टेकऑफ और लैंडिंग के समय ही क्यों होते हैं ज्यादातर प्लेन क्रैश? आखिर कहां होती है चूक, जिससे सब खाक हो जाता है
Published by : Shivani Shah Updated At : 28 Jan 2026 1:18 PM
प्लेन क्रैश
Why Do Most Plane Crashes During Landing Takeoff: कई विमान हादसे लैंडिंग और टेकऑफ के दौरान होते हैं. ऐसे में यहां जानिए आखिर लैंडिंग और टेकऑफ के समय के कुछ मिनट इतने जोखिम भरे क्यों माने जाते हैं और ज्यादातर हादसे इसी दौरान क्यों होते हैं.
Why Do Most Plane Crashes During Landing Takeoff: हवाई सफर को दुनिया के सबसे सुरक्षित यात्राओं में गिना जाता है. रोजाना कई फ्लाइट्स बिना किसी परेशानी के अपने डेस्टिनेशन तक पहुंच रहे हैं, लेकिन जब भी विमान हादसे होते हैं, तो सबसे पहले एक ही सवाल आता है कि आखिर ज्यादातर हादसे टेकऑफ और लैंडिंग के समय ही क्यों होते हैं? आज बुधवार की सुबह महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार का निधन भी विमान हादसे में हो गया. यह हादसा उस वक्त हुआ जब अजित पवार का विमान बारामती में लैंडिंग करने जा रहा था. ऐसे कई विमान हादसे और भी हैं, जो लैंडिंग या टेकऑफ के दौरान हुए थे. आइए जानते हैं कि आखिर ज्यादातर प्लेन हादसे लैंडिंग और टेकऑफ के वक्त ही क्यों होते हैं.
सबसे नाजुक पल होते हैं टेकऑफ और लैंडिंग
किसी भी फ्लाइट का सबसे जोखिम भरा समय उसके पहले और आखिरी कुछ मिनट होते हैं. टेकऑफ के समय विमान जमीन से उठता है और लैंडिंग के समय वह दोबारा जमीन को छूता है. इन दोनों ही कंडीशन में विमान कम ऊंचाई पर होता है, जिससे किसी भी गड़बड़ी को संभालने का समय बहुत कम रह जाता है. लैंडिंग के वक्त मौसम का असर भी सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. तेज हवाएं, बारिश, कोहरा या हवा का डायरेक्शन अचानक बदलने जैसे कंडीशन विमान के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं. खासतौर पर रनवे को छूते समय अगर हवा का दबाव बदल जाए, तो विमान के फिसलने या असंतुलित होने का खतरा बढ़ जाता है.
कम समय में बड़े फैसले
ऊंचाई पर पायलट के पास समस्या समझने और समाधान निकालने के लिए पर्याप्त वक्त होता है, लेकिन टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान इंजन में अचानक दिक्कत, रनवे पर रुकावट और तकनीकी अलर्ट जैसी स्थितियों में पायलट को सेकेंड्स में फैसला लेना पड़ता है. यही वजह है कि टेकऑफ और लैंडिंग सबसे चैलेंजिंग माना जाता है.
कई तकनीकी सिस्टम रहते हैं एक्टिव
लैंडिंग के दौरान विमान के कई अहम तकनीकी सिस्टम एक साथ एक्टिव रहते हैं. लैंडिंग गियर, फ्लैप्स, ब्रेक और इंजन थ्रस्ट सब एक साथ काम करते हैं. अगर इनमें से किसी एक सिस्टम में भी तकनीकी खराबी आ जाए, तो कंडीशन और खराब हो सकती है. जमीन के करीब होने की वजह से पायलट के पास उस खराबी को संभालने के लिए बहुत कम समय होता है. यही वजह है कि ज्यादातर विमान हादसे लैंडिंग के दौरान ही होते हैं.
ऊंचाई पर स्थिति काफी हद तक सेफ
जब प्लेन आसमान में कई हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा होता है, तब स्थिति काफी हद तक सेफ रहती है. उस वक्त पायलट के पास सोचने-समझने और फैसला लेने के लिए पूरा समय होता है. यहां तक कि अगर किसी वजह से दोनों इंजन बंद भी हो जाएं, तो प्लेन तुरंत नीचे नहीं गिरता. वह कुछ देर तक ग्लाइडर की तरह हवा में फिसलता रहता है, जिससे पायलट कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं.
लैंडिंग के वक्त ही क्यों होते हैं ज्यादा हादसे?
टेकऑफ और लैंडिंग के समय हालात बिल्कुल अलग होते हैं. लैंडिंग को सबसे मुश्किल काम माना जाता है. क्योंकि, प्लेन को सही तरीके से जमीन पर लैंड करवाना होता है. इस दौरान प्लेन को बिल्कुल सही स्पीड, सही एंगल और सही जगह पर रनवे को छूना होता है. थोड़ी सी भी गड़बड़ी बड़ा खतरा बन सकती है.
रनवे की सीमित जगह भी हादसों की एक बड़ी वजह है. हवा में जहां विमान के पास खुला आसमान होता है, वहीं लैंडिंग के समय उसे एक तय रनवे पर ही सुरक्षित रूप से रुकना होता है. अगर रनवे गीला हो, फिसलन भरा हो, छोटा हो या वहां ट्रैफिक ज्यादा हो, तो जोखिम और बढ़ जाता है. इसी दौरान बर्ड स्ट्राइक यानी पक्षियों से टकराने की संभावना भी अधिक रहती है, क्योंकि विमान कम ऊंचाई पर उड़ रहा होता है. इन सभी कारणों के चलते लैंडिंग के समय पायलट को सेकेंडों में बड़े फैसले लेने पड़ते हैं. कई बार आखिरी पल में लैंडिंग रद्द कर विमान को दोबारा हवा में ले जाना पड़ता है, जिसे गो-अराउंड कहा जाता है.
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