविद्यालयी शिक्षा व उच्च तकनीकी शिक्षा ही रही और इसे ही देश की तरक्की के लिए अनिवार्य शर्त के रूप में देखा गया है, लेकिन अब नयी शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा के संदर्भ में बुनियादी साक्षरता व संख्या ज्ञान के महत्व को समझा गया है. यह माना गया है कि मजबूत बुनियादी शिक्षा के अभाव में सशक्त उच्च शिक्षा का आधार नहीं तैयार किया जा सकता है. इसलिए प्राथमिक स्तर पर बुनियादी साक्षरता व संख्या ज्ञान को सुनिश्चित करने को लेकर नयी शिक्षा नीति में विशेष जोर दिया गया है. यह एक सराहनीय कदम है.

हालांकि, प्राथमिक स्तर पर बड़े पैमाने पर कुशल शिक्षकों के अभाव में बुनियादी साक्षरता व संख्या ज्ञान को सुनिश्चित करना और परिवेश की भाषा या मातृभाषा में शिक्षा देना, दोनों ही चुनौतीपूर्ण लक्ष्य साबित होंगे. फिर भी सरकार ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए ‘निपुण भारत मिशन’ की शुरुआत कर दी है, जिसका लक्ष्य तीसरी कक्षा के बच्चों में 2026-27 तक बुनियादी साक्षरता व संख्या ज्ञान के लक्ष्य को हासिल कर लेना है.

इसके अंतर्गत शिक्षकों के प्रशिक्षण और सामुदायिक जागरूकता के कार्य विभिन्न सरकारी निकायों, प्रशिक्षण संस्थाओं, जन प्रतिनिधियों और नागरिक संगठनों की मदद से किये जा रहे हैं. उम्मीद है देर से ही सही, लेकिन अब प्राथमिक विद्यालय के स्तर पर आधारभूत संरचना, नामांकन, मूलभूत सुविधाओं जैसे साफ पानी, खाना, यूनिफॉर्म के अलावा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मुद्दा भी हम सब की चिंता का सबब बनेगा. इसके लिए पूरी विद्यालयी व्यवस्था खड़ी की गयी है

(लेखक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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